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मनोवांछित फलदायी है सिद्धपुर वाली काली मां
Updated Sat, 13 Oct 2018 10:52 PM IST
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औड़िहार। सैदपुर तहसील के पीछे स्थित सिद्धपुर वाली काली मां की प्रसिद्धि काफी दूर- दूर तक है। नवरात्र में यहां खूब भीड़ उमड़ती है। मन्नतें पूरी होने पर यहां पकवान बना कर चढ़ाने का क्रम भी बना रहता है। ऐसी मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मुराद इस दरबार में अवश्य पूरी होती है।
1855 में तहसील के निर्माण कार्य के समय ही एक कारीगर ने बाहर रखे पत्थर पर नक्काशी कर मां काली जी की मूर्ति बना दी थी। बाद में तहसील में उस पत्थर की खोज होने लगी। पुलिस के डर से मूर्तिकार ने उस मूर्ति को संगत घाट के पास गंगा नदी के किनारे जमीन में धंसा दिया। 1907 में संगत घाट निवासी रघुनाथ द्विवेदी को मां काली ने स्वप्न में स्वयं को अमुक स्थान पर दबी होने की बात कही। बाद में की गई खुदाई में वहां मां काली की प्रतिमा मिली। सपने के मुताबिक प्रतिमा को तहसील परिसर में स्थापित करा दिया गया। बाद में एक मंदिर भी बना दिया गया। इसके बाद से यह क्षेत्र में आस्था का केंद्र बनी हुई है। चैत्र और शारदीय नवरात्र में यहां भक्तों तातां लगा रहता है। ऐसी मान्यता है नवरात्र में मां दुर्गा के सामने मत्था टेककर सच्चे मन से पूजा-अर्चना करता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।
1855 में तहसील के निर्माण कार्य के समय ही एक कारीगर ने बाहर रखे पत्थर पर नक्काशी कर मां काली जी की मूर्ति बना दी थी। बाद में तहसील में उस पत्थर की खोज होने लगी। पुलिस के डर से मूर्तिकार ने उस मूर्ति को संगत घाट के पास गंगा नदी के किनारे जमीन में धंसा दिया। 1907 में संगत घाट निवासी रघुनाथ द्विवेदी को मां काली ने स्वप्न में स्वयं को अमुक स्थान पर दबी होने की बात कही। बाद में की गई खुदाई में वहां मां काली की प्रतिमा मिली। सपने के मुताबिक प्रतिमा को तहसील परिसर में स्थापित करा दिया गया। बाद में एक मंदिर भी बना दिया गया। इसके बाद से यह क्षेत्र में आस्था का केंद्र बनी हुई है। चैत्र और शारदीय नवरात्र में यहां भक्तों तातां लगा रहता है। ऐसी मान्यता है नवरात्र में मां दुर्गा के सामने मत्था टेककर सच्चे मन से पूजा-अर्चना करता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।
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