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अंग्रेजी हुकूमत के दमन से अंकुरित हुई थी विद्रोह की भावना

Mon, 14 Aug 2017 11:11 PM IST
Updated Mon, 14 Aug 2017 11:11 PM IST
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अंग्रेजी हुकूमत के दमन से अंकुरित हुई थी विद्रोह की भावना
गाजीपुर। देश को आजादी दिलाने में जिले के क्रांतिकारियों का योगदान कभी भूलाया नहीं जा सकता है। क्रांतिकारियों की वीरता, त्याग और बलिदान की गाथा सुनकर आज भी लोगों का दिल दहल उठता है। हर साल अगस्त का महीना आते ही लोगों की जुबान पर भारत छोड़ो आंदोलन (1942) की अगस्त क्रांति गूंजने लगती है। लोग शहीद क्रांतिकारियों के सम्मान में समारोहों का आयोजन कर उन्हें याद कर श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हैं।
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क्रांतिकारियों की वीरता की चरचा करने से पहले यह बताना जरूरी है कि जनपद में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की भावना क्यों भड़की। इसका जवाब कुछ लोगों को छोड़कर अधिकतर लोगों के पास नहीं है। सर्वप्रथम इसी मुद्दे को स्पष्ट करना समीचीन होगा। सन 1818 में अंग्रेजों ने गाजीपुर नगर को जिला बनाने की घोषणा की। इसकी सीमा निर्धारित करते हुए यहां का पहला कलेक्टर राबर्ट बारलो को बनाया। इसके साथ ही जगह-जगह पुलिस चौकियों की स्थापना की गई। अंग्रेजी हुकूमत ने गाजीपुर को जिला घोषित करने के बाद अपना पहला लक्ष्य शासकीय खजाना भरना बनाया। इस लक्ष्य की तह तक जाने के लिए उसने जिले में नील और अफीम की खेती शुरू करा दी। इस खेती से जब सरकारी खजाना भरने लगा तब अंग्रेजी हुकूमत ने जनता पर दमनकारी चक्र चलाना शुरू कर दिया। यह चक्र चलते ही जिले के मजदूर, किसान, ग्रामीण, व्यापारी परेशान होने लगे। उनमें अंग्रेजों के प्रति विद्रोह की भावना अंकुरित होने लगी। फलत : जिले के लोग अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल बजाने के अवसर की तलाश में लग गए। संयोग से उसी समय बलिया जो पूर्व में गाजीपुर जिले की एक तहसील था के एक सिपाही मंगल पांडेय ने बैरिकपुर फौजी छावनी में चर्बी से बने कारतूस के उपयोग से भड़ककर अपनी राइफल से कई अंग्रेज अफसरों को गोली से भून डाला था। मंगल पांडेय की गोली से मृत कई अंग्रेज अफसरों की घटना में जिले के लोगों में क्रांति की लौ फूंक दी। देखते ही देखते अंग्रेजों के खिलाफ लोग लामबंद होते गए। रातों-रात हजारों की संख्या में क्रांतिकारी सड़क पर आ गए। इस बीच अंग्रेजी हुकूमत ने मंगल पांडेय पर मुकदमा चलाकर उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया। इस वीर क्रांतिकारी की फांसी के फौरन बाद ही बलिया और गाजीपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति की लहर देखते ही देखते गांव तक फैल गई। क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के नील गोदामों, फसलों एवं कोठियों पर धावा बोल दिया। चौरा गांव के लोगों ने एक अंग्रेजी काश्तकार को भी मार डाला। अंग्रेजों ने भी ताकत का भरपूर उपयोग कर आंदोलन को दबाने की कोशिश की। अंग्रेजी हुकूमत ने लोगों की धरपकड़ शुरू कर दी।
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