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महानगरों में ही नहीं अपने घरों में भी मारे-मारे फिर रहे हैं प्रवासी मजदूर
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भीमापार। सैदपुर तहसील क्षेत्र में कोरोना संकट के चलते हुए लाकडाउन के दौरान विभिन्न महानगरों से अपने घरों को आए प्रवासी मजदूरों की हालत दिन प्रतिदिन खराब होती जा रही है। गांवों में कोई काम न मिलने के कारण उनका परिवार अब फांकाकशी के कगार पर आता दिखने लगा है। कुछ गांवों में घरेलू मजदूरों की संख्या पहले से ही इतनी अधिक है कि प्रवासी मजदूरों को वहां मनरेगा के तहत काम मिल पाना ही लगभग असंभव है। वहीं कुछ ग्राम प्रधान बजट के अभाव का रोना रोते हुए मजदूरों की समस्याओं से पल्ला झाड़ने में लगे हैं।
सैदपुर तहसील क्षेत्र में कुल लगभग 657 ग्राम सभाएं हैं। इन सब गांवों में कुल मिलाकर अगर तहसीलदार सैदपुर दिनेश कुमार की माना जाए तो लॉकडाउन के दौरान बाहर से कुल आने वाले प्रवासियों की पंजीकृत संख्या लगभग 12 हजार है। इसके अलावा प्रखंड से लेकर न्याय पंचायत और गांव स्तर बने क्वारंटीन सेंटरों में रह रहे प्रवासियों का रजिस्ट्रेशन कराया जा रहा है। संख्या 25 हजार से उपर जा सकती है। तहसीलदार ने बताया कि मुख्यमंत्री की योजनाओं के अनुसार इन मजदूरों का डाटा इकट्ठा कर भविष्य में उन्हें उनके कौशल के हिसाब से नौकरी और आजीविका प्रदान करने की व्यवस्था की जाएगी।
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जमीन संदल गांव के मनोज कहते है कि इसके पहले वह राजस्थान के पिंडवारा क्षेत्र में मजदूरी करते थे। लाकडाउन के दौरान उसे घर वापस आना पड़ा। उसका जाबकार्ड नहीं है। मनरेगा के तहत कोई काम मिलता नहीं है। बस इधर-उधर मेहनत मजदूरी कर लेता हूं। जिससे अपने आठ सदस्यीय परिवार का भरण पोषण करना भी मुश्किल हो गया है।
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रजहटी गांव के सुशील ने बताया कि वह सूरत में पावरलूम की मशीन चलाकर अपने परिवार का खर्च चला रहा था। लाकडाउन में उसे घर आना पड़ा। आजीविका का कोई साधन न होने से उसके परिवार को कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। कभी-कभी मेहनत मजदूरी का काम मिल जाता है जिससे परिवार का खर्च चलाना तो दूर एक जून की रोटी भी मुश्किल हो जाती है।
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फत्तेपुर गांव के प्रेमचंद का कहना है कि गुजरात के राजकोट में रंगाई-पुताई का काम करते थे। लाकडाउन में घर आने के बाद परिवार से मिलने का सुख तो मिला लेकिन प्रवासी मजदूरों के लिए कोई व्यवस्था न हो पाने के कारण उसे भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है।
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हरिहरपुर निवासी नीरज प्रजापति ने कहा कि मुंबई में वह आटा चक्की पर नौकर था। परिवार चलाने भर कमा लेता था। गांव आने के बाद सोचता हूं कि गांव आकर गलत किया या सही। यहां घरेलू मजदूरों का पिछलग्गू बनकर जीना पड़ रहा है। महीने में दस से बारह दिनों के लिए ईंट गारे का काम मिल जाता है जिसमें नून रोटी का किसी तरह काम चल जाता है।
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सैदपुर तहसील क्षेत्र में कुल लगभग 657 ग्राम सभाएं हैं। इन सब गांवों में कुल मिलाकर अगर तहसीलदार सैदपुर दिनेश कुमार की माना जाए तो लॉकडाउन के दौरान बाहर से कुल आने वाले प्रवासियों की पंजीकृत संख्या लगभग 12 हजार है। इसके अलावा प्रखंड से लेकर न्याय पंचायत और गांव स्तर बने क्वारंटीन सेंटरों में रह रहे प्रवासियों का रजिस्ट्रेशन कराया जा रहा है। संख्या 25 हजार से उपर जा सकती है। तहसीलदार ने बताया कि मुख्यमंत्री की योजनाओं के अनुसार इन मजदूरों का डाटा इकट्ठा कर भविष्य में उन्हें उनके कौशल के हिसाब से नौकरी और आजीविका प्रदान करने की व्यवस्था की जाएगी।
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जमीन संदल गांव के मनोज कहते है कि इसके पहले वह राजस्थान के पिंडवारा क्षेत्र में मजदूरी करते थे। लाकडाउन के दौरान उसे घर वापस आना पड़ा। उसका जाबकार्ड नहीं है। मनरेगा के तहत कोई काम मिलता नहीं है। बस इधर-उधर मेहनत मजदूरी कर लेता हूं। जिससे अपने आठ सदस्यीय परिवार का भरण पोषण करना भी मुश्किल हो गया है।
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रजहटी गांव के सुशील ने बताया कि वह सूरत में पावरलूम की मशीन चलाकर अपने परिवार का खर्च चला रहा था। लाकडाउन में उसे घर आना पड़ा। आजीविका का कोई साधन न होने से उसके परिवार को कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। कभी-कभी मेहनत मजदूरी का काम मिल जाता है जिससे परिवार का खर्च चलाना तो दूर एक जून की रोटी भी मुश्किल हो जाती है।
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फत्तेपुर गांव के प्रेमचंद का कहना है कि गुजरात के राजकोट में रंगाई-पुताई का काम करते थे। लाकडाउन में घर आने के बाद परिवार से मिलने का सुख तो मिला लेकिन प्रवासी मजदूरों के लिए कोई व्यवस्था न हो पाने के कारण उसे भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है।
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हरिहरपुर निवासी नीरज प्रजापति ने कहा कि मुंबई में वह आटा चक्की पर नौकर था। परिवार चलाने भर कमा लेता था। गांव आने के बाद सोचता हूं कि गांव आकर गलत किया या सही। यहां घरेलू मजदूरों का पिछलग्गू बनकर जीना पड़ रहा है। महीने में दस से बारह दिनों के लिए ईंट गारे का काम मिल जाता है जिसमें नून रोटी का किसी तरह काम चल जाता है।