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खेतों में अब भी जमा है बाढ़ का पानी, 2300 बीघे में नहीं होगी रबी की खेती
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सियाडी गांव के सिवान स्थित खेत में लगे पानी को लाठियों के सहारे नापते किसान।
- फोटो : GHAZIPUR
दुबिहां/रेवतीपुर। मुहम्मदाबाद और सेवराई क्षेत्र में 2300 बीघे खेत में अब भी गंगा, टोंस और मगई नदी के बाढ़ से भरा हुआ है जिससे किसान रबी की खेती नहीं कर पा रहे हैं। खरीफ की फसल बर्बाद होने पर उन्हें फसल बीमा भी नहीं मिला। इससे किसान आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं। इनमें सबसे अधिक करईल, बांगर और गंगा किनारे दोमट मिट्टी में खेती करने वाले किसान प्रभावित हैं। कुछ इलाकों में खेतों से पानी निकलने के बाद भी नमी अधिक होने से वहां बुआई होना संभव नहीं है।
इस साल गंगा, टोंस और मगई नदी में आई बाढ़ और अतिवृष्टि के कारण करइल क्षेत्र के निचले इलाकों के खेतों में पांच माह बाद भी जलभराव की स्थिति बनी है। धान, गेहूं के साथ ही दलहनी व तिलहनी फसलों की अधिक उपज देने वाले खेत खाली पड़े हैं। मुहम्मदाबाद तहसील में 1700 बीघे करईल और 400 बीघे बांगर की खेती प्रभावित है। सेवराई तहसील के रेवतीपुर ब्लाक अंतर्गत गोपालपुर गांव के दो सौ बीघे में रबी की बोआई पिछड़ गई है। ऐसे में अन्नदाताओं की कमर प्राकृतिक आपदा ने तोड़ दी है।
बाराचंवर ब्लाक का हरदासपुर, गोविंदपुर, पाहुपुर, निहालपुर, ललपीपरी, पतार, गौशलपुर, ताजपुर गांव बांगर का इलाका माना जाता है। यहां के किसान तीन हजार बीघे में धान व गेहूं के बाद शेष खेती योग्य भूमि में तिलहन, चना, मटर, गन्ना एवं सब्जी की पैदावार करते हैं। इन किसानों के सालभर का खर्च इन्हीं फसलों के उत्पादन पर निर्भर करता है, लेकिन एक तरफ मगई और दूसरे तरफ टोंस नदी में आई बाढ़ के पानी में धान की फसल डूब गई और फसल गलकर समाप्त हो गई। वहीं भांवरकोल ब्लाक के गौड़ऊर, मसौनी, सियाड़ी, जोगा, लौवाडीह, खैराबारी, सोनवानी, महेन सहित करईल के 2600 बीघे खेती योग्य भूमि में अब तक नौ सो बीघे में ही रबी की बोआई हो सकी है। जबकि 1700 बीघे खेती योग्य भूमि में पानी लगा हुआ अथवा नमी इतनी है कि जोताई के लिए ट्रैक्टर जाना तो दूर पैर भी रख पाना मुश्किल है। वहीं रेवतीपुर ब्लाक के गोपालपुर गांव के खेतों में गंगा में आई बाढ़ का पानी भरा पड़ा है, स्थिति तो यह है कि करीब 200 बीधे खेती योग्य भूमि पूरी तरह से तालाब में तब्दील हो चुकी है और फसल की जगह जल-कुंभी ने ले ली है। इस परिस्थिति में रबी ती बोआई होना ढेड़ी खीर हो चुका है। ऐसे मेें अन्नदाता धान के बाद गेहूं की भी एक छटांक से वंचित रह जाएंगे।
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इनसेट..
करइल में मसूर की होती है अच्छी पैदावार
गाजीपुर। काला हीरा के नाम से पहचान रखने वाले करइल क्षेत्र मेें मसूर की अच्छी पैदावार होती है। किसान करीब दो हजार बीघे में मसूर का उत्पादन करते हैं। बड़े पैमाने पर मसूर की खेती होने से इसकी पहचान काला हीरा बन गई थी। इस पर पानी लगे होने के कारण अब खेती कर पाना मुश्किल हो चुका है। किसान काफी चिंता में डूब चुके हैं। वजह मसूर के बेहतर उत्पादन से किसानों की अच्छी आए होती थी।
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फसल बाढ़ के पानी में डूब गई थी, जिससे एक छटांक भी धान घर नहीं आ सका। प्राकृतिक आपदा के सामने तो कुछ नहीं किया जा सकता है, रबी की बोआई को लेकर तैयारी की जा रही थी। सीजन समाप्त होने का समय आ गया, लेकिन खेत से पानी नहीं निकल पाया।- रामजी पांडेय।
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एक बीघे में धान की अच्छी पैदावार होने का अनुमान था, लेकिन अचानक मंगई व टोंस में आई बाढ़ के पानी से खेत डूब गया। पांच माह बीत जाने के बाद भी पानी खेत में भरा हुआ है। ऐसे में अब क्या रबी की बोआई हो पाएगी। अब तो धान के साथ गेहूं भी नहीं मिल सकेगा।- दीनानाथ बिंद।
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पांच मंडा में धान की फसल अच्छी लगी थी। उम्मीद से ज्यादा उत्पादन होने की आस थी लेकिन बाढ़ के पानी में सबकुछ नष्ट हो गया। खेत में अब भी पानी लगा हुआ है, ऐसे में गेहूं की भी बोआई नहीं हो सकी। अब पेट भरने के लिए अनाज बाजार से खरीदना पड़ेगा। - मेवाती देवी।
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चार बीघे में आज भी पानी भरा हुआ है। स्थिति तो यह है कि धान की फसल डूबी हुई है। उसकी कटाई के लिए मजदूर तैयार नहीं हो रहे हैं। ऐसे में तैयार फसल गलकर खराब हो चुकी है। बाढ़ का पानी किसानी के लिए परेशानी का सबब बन चुका है। - भोला उपाध्याय।
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गंगा के तटवर्ती इलाके में चार बीघे खेती योग्य भूमि है। ऐसे में गंगा का पानी जमा होने से खेत पूरी तरह से तालाब में तब्दील हो चुकी है। यह स्थिति प्रत्येक वर्ष बनी रहती है। ऐसे में धान व गेहूं के फसल की बोआई नहीं हो पाती है। - मारकंडेय दास
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पांच बीघे खेती योग्य भूमि में पानी लगा हुआ है। काफी प्रयास के बावजूद भी पानी भी नहीं निकल पा रहा है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि किसानों की इस परेशानी से स्थानीय व जिला प्रशासन का कोई लेना-देना नहीं है, जिससे समस्या जस की तस बनी हुई है। - नरेंद्र पांडेय
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इस साल गंगा, टोंस और मगई नदी में आई बाढ़ और अतिवृष्टि के कारण करइल क्षेत्र के निचले इलाकों के खेतों में पांच माह बाद भी जलभराव की स्थिति बनी है। धान, गेहूं के साथ ही दलहनी व तिलहनी फसलों की अधिक उपज देने वाले खेत खाली पड़े हैं। मुहम्मदाबाद तहसील में 1700 बीघे करईल और 400 बीघे बांगर की खेती प्रभावित है। सेवराई तहसील के रेवतीपुर ब्लाक अंतर्गत गोपालपुर गांव के दो सौ बीघे में रबी की बोआई पिछड़ गई है। ऐसे में अन्नदाताओं की कमर प्राकृतिक आपदा ने तोड़ दी है।
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बाराचंवर ब्लाक का हरदासपुर, गोविंदपुर, पाहुपुर, निहालपुर, ललपीपरी, पतार, गौशलपुर, ताजपुर गांव बांगर का इलाका माना जाता है। यहां के किसान तीन हजार बीघे में धान व गेहूं के बाद शेष खेती योग्य भूमि में तिलहन, चना, मटर, गन्ना एवं सब्जी की पैदावार करते हैं। इन किसानों के सालभर का खर्च इन्हीं फसलों के उत्पादन पर निर्भर करता है, लेकिन एक तरफ मगई और दूसरे तरफ टोंस नदी में आई बाढ़ के पानी में धान की फसल डूब गई और फसल गलकर समाप्त हो गई। वहीं भांवरकोल ब्लाक के गौड़ऊर, मसौनी, सियाड़ी, जोगा, लौवाडीह, खैराबारी, सोनवानी, महेन सहित करईल के 2600 बीघे खेती योग्य भूमि में अब तक नौ सो बीघे में ही रबी की बोआई हो सकी है। जबकि 1700 बीघे खेती योग्य भूमि में पानी लगा हुआ अथवा नमी इतनी है कि जोताई के लिए ट्रैक्टर जाना तो दूर पैर भी रख पाना मुश्किल है। वहीं रेवतीपुर ब्लाक के गोपालपुर गांव के खेतों में गंगा में आई बाढ़ का पानी भरा पड़ा है, स्थिति तो यह है कि करीब 200 बीधे खेती योग्य भूमि पूरी तरह से तालाब में तब्दील हो चुकी है और फसल की जगह जल-कुंभी ने ले ली है। इस परिस्थिति में रबी ती बोआई होना ढेड़ी खीर हो चुका है। ऐसे मेें अन्नदाता धान के बाद गेहूं की भी एक छटांक से वंचित रह जाएंगे।
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करइल में मसूर की होती है अच्छी पैदावार
गाजीपुर। काला हीरा के नाम से पहचान रखने वाले करइल क्षेत्र मेें मसूर की अच्छी पैदावार होती है। किसान करीब दो हजार बीघे में मसूर का उत्पादन करते हैं। बड़े पैमाने पर मसूर की खेती होने से इसकी पहचान काला हीरा बन गई थी। इस पर पानी लगे होने के कारण अब खेती कर पाना मुश्किल हो चुका है। किसान काफी चिंता में डूब चुके हैं। वजह मसूर के बेहतर उत्पादन से किसानों की अच्छी आए होती थी।
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फसल बाढ़ के पानी में डूब गई थी, जिससे एक छटांक भी धान घर नहीं आ सका। प्राकृतिक आपदा के सामने तो कुछ नहीं किया जा सकता है, रबी की बोआई को लेकर तैयारी की जा रही थी। सीजन समाप्त होने का समय आ गया, लेकिन खेत से पानी नहीं निकल पाया।- रामजी पांडेय।
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एक बीघे में धान की अच्छी पैदावार होने का अनुमान था, लेकिन अचानक मंगई व टोंस में आई बाढ़ के पानी से खेत डूब गया। पांच माह बीत जाने के बाद भी पानी खेत में भरा हुआ है। ऐसे में अब क्या रबी की बोआई हो पाएगी। अब तो धान के साथ गेहूं भी नहीं मिल सकेगा।- दीनानाथ बिंद।
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पांच मंडा में धान की फसल अच्छी लगी थी। उम्मीद से ज्यादा उत्पादन होने की आस थी लेकिन बाढ़ के पानी में सबकुछ नष्ट हो गया। खेत में अब भी पानी लगा हुआ है, ऐसे में गेहूं की भी बोआई नहीं हो सकी। अब पेट भरने के लिए अनाज बाजार से खरीदना पड़ेगा। - मेवाती देवी।
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चार बीघे में आज भी पानी भरा हुआ है। स्थिति तो यह है कि धान की फसल डूबी हुई है। उसकी कटाई के लिए मजदूर तैयार नहीं हो रहे हैं। ऐसे में तैयार फसल गलकर खराब हो चुकी है। बाढ़ का पानी किसानी के लिए परेशानी का सबब बन चुका है। - भोला उपाध्याय।
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गंगा के तटवर्ती इलाके में चार बीघे खेती योग्य भूमि है। ऐसे में गंगा का पानी जमा होने से खेत पूरी तरह से तालाब में तब्दील हो चुकी है। यह स्थिति प्रत्येक वर्ष बनी रहती है। ऐसे में धान व गेहूं के फसल की बोआई नहीं हो पाती है। - मारकंडेय दास
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पांच बीघे खेती योग्य भूमि में पानी लगा हुआ है। काफी प्रयास के बावजूद भी पानी भी नहीं निकल पा रहा है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि किसानों की इस परेशानी से स्थानीय व जिला प्रशासन का कोई लेना-देना नहीं है, जिससे समस्या जस की तस बनी हुई है। - नरेंद्र पांडेय