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बिजली की कमी से दम तोड़ रहे उद्योग
ब्यूरो/ अमर उजाला, गाजीपुर
Updated Thu, 20 Aug 2015 12:30 AM IST
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नंदगंज में औद्योगिक आस्थान की स्थापना हुए तीन दशक से अधिक समय बीत चुका है लेकिन यहां औद्योगिक विकास की बुनियादी जरूरतें तक पूरी नहीं हो पाई हैं। बिजली, पानी, सड़क और सुरक्षा की कमी ने यहां के उद्योगों को पनपने ही
नहीं दिया। गिनाने के लिए यहां के 20 कारखानों में से 17 चल रहे हैं पर सभी की हालत खराब है। बैंडेज, पंखा और सीमेंट की फैक्ट्री बंद हो चुकी हैं।
औद्यौगिक आस्थान को देहात क्षेत्र की बिजली दी जाती है। जिससे कारखानों में बमुश्किल आठ से दस घंटे काम हो पाता है। पूरी क्षमता से उत्पादन नहीं होने से घाटा बढ़ता जा रहा। उद्यमी यहां के लिए अलग फीडर की मांग बरसों से कर रहे
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हैं। बीते वर्ष शासन ने यहां के लिए पांच एमबीए के पावर हाउस को मंजूरी दी थी। 31 दिसंबर 2014 को जिलाधिकारी नरेंद्र सिंह पटेल ने विद्युत विभाग के अधिशासी अभियंता तृतीय को प्राक्कलन तैयार करने के लिए कहा था। किंतु आठ
माह बाद भी हालात जस के तस हैं। सड़कों की बात करें तो पूरे परिक्षेत्र में मात्र पचास मीटर सड़क पक्की है। पेयजल आपूर्ति के लिए टंकी तो है पर उससे पानी की सप्लाई नहीं होती है। उसका नलकूप चोरी गया है। जलनिकासी की नाली
न बनने से बारिश में कारखानों समेत पूरे परिसर में जलभराव हो जाता है। आने जाने में दिक्कत के अलावा माल का जो नुकसान होता है वह अलग। परिसर की चहारदीवारी क्षतिग्रस्त हो गई है जिससे परिसर छुट्टा पशुओं का चारागाह बन
गया है।
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बिजली की कमी से तीन-चार उद्योग बंद हो चुके हैं। कई इकाइयों की हालत खराब है। उद्योगों की सेहत सुधारने के लिए जरूरी है कि सुबह छह बजे से रात नौ बजे तक बिजली मिले। ढाई माह पहले डीएम आए थे। उन्हें बिजली, पानी और सड़क की समस्या बताई गई थी। उन्होंने भरोसा भी दिया था लेकिन हुआ कुछ नहीं । - सरफराज अध्यक्ष, औद्योगिक आस्थान नंदगंज
.....
उद्योगों के लिए बिजली सबसे जरूरी है। लोड अधिक और तार जर्जर होने से 33 हजार की मेन लाइट का तार हमेशा टूटता रहता है। वह 40 से 60 हजार रुपये बिजली का बिल जमा करते हैं पर पूरे समय फैक्ट्री नहीं चल पाती है।- जयप्रकाश राय, उद्यमी
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औद्योगिक आस्थान की सड़क जगह-जगह टूट गई है। नालियां न बनने से बारिश में जलभराव हो जाता है। - मुकेश सिंह, उद्यमी
......
औद्योगिक क्षेत्र में सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। चहारदीवारी जगह-जगह से टूटी है। उद्योग, धंधे और उद्यमी यहां को सुरक्षित नहीं हैं।- पंकज गुप्ता, उद्यमी
.....
जिले में 4500 उद्योग हैं पंजीकृत
जिले में बड़े-छोटे मिलाकर कुल 4500 उद्योग पंजीकृत हैं। जबकि 50 हजार छोटे उद्यमों का पंजीकरण विभाग में नहीं है। उद्योग के नाम पर राईस मिल, ईंट भट्ठे, प्लास्टिक, वालहैंगिंग, स्पेलर चक्की, कोल्डस्टोर, फ्लोर मील, लकड़ी, लोहे के फर्नीचर, बीडी उद्योग आदि हैं।
.....
औद्योगिक क्षेत्र के विकास में सबसे बड़ी बाधा निर्बाध बिजली आपूर्ति की है। सड़कों की हालत खराब होने से माल मंगाने भेजने में दिक्कत होती है। समस्याओं को दूर करने के लिए उच्चाधिकारियों को लिखा गया है। - सुभाष चंद्र यादव, महाप्रबंधक उद्योग।
......
कभी इत्र के लिए मशहूर था यह जिला
कभी यह जिला फूलों से तैयार देशी इत्र, गुलाब जल और केवड़ा जल के लिए जाना जाता था। यहां तैयार उत्पादों की मांग विदेशों तक से होती थी। इत्र, गुलाब जल और केवड़ा जल के पुराने व्यापारी स्टीमर घाट निवासी 80 वर्षीय लालजी केशरी
देशी इत्र उद्योग को लेकर काफी चिंतित हैं। उनका परिवार सौ वर्ष से इस धंधे में लगा है। केसरी कहते हैं कि पहले यहां चमेली, बेला, गुलाब, जूही की खेती बड़े पैमाने पर की जाती थी।
इन्हीं फूलों से यहां इत्र, गुलाब और केवड़ा जल बनाया जाता था। जिनकी मांग दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, आसाम, लाहौर (पाकिस्तान) और ढाका तक में थी। बाद में लोगों ने फूलों की खेती से मुंह मोड़ा तो इत्र, गुलाब और केवड़ा जल उद्योग
बैठने लगा। अब वे जौनपुर से चमेली, हाथरस से गुलाब जल और ओडिसा से केवड़ा जल और इत्र तैयार कराते हैं। देशी इत्र में चंदन के तेल का इस्तेमाल होता है जिससे उसकी खुशबू बनी रहती है पर यह महंगा पड़ता है। जबकि केमिकल से
तैयार परफ्यूम (सेंट) इसके मुकाबले काफी सस्ता पड़ता है। अब जिले में इत्र का धंधा लगभग समाप्त सा हो गया है।
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नहीं दिया। गिनाने के लिए यहां के 20 कारखानों में से 17 चल रहे हैं पर सभी की हालत खराब है। बैंडेज, पंखा और सीमेंट की फैक्ट्री बंद हो चुकी हैं।
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औद्यौगिक आस्थान को देहात क्षेत्र की बिजली दी जाती है। जिससे कारखानों में बमुश्किल आठ से दस घंटे काम हो पाता है। पूरी क्षमता से उत्पादन नहीं होने से घाटा बढ़ता जा रहा। उद्यमी यहां के लिए अलग फीडर की मांग बरसों से कर रहे
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हैं। बीते वर्ष शासन ने यहां के लिए पांच एमबीए के पावर हाउस को मंजूरी दी थी। 31 दिसंबर 2014 को जिलाधिकारी नरेंद्र सिंह पटेल ने विद्युत विभाग के अधिशासी अभियंता तृतीय को प्राक्कलन तैयार करने के लिए कहा था। किंतु आठ
माह बाद भी हालात जस के तस हैं। सड़कों की बात करें तो पूरे परिक्षेत्र में मात्र पचास मीटर सड़क पक्की है। पेयजल आपूर्ति के लिए टंकी तो है पर उससे पानी की सप्लाई नहीं होती है। उसका नलकूप चोरी गया है। जलनिकासी की नाली
न बनने से बारिश में कारखानों समेत पूरे परिसर में जलभराव हो जाता है। आने जाने में दिक्कत के अलावा माल का जो नुकसान होता है वह अलग। परिसर की चहारदीवारी क्षतिग्रस्त हो गई है जिससे परिसर छुट्टा पशुओं का चारागाह बन
गया है।
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बिजली की कमी से तीन-चार उद्योग बंद हो चुके हैं। कई इकाइयों की हालत खराब है। उद्योगों की सेहत सुधारने के लिए जरूरी है कि सुबह छह बजे से रात नौ बजे तक बिजली मिले। ढाई माह पहले डीएम आए थे। उन्हें बिजली, पानी और सड़क की समस्या बताई गई थी। उन्होंने भरोसा भी दिया था लेकिन हुआ कुछ नहीं । - सरफराज अध्यक्ष, औद्योगिक आस्थान नंदगंज
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उद्योगों के लिए बिजली सबसे जरूरी है। लोड अधिक और तार जर्जर होने से 33 हजार की मेन लाइट का तार हमेशा टूटता रहता है। वह 40 से 60 हजार रुपये बिजली का बिल जमा करते हैं पर पूरे समय फैक्ट्री नहीं चल पाती है।- जयप्रकाश राय, उद्यमी
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औद्योगिक आस्थान की सड़क जगह-जगह टूट गई है। नालियां न बनने से बारिश में जलभराव हो जाता है। - मुकेश सिंह, उद्यमी
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औद्योगिक क्षेत्र में सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। चहारदीवारी जगह-जगह से टूटी है। उद्योग, धंधे और उद्यमी यहां को सुरक्षित नहीं हैं।- पंकज गुप्ता, उद्यमी
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जिले में 4500 उद्योग हैं पंजीकृत
जिले में बड़े-छोटे मिलाकर कुल 4500 उद्योग पंजीकृत हैं। जबकि 50 हजार छोटे उद्यमों का पंजीकरण विभाग में नहीं है। उद्योग के नाम पर राईस मिल, ईंट भट्ठे, प्लास्टिक, वालहैंगिंग, स्पेलर चक्की, कोल्डस्टोर, फ्लोर मील, लकड़ी, लोहे के फर्नीचर, बीडी उद्योग आदि हैं।
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औद्योगिक क्षेत्र के विकास में सबसे बड़ी बाधा निर्बाध बिजली आपूर्ति की है। सड़कों की हालत खराब होने से माल मंगाने भेजने में दिक्कत होती है। समस्याओं को दूर करने के लिए उच्चाधिकारियों को लिखा गया है। - सुभाष चंद्र यादव, महाप्रबंधक उद्योग।
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कभी इत्र के लिए मशहूर था यह जिला
कभी यह जिला फूलों से तैयार देशी इत्र, गुलाब जल और केवड़ा जल के लिए जाना जाता था। यहां तैयार उत्पादों की मांग विदेशों तक से होती थी। इत्र, गुलाब जल और केवड़ा जल के पुराने व्यापारी स्टीमर घाट निवासी 80 वर्षीय लालजी केशरी
देशी इत्र उद्योग को लेकर काफी चिंतित हैं। उनका परिवार सौ वर्ष से इस धंधे में लगा है। केसरी कहते हैं कि पहले यहां चमेली, बेला, गुलाब, जूही की खेती बड़े पैमाने पर की जाती थी।
इन्हीं फूलों से यहां इत्र, गुलाब और केवड़ा जल बनाया जाता था। जिनकी मांग दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, आसाम, लाहौर (पाकिस्तान) और ढाका तक में थी। बाद में लोगों ने फूलों की खेती से मुंह मोड़ा तो इत्र, गुलाब और केवड़ा जल उद्योग
बैठने लगा। अब वे जौनपुर से चमेली, हाथरस से गुलाब जल और ओडिसा से केवड़ा जल और इत्र तैयार कराते हैं। देशी इत्र में चंदन के तेल का इस्तेमाल होता है जिससे उसकी खुशबू बनी रहती है पर यह महंगा पड़ता है। जबकि केमिकल से
तैयार परफ्यूम (सेंट) इसके मुकाबले काफी सस्ता पड़ता है। अब जिले में इत्र का धंधा लगभग समाप्त सा हो गया है।