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संस्कृति मानव जीवन को संभव और सफल बनाती है
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गाजीपुर। राजकीय महिला महाविद्यालय में दर्शनशास्त्र विभाग में भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद की ओर से ‘भारतीय संस्कृति में निहित मौलिक मूल्य एवं राष्ट्रीय पुर्ननिर्माण में उनकी भूमिका’ विषयक व्याख्यान माला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का प्रारंभ सरस्वती प्रतिमा पर पुष्पार्चन एवं दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के दर्शन एवं धर्म विभाग के प्रो. एके राय एवं प्रो. डीएन तिवारी इस व्याख्यान माला के प्रमुख वक्ता रहे। प्रो. राय ने कहा कि जिन मानवीय मूल्यों को मनुष्य चाहते हुए भी अंगीकार नहीं कर पा रहा उसे सवारने संभालने में संस्थाएं मददगार साबित हो रही हैं। संस्कृति मानव जीवन को संभव एवं सफल बनाती हैं।
डिजिटल क्रांति को वरदान बताते हुए प्रो. राय ने कहा कि इसने विकेंद्रीकरण को बढ़ावा दिया। केंद्रीकरण को न्यूनतम करने में अपना महती योगदान दिया है। प्रो. डीएन तिवारी ने मानव जीवन के ऋणों से उऋण होने का संदेश दिया, जिससे समाज में इति कर्तव्यता का बोध विकसित हो। उन्होंने बताया कि एकात्म भाव की कमी से व्यक्ति, व्यक्ति से दूर होता जा रहा है और सामाजिक विषमता, भेदभाव का शिकार हो रहा है। जबकि संपूर्ण सृष्टि में एक ही परम तत्व की ज्योति प्रज्ज्वलित है। महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. सविता भारद्वाज ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति का मूल तत्व एकत्व भाव है। भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति जय जगत को स्वीकार करती है, विश्व बंधुत्व को स्वीकार करती है। व्याख्यान माला के आयोजक डॉ. अमित यादव ने कहा कि भेदों में भी अभेद निहित है। सभी भेद इस कारण है कि मनुष्य ने अपने चारों तरफ एक घेरा बना रखा है और उसे ही संपूर्ण मान लिया जब तक इस घेरे का विस्तार कर उसमें सभी मानव जाति एवं प्रकृति को सम्मिलित नहीं किया जाएगा अर्थात एकात्म के भाव को जागृत नहीं किया जाएगा तब तक समाज में भेदभाव, ऊंच-नीच, पर्यावरण अपकर्ष जैसी चीजों को समाप्त नहीं किया सकता। कार्यक्रम में महाविद्यालय की छात्राएं, विभिन्न विभागों के शोध छात्र, महाविद्यालय के सभी अध्यापक उपस्थित थे।
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डिजिटल क्रांति को वरदान बताते हुए प्रो. राय ने कहा कि इसने विकेंद्रीकरण को बढ़ावा दिया। केंद्रीकरण को न्यूनतम करने में अपना महती योगदान दिया है। प्रो. डीएन तिवारी ने मानव जीवन के ऋणों से उऋण होने का संदेश दिया, जिससे समाज में इति कर्तव्यता का बोध विकसित हो। उन्होंने बताया कि एकात्म भाव की कमी से व्यक्ति, व्यक्ति से दूर होता जा रहा है और सामाजिक विषमता, भेदभाव का शिकार हो रहा है। जबकि संपूर्ण सृष्टि में एक ही परम तत्व की ज्योति प्रज्ज्वलित है। महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. सविता भारद्वाज ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति का मूल तत्व एकत्व भाव है। भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति जय जगत को स्वीकार करती है, विश्व बंधुत्व को स्वीकार करती है। व्याख्यान माला के आयोजक डॉ. अमित यादव ने कहा कि भेदों में भी अभेद निहित है। सभी भेद इस कारण है कि मनुष्य ने अपने चारों तरफ एक घेरा बना रखा है और उसे ही संपूर्ण मान लिया जब तक इस घेरे का विस्तार कर उसमें सभी मानव जाति एवं प्रकृति को सम्मिलित नहीं किया जाएगा अर्थात एकात्म के भाव को जागृत नहीं किया जाएगा तब तक समाज में भेदभाव, ऊंच-नीच, पर्यावरण अपकर्ष जैसी चीजों को समाप्त नहीं किया सकता। कार्यक्रम में महाविद्यालय की छात्राएं, विभिन्न विभागों के शोध छात्र, महाविद्यालय के सभी अध्यापक उपस्थित थे।
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