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भक्ति के लिए कोई निर्धारित समय नहीं
Updated Thu, 01 Nov 2018 11:45 PM IST
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मतसा। गरुआ मकसूदपुर के रा म जानकी मंदिर परिसर में चल रहे सात दिवसीय भागवत कथा में संत शिवरामदास फलाहारी बाबा ने कहा कि वास्तविक दृष्टि से ज्ञान और भक्ति में कोई अंतर नहीं है। भक्ति की पराकाष्ठा ज्ञान और ज्ञान की पराकाष्ठा भक्ति है।
उन्होंने कहा कि जहां भक्ति से ज्ञान को श्रेष्ठ बतलाते हैं वहां भक्ति का अर्थ साधन भक्ति है और जहां ज्ञान से भक्ति को श्रेष्ठ बताते हैं वहां ज्ञान का अर्थ परोक्ष ज्ञान है। परा भक्ति और परम ज्ञान दोनों एक ही वस्तु है। रुचि भेद के कारण नाम भेद हो गया है। कोई किसी नाम को पसंद करता है तो कोई किसी नाम को। भक्ति करने का कोई निर्धारित समय नहीं होता है। ध्रुव ने पांच वर्ष की उम्र में भक्ति की तो प्रह्लाद की भक्ति तो गर्भ में ही शुरू हो गयी थी। जीवन में सच्चा गुरू अगर मिल जाए तो वहीं से भक्ति शुरू हो जाती है। सद्गुरू अपने शिष्य को सब कुछ दे देता है । गुरू अनेक होते हैं लेकिन सद्गुरू जीवन में एक ही होना चाहिए। इस मौके पर रामप्रवेश राय, बुची राय, हुमेश्वर राय आदि मौजूद रहे। इसी प्रकार हनुमत लाल जूनियर हाईस्कूल डुहिया में श्रीराम कथा के चौथे दिन पंडित गोविंद शास्त्री ने सीता और राम के विवाह प्रसंग को सुनाया। कहा कि विवाह में वर तथा वधू के गुण, स्वरूप और स्वभाव के साथ-साथ दोनों परिवार की सम्पत्ति, प्रतिष्ठा की समानता हो तो वैवाहिक संबंध सुखमय होने की संभावना रहती है। पुत्र तो केवल अपने पिता के परिवार की मर्यादा को ही प्रभावित कर सकता है लेकिन पुत्री दो परिवारों अर्थात पिता और पति दोनों की मर्यादा को बढ़ाती हैं। इसमें अभिषेक यादव, आरती, सीताराम राय, संजय राय ने सराहनीय भूमिका निभाई।
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उन्होंने कहा कि जहां भक्ति से ज्ञान को श्रेष्ठ बतलाते हैं वहां भक्ति का अर्थ साधन भक्ति है और जहां ज्ञान से भक्ति को श्रेष्ठ बताते हैं वहां ज्ञान का अर्थ परोक्ष ज्ञान है। परा भक्ति और परम ज्ञान दोनों एक ही वस्तु है। रुचि भेद के कारण नाम भेद हो गया है। कोई किसी नाम को पसंद करता है तो कोई किसी नाम को। भक्ति करने का कोई निर्धारित समय नहीं होता है। ध्रुव ने पांच वर्ष की उम्र में भक्ति की तो प्रह्लाद की भक्ति तो गर्भ में ही शुरू हो गयी थी। जीवन में सच्चा गुरू अगर मिल जाए तो वहीं से भक्ति शुरू हो जाती है। सद्गुरू अपने शिष्य को सब कुछ दे देता है । गुरू अनेक होते हैं लेकिन सद्गुरू जीवन में एक ही होना चाहिए। इस मौके पर रामप्रवेश राय, बुची राय, हुमेश्वर राय आदि मौजूद रहे। इसी प्रकार हनुमत लाल जूनियर हाईस्कूल डुहिया में श्रीराम कथा के चौथे दिन पंडित गोविंद शास्त्री ने सीता और राम के विवाह प्रसंग को सुनाया। कहा कि विवाह में वर तथा वधू के गुण, स्वरूप और स्वभाव के साथ-साथ दोनों परिवार की सम्पत्ति, प्रतिष्ठा की समानता हो तो वैवाहिक संबंध सुखमय होने की संभावना रहती है। पुत्र तो केवल अपने पिता के परिवार की मर्यादा को ही प्रभावित कर सकता है लेकिन पुत्री दो परिवारों अर्थात पिता और पति दोनों की मर्यादा को बढ़ाती हैं। इसमें अभिषेक यादव, आरती, सीताराम राय, संजय राय ने सराहनीय भूमिका निभाई।
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