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सत्ता का रास्ता गाजीपुर से होकर गुजरता, पुरजोर समर्थन या बेदखली का रहा है इतिहास

Sun, 13 Feb 2022 11:44 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 13 Feb 2022 11:44 PM IST
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The path to power passes through Ghazipur, there is a history of strong support or eviction
गाजीपुर। राष्ट्रीय हलचलों के साथ जनपद की राजनीति चुनाव दर चुनाव करवट बदलती रही है। इसकी बानगी शुरू से लेकर अभी तक के चुनावों में देखने को मिलती है। यहां प्रमुख चेहरे, मुद्दे, आंदोलन और जातिगत चेतना का असर पुरजोर रहा है। जनपद ने हर बड़े राजनीतिक परिवर्तन को अधिकांश सीटें जिताकर स्वागत किया है। इसलिए कहा जाता है कि लखनऊ की सत्ता का रास्ता गाजीपुर से होकर जाता है और दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है। देश और प्रदेश में जब कांग्रेस, सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट पार्टियों का जलवा था, तो जनपद के लोगों ने 1952 से 1974 तक के विधानसभा चुनावों में इन्हीं पार्टियों को जिताने का काम किया। इसके पीछे प्रमुख वजह स्वतंत्रता आंदोलन और विचारधारा रही है।
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पीढ़ी परिवर्तन होने पर नई पीढ़ी ने 1974 के विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित ढंग से भारतीय क्रांति दल को सबसे अधिक सात सीटें जिता दीं। एकतरफा परिवर्तन के पीछे बिहार के छात्र आंदोलन, किसान नेता चौधरी चरण सिंह का प्रभाव और ओबीसी चेतना का बढ़ना है। इन तीनों कारकों ने प्रदेश के साथ-साथ जिले की राजनीतिक परिदृश्य को भी बदल दिया। ऐसे ही 1977 के विधानसभा चुनाव में आपातकाल और कांग्रेस विरोधी माहौल बना तो यहां भी जनता पार्टी को सात सीटों का मुनाफा हुआ था।
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1980 तक आते-आते देश और प्रदेश में संजय गांधी की स्वीकार्यता बढ़ी, तो जिले की जनता उनके साथ हो गई। कांग्रेस से टूटकर बनीं कांग्रेस आई ने यहां पांच सीटों पर जीत दर्ज की। वहीं 1984 में इंदिरा गांधी के निधन होने पर शोकाकुल जनता ने कांग्रेस को फिर पांच सीटें जिता दीं। 1989 में देश की राजनीति में अनिश्चितता का माहौल दिखने लगा। जिससे जिले की तीन सीटों पर निर्दल प्रत्याशियों ने चुनाव जीता। जनता दल को भी इसका फायदा मिला और उसे भी तीन सीटें मिल गईं।
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वहीं, 90 के शुरूआती समय में देश और प्रदेश में राम मंदिर का मुद्दा गर्माने लगा, इससे गाजीपुर भी अछूता नहीं रहा। 1991 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को तीन सीटों पर जीत मिलीं। लेकिन 1993 के मध्यावधि चुनाव में आरक्षण का मुद्दा हावी होने पर सपा-बसपा गठबंधन ने जनपद की सात सीटों पर जीत दर्ज की। इसके बाद ओबीसी और दलित चेतना का असर प्रदेश में बढ़ा, जिससे 1996 से लेकर 2012 विधानसभा चुनाव तक जिले में सपा और बसपा का वर्चस्व बढ़ा। हालांकि 2014 में देश में मोदी लहर बढ़ी तो इसका असर 2017 के विधानसभा चुनाव में जिले में देखने को मिला। गाजीपुर में भाजपा तीन सीट और उसका गठबंधन दल सुभासपा दो सीट जीतने में कामयाब होता है। इस बार माहौल फिर असमंजस भरा है, जिसका पता दस मार्च को चलेगा।
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