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हिंदी परस्पर सहयोग एवं सामासिकता की भाषा

Mon, 14 Sep 2020 11:45 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 14 Sep 2020 11:45 PM IST
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Hindi language of mutual support and compatibility
गाजीपुर। राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिंदी दिवस पर सोमवार को आनलाइन राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत विभागाध्यक्ष डॉ. संगीता के स्वागत वक्तव्य से हुई। विषय प्रवर्तन करते हुए उन्होंने कहा कि हिंदी वर्चस्व की भाषा नहीं है। यह परस्पर सहयोग एवं सामासिकता की भाषा है। दक्षिण भारत में वर्चस्ववादी हिंदी पर राजनीति होती है उसकी सामासिकता पर नहीं। उन्होंने अपने दक्षिण भारत के कुछ संस्मरण भी साझा किया।
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कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि डॉ. तुम्बम लीली ने पूर्वोत्तर भारत में हिंदी विषय पर अपना व्याख्यान देते हुए कहा कि अरुणाचल प्रदेश में कोई अपनी भाषा नहीं है। यहां कई बोलियां हैं लोग एक-दूसरे से संपर्क बनाने के लिए हिंदी भाषा का प्रयोग करते हैं। हिंदी यहां की संपर्क भाषा है। हम भारतीय हैं। हम परिधि पर भले हों लेकिन हमारी राष्ट्रीयता केंद्र में रहने वाले राज्यों से कमतर नहीं है। उन्होंने पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में हिंदी की स्थति पर विस्तार से बात की। प्रो. परिमाला अंबेकर ने दक्षिण भारत में हिंदी की स्थिति पर कहा कि हिंदी राजनीतिक उपेक्षा की शिकार हुई है। आज दक्षिण भारत में जितना हिंदी का खतरा है उससे किसव्ी भी मायने में कम खतरा हिंदी भाषी राज्यों में नहीं है। संख्या बल भाषा की असल ताक़त नहीं होती है। उसकी असल ताक़त उसके शब्द होते हैं। भाषा को नए शब्द उसकी बोलियों से मिलते हैं। भाषा की तुलना में लोग अपनी बोलियों में अधिक सहज होते हैं। इसलिए हर राज्य को अपनी बोलियों से लगाव है। प्राचार्य डॉ. सविता भारद्वाज ने कहा कि हम हिंदी भाषियों को हिंदी के अलावा कोई अन्य भारतीय भाषा भी सीखना चाहिए। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शशिकला जायसवाल ने किया। उन्होंने कहा कि इस तरह के कार्यक्रम से हिंदी और गैर हिंदी भाषी राज्यों में पुल का निर्माण होगा। इस अवसर पर प्रतिभागियों ने विद्वानों से अपने-अपने प्रश्न भी पूछे जिसका उन्हें समुचित उत्तर भी मिला। इस अवसर पर मीडिया प्रभारी डॉ. शिवकुमार सहित महाविद्यालय परिवार के सदस्य उपस्थित थे।
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