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जीवन में सेवक को कभी भी अपने स्वामी की बराबरी नहीं करनी चाहिए
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नौ दिवसीय श्रीराम कथा का आठवां दिन
संवाद न्यूज एजेंसी
गाजीपुर। शहर के लंका मैदान में नौ दिवसीय श्रीराम कथा आयोजित है। आठवें दिन मंगलवार को श्रीराम चरितमानस के आदर्श पात्र भरत के चरित्र प्रसंग पर कथा करते हुए कथा सम्राट मानस मर्मज्ञ राजन जी महाराज ने कहा कि भरत एक ऐसे भाई थे जो अपने ज्येष्ठ भ्राता प्रभु श्रीराम को भाई के स्थान पर उन्हें अपना स्वामी मानते थे और स्वयं को उनका सेवक। उनका मानना था कि जीवन में सेवक को कभी भी अपने स्वामी की बराबरी नहीं करनी चाहिए। यही कारण था कि प्रभु राम के वनगमन के बाद तमाम प्रयासों के बावजूद भी उन्होंने अयोध्या की राज सत्ता को कदापि स्वीकार नहीं किया। उनका यह मानना था कि जीवन में जब भी कोई पद मिले चाहे वह राजपद ही क्यों न हो पद प्राप्त करने से पहले व्यक्ति को यह विचार करना चाहिए कि क्या मुझमें इस पद को प्राप्त करने की पात्रता है अथवा नहीं। अगर पात्रता नहीं है तो प्राप्त हुआ वह पद चाहे कितना ही महान क्यों न हो वह स्वयं समाप्त हो जाया करता है। कथा में आज के मुख्य सपत्नीक यजमान अनिल श्रीवास्तव द्वारा व्यासपीठ, पवित्र रामचरित मानस एवं कथा मंडप की आरती के बाद कथा आरंभ हुई। इस अवसर पर आलोक सिंह, सुधीर श्रीवास्तव, शशिकांत वर्मा, संजीव त्रिपाठी, राकेश जायसवाल, आकाशमणि त्रिपाठी, दुर्गेश श्रीवास्तव, आशीष वर्मा, मंजीत चौरसिया, अनिल वर्मा, अमित वर्मा, सुजीत तिवारी, राघवेंद्र यादव, कमलेश वर्मा, मीडिया प्रभारी पूर्व छात्र संघ उपाध्यक्ष दीपक उपाध्याय सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।
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संवाद न्यूज एजेंसी
गाजीपुर। शहर के लंका मैदान में नौ दिवसीय श्रीराम कथा आयोजित है। आठवें दिन मंगलवार को श्रीराम चरितमानस के आदर्श पात्र भरत के चरित्र प्रसंग पर कथा करते हुए कथा सम्राट मानस मर्मज्ञ राजन जी महाराज ने कहा कि भरत एक ऐसे भाई थे जो अपने ज्येष्ठ भ्राता प्रभु श्रीराम को भाई के स्थान पर उन्हें अपना स्वामी मानते थे और स्वयं को उनका सेवक। उनका मानना था कि जीवन में सेवक को कभी भी अपने स्वामी की बराबरी नहीं करनी चाहिए। यही कारण था कि प्रभु राम के वनगमन के बाद तमाम प्रयासों के बावजूद भी उन्होंने अयोध्या की राज सत्ता को कदापि स्वीकार नहीं किया। उनका यह मानना था कि जीवन में जब भी कोई पद मिले चाहे वह राजपद ही क्यों न हो पद प्राप्त करने से पहले व्यक्ति को यह विचार करना चाहिए कि क्या मुझमें इस पद को प्राप्त करने की पात्रता है अथवा नहीं। अगर पात्रता नहीं है तो प्राप्त हुआ वह पद चाहे कितना ही महान क्यों न हो वह स्वयं समाप्त हो जाया करता है। कथा में आज के मुख्य सपत्नीक यजमान अनिल श्रीवास्तव द्वारा व्यासपीठ, पवित्र रामचरित मानस एवं कथा मंडप की आरती के बाद कथा आरंभ हुई। इस अवसर पर आलोक सिंह, सुधीर श्रीवास्तव, शशिकांत वर्मा, संजीव त्रिपाठी, राकेश जायसवाल, आकाशमणि त्रिपाठी, दुर्गेश श्रीवास्तव, आशीष वर्मा, मंजीत चौरसिया, अनिल वर्मा, अमित वर्मा, सुजीत तिवारी, राघवेंद्र यादव, कमलेश वर्मा, मीडिया प्रभारी पूर्व छात्र संघ उपाध्यक्ष दीपक उपाध्याय सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।