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जनजातियां प्रकृति का अभिन्न अंग: प्रो. आरके मिश्र

Sat, 03 Oct 2015 11:09 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, गाजीपुर
ब्यूरो/ अमर उजाला, गाजीपुर Updated Sat, 03 Oct 2015 11:09 PM IST
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An integral part of nature Tribes: Pro. RK Mishra
अब तक भारत में जितने भी अध्ययन हुए हैं वे अपूर्ण हैं। उसको नए ढंग से देखा जाना चाहिए। जनजातियां प्रकृति का अभिन्न अंग हैं। ये बातें वेस्टइंटीज विश्वविद्यालय किंगस्टन जमैका के प्रो. आरके मिश्र ने शनिवार को सहजानंद
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स्नातकोत्तर महाविद्यालय में आयोजित भारतीय जनजातियां समाज और संस्कृति विषयक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के पहले दिन कहीं। गोष्ठी जीवनोदय शिक्षा समिति की ओर से आयोजित की गई। 
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इस मौके पर डा. जसल ने भारत की जाति व्यवस्था पर निशाना साधते हुए भारतीय जनजातियों के साथ मित्रता करने की सलाह दी। अश्विनी दुबे ने कहा कि भारतीय जनजातियां गरीबी का दंश झेल रही हैं। आरक्षण के नाम पर उनके साथ
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धोखा हो रहा है। उनकी आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। विजय शंकर चतुर्वेदी ने कहा कि आदिवासियों का पारंपरिक लोक नृत्य करमा में वृक्षों की पूजा होती है जो पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती है। प्रो. गोपाल

तिवारी ने कहा कि देश में विमर्श की संस्कृति पैदा करने की आवश्यकता है। जनजातियों से जमीन, जंगल, मकान छीने जा रहे हैं। वे शहरों में आकर मजदूरी करने को विवश हैं। नालंदा के प्रो. यू कुंडला ने कहा कि प्रत्येक देश में जनजातियां

होती हैं। देश के विकास के लिए जनजातियों का विकास आवश्यक है। देश के अंतिम श्रेणी के नागरिकों का विकास करके ही हम देश को आगे ले जाने में सफल होंगे। डा. आशीष तिवारी ने कहा कि  जनजातियों में विभिन्नता है लेकिन

एकरूपता नहीं। इस दौरान तारकेश्वर मिश्र राही, डा. आनंद सिंह, रामबदन राम, प्रो. केपी कुंडला, प्रो. स्मिता तिवारी जसल, अश्विनी दूबे, मधु कांकरिया एवं अजीजुल हसन सिद्दकी को स्मृतिचिह्न एवं अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया।


इस मौके पर डा. कुलदीप पांडेय, डा. जितेंद्र नाथ राय, अमरनाथ तिवारी, डा. सानंद सिंह, प्रभाकर त्रिपाठी, काजी फरीद आलम, डा. शशिकांत राय आदि मौजूद रहे। संचालन डा. रामनारायण तिवारी एवं अनिल शर्मा ने संयुक्त रूप से किया।
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