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अयोध्या में बाजी बधाई, धरती परआए रघुराई
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अतिप्राचीन श्रीराम लीला कमेटी हरिशंकरी की ओर से बुधवार शाम 7 बजे हरिशंकरी स्थित श्रीराम सिंहासन पर धनुष मुकुट पूजन, नारद मोह और रामजन्म लीला का प्रसंग मंचन किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि एसपी सिटी गोपीनाथ सोनी, विशिष्ट अतिथि सिटी गौरव कुमार सिंह समेत शहर कोतवाल तेज बहादुर सिंह, कमेटी के अध्यक्ष प्रकाश चन्द श्रीवास्तव एडवोकेट, उपाध्यक्ष विनय कुमार सिंह, मंत्री ओमप्रकाश तिवारी उर्फ बच्चा समेत अन्य ने धनुष मुकुट का पूजन करके राम लीला का शुभारंभ किया जो 15 अक्तूबर तक चलेगी।
श्रीराम चबूतरा स्थित मंच पर वंदेवाणी विनायको आदर्श रामलीला मंडल के कलाकारों द्वारा नारद मोह और श्रीराम जन्म लीला का मंचन किया गया। देवर्षि नारद को कामदेव पर विजय प्राप्त करने का घमंड हुआ और उन्होंने ब्रह्मा और शंकर जी के पास जाकर ये बात कही। इसपर दोनों देवताओं ने देवर्षि नारद से कहा कि इस बात का जिक्र वे भगवान विष्णु से न करें। लेकिन नारद नहीं माने और वे तत्काल भगवान विष्णु के पास जाकर ये बात कह डाली।
सारी बातों को सुनकर भगवान विष्णु ने अपनी माया से श्रीनिवासपुर नामक नगर बसाया जिसके राजा शीलनिधि थे। उन्होंने अपनी पुत्री विश्वमोहिनी का स्वयंवर रचाया जिसमें सभी राज्यों के राजा और नारद जी भी पहुंचे। शीलनिधि ने देवर्षि नारद से अपनी पुत्री विश्वमोहिनी के भविष्यवाणी का आग्रह किया। नारद विश्वमोहिनी पर मोहित हो गए और तत्काल भगवान विष्णु के पास जाकर कहा कि कहते हैं कि वे उसे हरि का रूप दे दें।
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वहीं दूसरे प्रकरण के अनुसार असुरों का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ता जा रहा था तो सारे देवतागण इकट्ठा होकर भगवान विष्णु के पास जा करके असुरों के अत्याचार के बारे में बताते हैं। तब भगवान विष्णु ने कहा कि मैं त्रेतायुग में चक्रवर्ती महाराज दशरथ के घर पर बालक के रूप में अवतार लेकर असुरों का संहार करुंगा। उधर, राजा दशरथ पुत्र न होने के संबंध में अपने कुल गुरु महर्षि वशिष्ठ के पास जा करके सारी बातें बताते हैं। इसी क्रम में लीला आगे बढ़ती है और अयोध्या में राजा दशरथ के चार पुत्र होने के सूचना फैलती है। सोहर से पूरी अयोध्या गूंज उठती है।
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श्रीराम चबूतरा स्थित मंच पर वंदेवाणी विनायको आदर्श रामलीला मंडल के कलाकारों द्वारा नारद मोह और श्रीराम जन्म लीला का मंचन किया गया। देवर्षि नारद को कामदेव पर विजय प्राप्त करने का घमंड हुआ और उन्होंने ब्रह्मा और शंकर जी के पास जाकर ये बात कही। इसपर दोनों देवताओं ने देवर्षि नारद से कहा कि इस बात का जिक्र वे भगवान विष्णु से न करें। लेकिन नारद नहीं माने और वे तत्काल भगवान विष्णु के पास जाकर ये बात कह डाली।
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सारी बातों को सुनकर भगवान विष्णु ने अपनी माया से श्रीनिवासपुर नामक नगर बसाया जिसके राजा शीलनिधि थे। उन्होंने अपनी पुत्री विश्वमोहिनी का स्वयंवर रचाया जिसमें सभी राज्यों के राजा और नारद जी भी पहुंचे। शीलनिधि ने देवर्षि नारद से अपनी पुत्री विश्वमोहिनी के भविष्यवाणी का आग्रह किया। नारद विश्वमोहिनी पर मोहित हो गए और तत्काल भगवान विष्णु के पास जाकर कहा कि कहते हैं कि वे उसे हरि का रूप दे दें।
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वहीं दूसरे प्रकरण के अनुसार असुरों का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ता जा रहा था तो सारे देवतागण इकट्ठा होकर भगवान विष्णु के पास जा करके असुरों के अत्याचार के बारे में बताते हैं। तब भगवान विष्णु ने कहा कि मैं त्रेतायुग में चक्रवर्ती महाराज दशरथ के घर पर बालक के रूप में अवतार लेकर असुरों का संहार करुंगा। उधर, राजा दशरथ पुत्र न होने के संबंध में अपने कुल गुरु महर्षि वशिष्ठ के पास जा करके सारी बातें बताते हैं। इसी क्रम में लीला आगे बढ़ती है और अयोध्या में राजा दशरथ के चार पुत्र होने के सूचना फैलती है। सोहर से पूरी अयोध्या गूंज उठती है।