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अब्दुल हमीद पर देश को है नाज
ghazipur
Updated Sat, 10 Sep 2016 11:51 PM IST
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वीर अब्दुल हमीद के शहादत दिवस कार्यक्रम में मंचासीन ब्रिगेडियर एसए रहमान, शहीद की पत्नी रसूलन बीबी एवं अन्य।
- फोटो : Ghazipur
परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद के 51वें शहादत दिवस पर शनिवार को उनके गांव धामूपुर स्थित शहीद पार्क में लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। इस मौके पर मुख्य अतिथि बिग्रेडियर एसए रहमान ने कहा कि अपनी बहादुरी से दुश्मनों के दांत खट्टे करने वाले वीर अब्दुल हमीद पर पूरे देश को नाज है। इस वीर ने 1965 में भारत-पाक के युद्ध में पाक सेना से चीनी निर्मित तीन पैंटन टैंकों को नष्ट करते हुए अपने प्राणों को देश के लिए न्यौछावर कर दिया था। इसके बाद भारत सरकार ने उन्हें परमवीर चक्र से नवाजा था।
उन्होंने कहा कि अब्दुल हमीद को 1962 में चीन- भारत युद्ध में भी अपनी वीरता दिखाने का मौका मिला था। युद्ध के दौरान उनके तमाम साथी एक-एक कर धराशाई होते गए। यह सब अपनी आंखों के सामने देखकर भी उनका साहस कम नहीं हुआ। वह कंकरीली-पथरीली जमीन पर जंगल- झाड़ियों के बीच भूखे-प्यासे, बच-बचाकर चलते रहे और एक दिन तेजपुर नामक बस्ती में पहुंच गए। इस मोर्चे की बहादुरी ने उन्हें जवान अब्दुल हमीद की जगह लांस नायक अब्दुल हमीद बना दिया। 12 मार्च 1962 के बाद उन्हें तीन वर्षों के अंदर ही नायक, हवलदार, कंपनी क्वार्टर मास्टर की उपाधि हासिल हो गई।
17 सितंबर 1965 को भारत-पाक के बीच घमासान लड़ाई जारी थी। पाकिस्तान को अपने पैंटन टैंकों पर बड़ा नाज था। ये टैंक सब कुछ रौंदते हुए भारत की सीमा में घुसते जा रहे थे। यह देख अब्दुल हमीद अपने साथियों के साथ ललकारते हुए आगे बढ़े। उनकी एंटी टैंक बंदूकों ने आग उगलना शुरु किया और देखते ही देखते तीन टैंक क्षण भर में ध्वस्त हो गए, जिससे पाकिस्तानी हमलावरों को मुंह की खानी पड़ी। सीने में गोली लगने से वीर अब्दुल हमीद वीरगति को प्राप्त हो गए। इस वीर सपूत का नाम आज भी पूरा देश आदर के साथ लेता है।
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कार्यक्रम की शुरुआत से पूर्व बिग्रेडियर एसए रहमान ने शहीद की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर सलामी दी। इस मौके पर नेहरु युवा केंद्र के लोगों ने एक से बढ़कर सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। इस अवसर पर शहीद की पत्नी रसूलन बीबी, डा. आरपी पांडेय, जैनूल हसन, शमशाद अंसारी, सिकानू राम, जनार्दन यादव सहित दर्जनों लोग मौजूद थे। संचालन जमील आलम ने किया।
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उन्होंने कहा कि अब्दुल हमीद को 1962 में चीन- भारत युद्ध में भी अपनी वीरता दिखाने का मौका मिला था। युद्ध के दौरान उनके तमाम साथी एक-एक कर धराशाई होते गए। यह सब अपनी आंखों के सामने देखकर भी उनका साहस कम नहीं हुआ। वह कंकरीली-पथरीली जमीन पर जंगल- झाड़ियों के बीच भूखे-प्यासे, बच-बचाकर चलते रहे और एक दिन तेजपुर नामक बस्ती में पहुंच गए। इस मोर्चे की बहादुरी ने उन्हें जवान अब्दुल हमीद की जगह लांस नायक अब्दुल हमीद बना दिया। 12 मार्च 1962 के बाद उन्हें तीन वर्षों के अंदर ही नायक, हवलदार, कंपनी क्वार्टर मास्टर की उपाधि हासिल हो गई।
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17 सितंबर 1965 को भारत-पाक के बीच घमासान लड़ाई जारी थी। पाकिस्तान को अपने पैंटन टैंकों पर बड़ा नाज था। ये टैंक सब कुछ रौंदते हुए भारत की सीमा में घुसते जा रहे थे। यह देख अब्दुल हमीद अपने साथियों के साथ ललकारते हुए आगे बढ़े। उनकी एंटी टैंक बंदूकों ने आग उगलना शुरु किया और देखते ही देखते तीन टैंक क्षण भर में ध्वस्त हो गए, जिससे पाकिस्तानी हमलावरों को मुंह की खानी पड़ी। सीने में गोली लगने से वीर अब्दुल हमीद वीरगति को प्राप्त हो गए। इस वीर सपूत का नाम आज भी पूरा देश आदर के साथ लेता है।
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कार्यक्रम की शुरुआत से पूर्व बिग्रेडियर एसए रहमान ने शहीद की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर सलामी दी। इस मौके पर नेहरु युवा केंद्र के लोगों ने एक से बढ़कर सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। इस अवसर पर शहीद की पत्नी रसूलन बीबी, डा. आरपी पांडेय, जैनूल हसन, शमशाद अंसारी, सिकानू राम, जनार्दन यादव सहित दर्जनों लोग मौजूद थे। संचालन जमील आलम ने किया।