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UP: 25 साल पुरानी मशीन का रिकॉर्ड, गाजीपुर से फ्रांस, श्रीलंका और स्विट्जरलैंड तक हो रहा अफीम का निर्यात

Thu, 24 Apr 2025 01:26 PM IST
प्रगति चंद अंकुर शुक्ला, संवाद न्यूज एजेंसी, गाजीपुर।
अंकुर शुक्ला, संवाद न्यूज एजेंसी, गाजीपुर। Published by: प्रगति चंद Updated Thu, 24 Apr 2025 01:26 PM IST
सार

Ghazipur News: देश की सबसे पुरानी अफीम फैक्टरी गाजीपुर में स्थित है। इसके अलावा एक फैक्टरी मध्य प्रदेश के नीमच में है। यहां से फ्रांस, श्रीलंका और स्विट्जरलैंड तक अफीम का निर्यात हो रहा है। 

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special story of Ghazipur international connection due to India oldest opium factory
गाजीपुर में अफीम फैक्टरी का गेट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

गाजीपुर जनपद में स्थापित देश की सबसे पुरानी अफीम फैक्टरी के चलते गाजीपुर का अंतरराष्ट्रीय संबंध मजबूत हुआ। यहां से अफीम के कच्चे माल से निकलने वाले और दवाओं में प्रयोग होने वाले मार्फिन, कोडीन फॉस्फेट, थीवेन, नास्कोपीन, आईएमओ पाउडर देश की नामचीन कंपनियों के अलावा फ्रांस, श्रीलंका और स्विट्जरलैंड तक भेजा जाता है।

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25 साल पुरानी मशीनों के होने के बाद भी यहां क्षमता से 21 हजार किलो अधिक चार्ज (दवाओं में प्रयोग होने वाले माल की पहली प्रक्रिया में निकलने वाला सामान) हो रहा है। देश में इस समय दो ही अफीम फैक्टरियां हैं। इनमें एक मध्य प्रदेश के नीमच और दूसरी गाजीपुर में है। 45 एकड़ रकबे में गाजीपुर फैक्टरी परिसर की स्थापना 1820 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने की थी। हालांकि कंपनी के पास 215 एकड़ भूमि है।

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कंपनी से जुड़े लोगों के मुताबिक ब्रिटिश कॉल में ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश में दो एजेंसी बनाई, जिनमें एक पटना एजेंसी तो दूसरी गाजीपुर में बनारस एजेंसी के नाम से थी। ब्रिटिश सरकार यहां के किसानों से अफीम की खेती करवाते थे, जिससे वे सस्ते दाम पर कच्चा माल उपलब्ध कराते थे और फैक्टरी में इसे प्रॉसेस करके बेचते थे। इससे उन्हें भारी लाभ मिलता था। यहां आईसीएस (अब आईएएस) रैंक के अधिकारियों की तैनाती होती थी, जो ओपियन एजेंट (अव जनरल मैनेजर) कहे जाते थे। 

वह उस समय देश की राजधानी कलकत्ता में बैठने वाले वाइस रैक (जनरल गवर्नर) हेड को सीधे रिपोर्ट करते। हालांकि चीन ने अत्यधिक अफीम स्टोर होने और वहां के लोगों को लत लगने के कारण लेने से इंकार कर दिए थे, जो जिले से जलमार्ग से कलकत्ता और वहां से चीन एक्सपोर्ट किया जाता था।

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बताते हैं कि ब्रिटिश साम्राज्य के 1839 में अफीम व्यापार भी चीन में प्रथम अफीम युद्धों को जन्म दिया था। हालांकि गाजीपुर और आसपास के के जिलों में अफीम की खेती धीरे-धीरे कम होती गई। 1911 में पटना का कारखाना बंद हो गया, लेकिन गाजीपुर की अफीम फैक्ट्री चलती रही। हालांकि यहां कच्चा माल सीधे लिया जाना बंद हो गया। 

इस समय राजस्थान के चित्तौड़ और बाराबंकी यूनिट से ओपियम गम गाजीपुर मंगाया जा रहा है। मौजूदा समय में फैक्टरी की क्षमता 60 हजार किलोग्राम चार्ज की है लेकिन पिछले वित्तीय वर्ष में 81 किग्रा चार्ज किया, जो दवाओं में उपयोग किए जाते हैं। कंपनियां च्यवनप्राश, कफ सीरप से लेकर कैंसर के मरीजों को दी जाने वाली दवाएं बनाने तक में इसका उपयोग करती हैं।  

क्या बोले अधिकारी

अफीम फैक्टरी का लक्ष्य 60 हजार किग्रा चार्ज का था लेकिन इस बार 81 हजार किग्रा चार्ज किया गया। यहां से कुछ देशों को माल एक्सपोर्ट किया गया। यहां संभावनाएं ज्यादा हैं। -दौलत कुमार, जीएम अफीम फैक्टरी

बरेली, बाराबंकी, गाजीपुर और मऊ में होती है खेती
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में अफीम की खेती होती है। प्रदेश में अफीम की खेती बाराबंकी, बरेली, गाजीपुर और मऊ में होती है। हालांकि निर्धारित क्षेत्र में अफीम की खेती आसानी से की जा सकती है, बशर्ते इसके लिए सीबीएन (सेंट्रल ब्यूरो ऑफ नॉरकोटिक्स) से लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य है।

विभाग से जुड़े अधिकारी बताते हैं इसके लिए दो प्रकार का पट्टा (लाइसेंस) दिया जाता है। एक लैसिंग का पट्टा और दूसरा बिना लैसिंग का पट्टा। बिना लाइसेंसिंग वाले पट्टे में खेती करने वालों को पूरा फल देना होता है, जबकि लैसिंग के पट्टे लेने वाले को गम निकालकर देना होता है। वर्तमान समय में लैसिंग का पट्टा बाराबंकी में 674 और बिना लैसिंग का 3739 लोगों को दिया गया है। बरेली में लैंसिंग का पट्टा 955 और बिना लैसिंग का पट्टा 1570 लोगों को जारी किया गया है। जबकि गाजीपुर और मऊ में बिना लैसिंग वाले पट्टे ही हुए हैं। मऊ में तीन और गाजीपुर के जमानिया में 26 और सेवराई में तीन लोगों को अफीम की खेती के लिए लाइसेंस जारी किया गया है।

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स्टार्टअप की संभावनाएं

गाजीपुर अफीम फैक्टरी में पहले 600 कर्मचारी काम करते थे लेकिन मौजूदा समय में इनकी संख्या करीब 200 है। लेकिन यहां स्टार्टअप की अपार संभावनाएं हैं। सुरक्षा की दृष्टि से सीआईएसएफ के जवान, बगल से गुजर रही गंगा के कारण पानी और खेती करने वालों की अच्छी संख्या है। ऐसे में यहां कफ सीरप और च्यवनप्राश बनाने जैसी फैक्टरी परिसर में ही स्थापित हो सकती है। क्योंकि फैक्टरी के पास 215 एकड़ जमीन है।
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