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जुगाड़ के छात्रों पर गुरुजी को मोटी पगार
संवाददाता, अमर उजाला, गाजीपुर
Updated Mon, 15 Dec 2014 11:12 PM IST
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संस्कृत को बढ़ावा देने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में संस्कृत विद्यालयों
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की स्थापना की गई। इसके तहत जमानिया तहसील में सात विद्यालयों की स्थापना
की गई। इसमें से दो महाविद्यालय और चार पूर्व मध्यमा और उच्चतर मध्यमा स्तर
के विद्यालय स्थापित हुए। लेकिन वर्षों पहले स्थापित यह
विद्यालय वर्तमान समय में सिर्फ कागजों पर चल रहे हैं यही नहीं इनमें पढ़ने वाले छात्र भी कागजों पर ही हैं। जबकि इसमें कार्यरत अध्यापकों को बैठे-बिठाएं सरकार अच्छी-खासी पगार दे रही है। इन विद्यालयों की स्थापना वर्ष 1916 में की गई थी। जमानिया तहसील क्षेत्र के कसबा, ढढ़नी, सुहवल के साथ रेवतीपुर में दो महाविद्यालय और एक पूर्व मध्यमा विद्यालय संचालित है।
रेवतीपुर में स्थापित महाविद्यालय जहां दो-दो बीघे क्षेत्रफल में निर्मित है। वहीं अन्य विद्यालय भी एक-एक बीघा क्षेत्रफल में बने हुए हैं। हालत यह है कि विद्यालयों की जमीन पर कुछ लोगों की तरफ से अतिक्रमण कर लिया गया है। भवन भी जर्जर हो गए है।
महाविद्यालयों में जहां 72-72 छात्र पंजीकृत है, वहीं पूर्व और मध्यमा में 110 से लेकर 115 छात्रों का पंजीकरण है। बावजूद इसके विद्यालय बगैर छात्रों के संचालित हो रहा हैै। जब विभागीय उच्चाधिकारियों के आने की सूचना मिलती है तो विद्यालय के अध्यापक जुगाड़ लगाकर छात्रों की उपस्थिति दर्शा देते हैं। अधिकारियों के जाते ही स्थिति फिर जस की तस हो जाती है।
हालत यह है कि विद्यालयों में शायद ही कभी कक्षा चलती हो। कागजों पर संचालित हो रहे इन विद्यालयों में कार्यरत करीब दर्जनभर अध्यापकों को हर माह सरकार की ओर से अच्छी-खासी पगार प्रदान की जा रही है। परीक्षा भी कागजों पर ही संपन्न करा दी जाती है। सरकार की इसी उदासीनता का परिणाम रहा कि गहमर में स्थित इसी तरह का एक विद्यालय वर्ष 1982 में बंद हो चुका है।अंग्रेजों के जमाने के इन विद्यालयों के अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाने से क्षेत्रीय लोग चिंतित है। उन्होंने कई बार अधिकारियों को अवगत कराया, लेकिन किसी ने भी इनकी सुधि नहीं ली।
संस्कृत पाठशाला इलाहाबाद परिक्षेत्र के प्रधान निरीक्षक आरके शुक्ल का कहना है इस मामले में अध्यापकों की कमी से शासन को अवगत कराया गया है। भवन का कायाकल्प करने और उसमें संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के लिए प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा जा रहा है। विद्यालय की जमीन पर अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। बंद विद्यालय को संचालित कराने का प्रयास किया जा रहा है।
छह स्कूल सिर्फ कागजों पर ही है
तहसील क्षेत्र में स्थापित ये संस्कृत विद्यालय वैसे तो कागज में अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है, लेकिन इन विद्यालयों में न तो पुस्तकालय है और न ही कंप्यूटर लैब संचालित है। वाराणसी स्थित सम्पूर्णानंद संस्कृति विश्वविद्यालय से संबद्ध इन विद्यालयों में सात में छह कागजों पर संचालित हैं, जबकि गहमर स्थित विद्यालय तीन दशक पहले बंद हो चुका है।
विद्यालय वर्तमान समय में सिर्फ कागजों पर चल रहे हैं यही नहीं इनमें पढ़ने वाले छात्र भी कागजों पर ही हैं। जबकि इसमें कार्यरत अध्यापकों को बैठे-बिठाएं सरकार अच्छी-खासी पगार दे रही है। इन विद्यालयों की स्थापना वर्ष 1916 में की गई थी। जमानिया तहसील क्षेत्र के कसबा, ढढ़नी, सुहवल के साथ रेवतीपुर में दो महाविद्यालय और एक पूर्व मध्यमा विद्यालय संचालित है।
रेवतीपुर में स्थापित महाविद्यालय जहां दो-दो बीघे क्षेत्रफल में निर्मित है। वहीं अन्य विद्यालय भी एक-एक बीघा क्षेत्रफल में बने हुए हैं। हालत यह है कि विद्यालयों की जमीन पर कुछ लोगों की तरफ से अतिक्रमण कर लिया गया है। भवन भी जर्जर हो गए है।
महाविद्यालयों में जहां 72-72 छात्र पंजीकृत है, वहीं पूर्व और मध्यमा में 110 से लेकर 115 छात्रों का पंजीकरण है। बावजूद इसके विद्यालय बगैर छात्रों के संचालित हो रहा हैै। जब विभागीय उच्चाधिकारियों के आने की सूचना मिलती है तो विद्यालय के अध्यापक जुगाड़ लगाकर छात्रों की उपस्थिति दर्शा देते हैं। अधिकारियों के जाते ही स्थिति फिर जस की तस हो जाती है।
हालत यह है कि विद्यालयों में शायद ही कभी कक्षा चलती हो। कागजों पर संचालित हो रहे इन विद्यालयों में कार्यरत करीब दर्जनभर अध्यापकों को हर माह सरकार की ओर से अच्छी-खासी पगार प्रदान की जा रही है। परीक्षा भी कागजों पर ही संपन्न करा दी जाती है। सरकार की इसी उदासीनता का परिणाम रहा कि गहमर में स्थित इसी तरह का एक विद्यालय वर्ष 1982 में बंद हो चुका है।अंग्रेजों के जमाने के इन विद्यालयों के अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाने से क्षेत्रीय लोग चिंतित है। उन्होंने कई बार अधिकारियों को अवगत कराया, लेकिन किसी ने भी इनकी सुधि नहीं ली।
संस्कृत पाठशाला इलाहाबाद परिक्षेत्र के प्रधान निरीक्षक आरके शुक्ल का कहना है इस मामले में अध्यापकों की कमी से शासन को अवगत कराया गया है। भवन का कायाकल्प करने और उसमें संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के लिए प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा जा रहा है। विद्यालय की जमीन पर अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। बंद विद्यालय को संचालित कराने का प्रयास किया जा रहा है।
छह स्कूल सिर्फ कागजों पर ही है
तहसील क्षेत्र में स्थापित ये संस्कृत विद्यालय वैसे तो कागज में अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है, लेकिन इन विद्यालयों में न तो पुस्तकालय है और न ही कंप्यूटर लैब संचालित है। वाराणसी स्थित सम्पूर्णानंद संस्कृति विश्वविद्यालय से संबद्ध इन विद्यालयों में सात में छह कागजों पर संचालित हैं, जबकि गहमर स्थित विद्यालय तीन दशक पहले बंद हो चुका है।