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Sawan Special: शिवलिंग पर आज भी हैं कई चोट के निशान, अंग्रेजों के जमाने में बना था ये मंदिर, अद्भुत है कहानी
Mon, 07 Aug 2023 12:18 PM IST
किरन रौतेला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गाजीपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गाजीपुर
Published by: किरन रौतेला
Updated Mon, 07 Aug 2023 12:18 PM IST
सार
पौराणिक कथाओं के अनुसार पहले इस गांव में चारों तरफ जंगल था। मान्यता है कि गंगा उसपार शेरपुर गांव से एक ग्वाला की गाय प्रतिदिन गंगा नदी पार कर देवकली गांव में आकर दूध देती थी। इससे ग्वाला परेशान रहता था। एक दिन गाय के पीछे-पीछे वह गंगा नदी पार करके गया। जहां देखा गाय अपना पूरा दूध जमीन के अंदर धंसे शिवलिंग पर गिरा रही थी।
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Sawan Special: शिवलिंग पर आज भी हैं कई चोट का निशान, अंग्रेजों के जमाने में बना था ये मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
सेवराई तहसील के भदौरा ब्लाक अन्तर्गत देवकली गांव स्थित प्राचीन शिव मंदिर लोगों मे आस्था एवं विश्वास का केंद्र है। अंग्रेजों के जमाने में बना यह मंदिर अपनी चमत्कारिक घटनाओं के चलते आज भी विख्यात है। इस मंदिर को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित है। जिससे यह पता चलता है कि यह शिवलिंग स्वयंभू है।
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पौराणिक कथाओं के अनुसार पहले इस गांव में चारों तरफ जंगल था। मान्यता है कि गंगा उसपार शेरपुर गांव से एक ग्वाला की गाय प्रतिदिन गंगा नदी पार कर देवकली गांव में आकर दूध देती थी। इससे ग्वाला परेशान रहता था। एक दिन गाय के पीछे-पीछे वह गंगा नदी पार करके गया। जहां देखा गाय अपना पूरा दूध जमीन के अंदर धंसे शिवलिंग पर गिरा रही थी। इसी से खुन्नस खाए ग्वाला ने अपने हाथ में लिए टांगी से जमीन पर कईवार किए, जिससे शिवलिंग को भी नुकसान हुआ। तब भगवान शंकर ने खुद सपने में आकर उसे दर्शन दिया। आज भी शिवलिंग में धारदार हथियार से प्रहार की वजह से गड्ढे हैं। मंदिर में शिवलिंग भू सतह से 6 फीट नीचे जमीन में है। मंदिर के भक्त बताते हैं कि मंदिर में सच्चे मन से मांगी गई हर एक मन्नत भगवान भोले शंकर अवश्य पूरी करते हैंं।
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रातों रात हुआ मंदिर का प्रवेश द्वार पूरब से पश्चिम
अंग्रेजों के शासन काल में मंदिर के बगल से ही रेलवे लाइन बिछाई जा रही थी। गांव के लोगों ने विरोध किया तो रेलवे के कर्मचारियों ने कहा कि रेलवे लाइन मंदिर के बगल से ही बिछाई जाएगी। शिव में अगर शक्ति है तो वह मंदिर का कपाट किसी दूसरे दिशा में खुल जाए। कहा जाता है कि उसी रात मंदिर का दीवार पूरब दिशा से पश्चिम दिशा की तरफ खुल गया। तभी से मंदिर का कपाट पश्चिम दिशा में हो गया। तब अंग्रेज भी भगवान भोले शंकर के आगे नतमस्तक हो गए। रेलवे लाइन को भी गांव के पूर्व दिशा की तरफ मोड़ दिया गया। यह रेलवे लाइन पंडित दीनदयाल उपाध्याय हावड़ा रूट पर देवकली गांव के पास से गुजरी है।
सावन में जलाभिषेक प्रतियोगिता का होता है आयोजन
श्रावण मास में मन्दिर समिति के द्वारा जलाभिषेक प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। इसमें श्रद्धालुओं द्वारा गहमर के नरवा गंगा घाट से स्नान के बाद जल भरकर सबसे पहले भगवान भोले शंकर को जलाभिषेक करने की परंपरा है। प्रथम, द्वितीय, तृतीय श्रद्धालुओं का चयन कर उन्हें पुरस्कृत किया जाता है। मंदिर के पुजारी शिवशंकर गिरी ने बताया कि पहले इस मंदिर का कपाट पूरब दिशा की तरफ खुलता था, मंदिर भी उस समय बहुत छोटा था, लेकिन अब इसका विस्तार हो चुका है। आस पास सहित दूर-दराज के श्रद्धालुओं की भी आस्था मंदिर से जुड़ी हुई है। सावन मास में भारी संख्या में श्रद्धालु जलाभिषेक करने के लिए आते हैं।
अंग्रेजों के शासन काल में मंदिर के बगल से ही रेलवे लाइन बिछाई जा रही थी। गांव के लोगों ने विरोध किया तो रेलवे के कर्मचारियों ने कहा कि रेलवे लाइन मंदिर के बगल से ही बिछाई जाएगी। शिव में अगर शक्ति है तो वह मंदिर का कपाट किसी दूसरे दिशा में खुल जाए। कहा जाता है कि उसी रात मंदिर का दीवार पूरब दिशा से पश्चिम दिशा की तरफ खुल गया। तभी से मंदिर का कपाट पश्चिम दिशा में हो गया। तब अंग्रेज भी भगवान भोले शंकर के आगे नतमस्तक हो गए। रेलवे लाइन को भी गांव के पूर्व दिशा की तरफ मोड़ दिया गया। यह रेलवे लाइन पंडित दीनदयाल उपाध्याय हावड़ा रूट पर देवकली गांव के पास से गुजरी है।
सावन में जलाभिषेक प्रतियोगिता का होता है आयोजन
श्रावण मास में मन्दिर समिति के द्वारा जलाभिषेक प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। इसमें श्रद्धालुओं द्वारा गहमर के नरवा गंगा घाट से स्नान के बाद जल भरकर सबसे पहले भगवान भोले शंकर को जलाभिषेक करने की परंपरा है। प्रथम, द्वितीय, तृतीय श्रद्धालुओं का चयन कर उन्हें पुरस्कृत किया जाता है। मंदिर के पुजारी शिवशंकर गिरी ने बताया कि पहले इस मंदिर का कपाट पूरब दिशा की तरफ खुलता था, मंदिर भी उस समय बहुत छोटा था, लेकिन अब इसका विस्तार हो चुका है। आस पास सहित दूर-दराज के श्रद्धालुओं की भी आस्था मंदिर से जुड़ी हुई है। सावन मास में भारी संख्या में श्रद्धालु जलाभिषेक करने के लिए आते हैं।