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कोरोना महामारी में पुरोहितों की झोली खाली
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भीमापार। कोरोना की काली छाया पितृपक्ष पर भी पड़ गई है। सार्वजनिक आयोजन निरस्त हैं। इस कारण मोक्षदायिनी मां गंगा के किनारों के मंदिर और घाट सूने पड़े हैं। यहां पर रहकर तर्पण और पिंडदान कराने वाले पुरोहित एवं कर्मकांडी ब्राम्हण नदारद हैं। कोरोना ने इनके पूजा पाठ पर भी अी बंदिश का ताला लगा दिया है। कर्मकांडी ब्राम्हणों की आजीविका पर गहरा संकट खड़ा हो गया है।
कर्मकांडी ब्राह्मणों का कहना है कि वर्ष भर में पितृ पक्ष ही एक ऐसा मौका होता है जब उनकी आमदनी के रास्ते खुलते हैैं। त्रिपीण्डी श्राद्ध और अन्य अनुष्ठान उनकी कमाई का जरिया होते हैं। लेकिन इस बार प्रशासन की रोक के चलते चारों तरफ सन्नाटा है। न ही यजमान आएंगे और न ही कोई आमदनी होगी। ऐसे में पुरोहितों और कर्मकांडी ब्राम्हणों का कहना है कि यदि कुछ पाबंदियों के साथ श्राद्ध और अनुष्ठान कराने की अनुमति प्रशासन से मिल जाती है तो उन्हें राहत मिल जाती। उधर, कुछ पुरोहितों का मानना है कि क्षेत्र के सारे कर्मकांड ब्राम्हणों की एक सूची बनाकर धर्मार्थ कार्य विभाग को सौंप देनी चाहिए। ताकि भूखों मरने से पहले सरकार से कुछ मदद ही मिल जाय।
औडि़हार के वराह धाम मन्दिर की देखभाल वर्षों से कर रहा हूं। यहां आने वाले भक्तों और गंगा स्नान करने आने वाले श्रद्धालुओं के चढ़ावे पर ही हमारी आजीविका निर्भर है। अकेले सावन माह में ही हमें इतना मिल जाता था कि आगे के 6 माह मस्त नकिल जाते थे।
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-हरिओम बाबा।
-कोरोना महामारी का सबसे अधिक नुकसान ब्राम्हणों को झेलना पड़ा है। धर्मार्थ कार्य विभाग भी कर्मकांडी ब्राम्हणों के हितों के प्रति लापरवाह बना हुआ है। ऐसे में जरूरी है कि पूजा पाठ कराने वाले ब्राम्हणों की एक सूची विभाग को सौंप दिया जाए। ताकि सरकार के पहल करने पर कोई लाभ मिल सके।
-पं. राजकुमार पांडेय %व्यास%।
-पतित पावनी गंगा के सारे घाट सूने पड़े हैं। पुलिस की पहरेदारी है। उनकी कड़ाई के चलते त्रिपिण्डी जैसे जरूरी श्राद्ध भी नहीं हो पा रहे हैं। तर्पण और पिंडदान जैसे काम भी यजमान खुद ही कर ले रहे हैं। ऐसे में सरकार को इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाना चाहिए।
-आचार्य शुभम् पाण्डेय।
-पितृपक्ष के दौरान तर्पण, पिंडदान और त्रिपिंडी आदि अनुष्ठान ही हमारी आजीविका के साधन हैं। लेकिन कोरोना के चलते सरकार के लॉकडाऊन ने इन सब पर प्रतिबंध लगा रखा है। इसलिए जरूरी है कि सरकार भी हमारे हितों के पक्ष में ठोस कदम उठाए।
-आचार्य कन्हैया पांडेय।
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कर्मकांडी ब्राह्मणों का कहना है कि वर्ष भर में पितृ पक्ष ही एक ऐसा मौका होता है जब उनकी आमदनी के रास्ते खुलते हैैं। त्रिपीण्डी श्राद्ध और अन्य अनुष्ठान उनकी कमाई का जरिया होते हैं। लेकिन इस बार प्रशासन की रोक के चलते चारों तरफ सन्नाटा है। न ही यजमान आएंगे और न ही कोई आमदनी होगी। ऐसे में पुरोहितों और कर्मकांडी ब्राम्हणों का कहना है कि यदि कुछ पाबंदियों के साथ श्राद्ध और अनुष्ठान कराने की अनुमति प्रशासन से मिल जाती है तो उन्हें राहत मिल जाती। उधर, कुछ पुरोहितों का मानना है कि क्षेत्र के सारे कर्मकांड ब्राम्हणों की एक सूची बनाकर धर्मार्थ कार्य विभाग को सौंप देनी चाहिए। ताकि भूखों मरने से पहले सरकार से कुछ मदद ही मिल जाय।
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औडि़हार के वराह धाम मन्दिर की देखभाल वर्षों से कर रहा हूं। यहां आने वाले भक्तों और गंगा स्नान करने आने वाले श्रद्धालुओं के चढ़ावे पर ही हमारी आजीविका निर्भर है। अकेले सावन माह में ही हमें इतना मिल जाता था कि आगे के 6 माह मस्त नकिल जाते थे।
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-हरिओम बाबा।
-कोरोना महामारी का सबसे अधिक नुकसान ब्राम्हणों को झेलना पड़ा है। धर्मार्थ कार्य विभाग भी कर्मकांडी ब्राम्हणों के हितों के प्रति लापरवाह बना हुआ है। ऐसे में जरूरी है कि पूजा पाठ कराने वाले ब्राम्हणों की एक सूची विभाग को सौंप दिया जाए। ताकि सरकार के पहल करने पर कोई लाभ मिल सके।
-पं. राजकुमार पांडेय %व्यास%।
-पतित पावनी गंगा के सारे घाट सूने पड़े हैं। पुलिस की पहरेदारी है। उनकी कड़ाई के चलते त्रिपिण्डी जैसे जरूरी श्राद्ध भी नहीं हो पा रहे हैं। तर्पण और पिंडदान जैसे काम भी यजमान खुद ही कर ले रहे हैं। ऐसे में सरकार को इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाना चाहिए।
-आचार्य शुभम् पाण्डेय।
-पितृपक्ष के दौरान तर्पण, पिंडदान और त्रिपिंडी आदि अनुष्ठान ही हमारी आजीविका के साधन हैं। लेकिन कोरोना के चलते सरकार के लॉकडाऊन ने इन सब पर प्रतिबंध लगा रखा है। इसलिए जरूरी है कि सरकार भी हमारे हितों के पक्ष में ठोस कदम उठाए।
-आचार्य कन्हैया पांडेय।