गाजीपुर। नगसर थाना क्षेत्र के नूरपुर कांड में मजिस्ट्रेटी जांच अब अंतिम पड़ाव पर है। शुक्रवार को इस मामले में उपजिलाधिकारी जमानिया पुलिस उत्पीड़न के शिकार फौजी परिवार के घर पहुंचे और वहां एक-एक पीड़ितों का बयान दर्ज किया। इससे पूर्व तत्कालीन थानाध्यक्ष समेत पांच पुलिसकर्मियों का बयान दर्ज किया जा चुका है। उधर, रि-मेडिकल में पुलिस की मिलीभगत से लीपापोती की आशंका से न्याय की उम्मीद लगाए लोग व्यथित हैं। सरकारी सिस्टम से न्याय न मिलने पर ब्राह्मण फौजी परिवार अब अनशन की तैयारी कर रहा है।
बीते 26 जुलाई की शाम राजन पांडेय उर्फ झनकु को असलहा लहराने के आरोप में पुलिस पकड़कर थाने ले गई थी लेकिन पुलिस की लापरवाही और नाकामी के चलते वह वहां से फरार हो गया था। इसे छुपाने के लिए इलाकाई पुलिस ने एक ब्राह्मण फौजी परिवार पर कहर बरपाया। उन पर आरोपी को भगाने का आरोप मढ़ते हुए परिवार के सदस्यों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया। इतना ही नहीं, वहां से नौ पुरुष सदस्यों को थाने लाया गया और उनकी बेरहमी से पिटाई की गई थी। 28 जुलाई को थाने से सभी को चालान कर दिया गया, जहां से न्यायालय ने सभी को जमानत दे दी थी। इसके बाद पीड़ित परिवार ने पुलिस उत्पीड़न के खिलाफ मोर्चा खोलने के साथ आला अधिकारियों से न्याय की गुहार लगानी शुरू की। उधर, जब पीड़ितों के शरीर पर पुलिस की बर्बरता के जख्म का वीडियो वायरल हुआ तो सबकी तंद्रा एकाएक टूट गई। मुख्यमंत्री ने इस प्रकरण को खुद संज्ञान लिया और जिलाधिकारी ओमप्रकाश आर्य को कर तीन दिन के भीतर रिपोर्ट देने को कहा। इसके बाद जिलाधिकारी स्तर से इस प्रकरण की मजिस्ट्रेटी जांच बैठा दी गई। जमानिया तहसील के एसडीएम सत्यप्रिय सिंह को मामले की जांच दी गई है। उधर, बीते एक अगस्त को जिलाधिकारी डीएम की जांच के तत्काल बाद पुलिस अधीक्षक ओमप्रकाश सिंह ने थानाध्यक्ष को लाइन हाजिर कर दिया। इसके बाद इस ज्वलंत मुद्दे को लेकर राजनीति शुरू हो गई। विभिन्न दलों के नेता नूरपुर गांव पहुंचे और पीड़ितों को न्याय दिलाने का आश्वासन देने में पीछे नहीं रहे। यहां तक की जिले के प्रभारी मंत्री आनंद स्वरूप शुक्ल और एमएलसी विशाल सिंह चंचल सहित अन्य लोग पीड़ित परिवार से मिलने पहुंच गए थे। इन्हें न्याय का आश्वासन भी दिया। शासन के निर्देश पर पीड़ितों का रि-मेडिकल कराया गया लेकिन आशंका है कि पुलिस विभाग के प्रभावशाली अधिकारियों की मिलीभगत से मामले में लीपापोती की गई है। दस दिन के चोट को चार से पांच दिन का बताया गया है। जबकि घटना के एक या दो दिन बाद ही प्रमुख अखबारों ने पीड़ितों के जख्म की फोटो के साथ प्रमुखता के खबर प्रकाशित किया था। ऐसे में न्याय नहीं मिलता देख, अब पीड़ित परिवार अनशन की तैयारी में जुट गया है। ऐसा हुआ तो एक बार फिर मामला तूल पकड़ सकता है।