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विभिन्न जगहों पर अपना वजूद बनाए हुए है हस्तशिल्प
Updated Fri, 08 Dec 2017 10:41 PM IST
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सैदपुर। क्षेत्र में विभिन्न जगहों पर हस्तशिल्प अपना वजूद बनाने के साथ तमाम परिवारों की आजीविका का जबरदस्त माध्यम बने हुए हैं। गुन-शऊर सिखाने के नाम पर हस्तानांतरित परंपरागत ग्राम्य शिल्प दउरी, कुरुई, चटाई, आसनी अब समय काटने के साधन न होकर एक व्यवसाय बन गए हैं। इससे जिले और क्षेत्र की पहचान अन्य जगहों पर भी बनी हुई है। इसी क्रम में क्षेत्र के मूज, कुश की आसनी हाल के दिनों में अपने और अपनों की मुक्ति के मार्ग का प्रमुख उत्पादन बन गई है। जौहरगंज कि आसनी विभिन्न धार्मिक कृत्यों में यजमान-पुरोहित के बैठने के साधन के साथ ही बिहार के गया में लोग अपने पुरखों के लोक-परलोक से आवागमन मुक्ति के लिए जौहरगंजी आसनी का खूब प्रयोग कर रहे है। पूजा और मांगलिक कार्यों में प्रयुक्त होने वाली आसनी के निर्माण में क्षेत्र के तमाम गांवो की महिलाएं लगी हुई है।
क्षेत्र के जौहरगंज, खोजनपुर, पटना, शादी-भादी आदि गांवों में तमाम परिवारों में आसनी बनाकर महिलाएं परिवार के खर्चे में सहभागिता के साथ ही स्वावलम्बन बन रही है। बिल्कुल ग्राम्य संसाधनों पर आधारित इस उद्योग के उत्पाद वाराणसी, फैजाबाद, प्रयाग, गया में में उपलब्ध है। सिमित पूंजी से शुरू इस काम के जरिए तमाम परिवार ढाई सौ से तीन सौ रूपए रोज की आमदनी कर रहे है। खास तौर से ग्रामीण क्षेत्र बंजर, ऊंचाई की जगह नदियों के दियारे (किनारे), खेतों के मेड़ों पर उगने वाले कुश और सरपत की महीन काश से सुतली के सहारे बनाया जाता है। इसके लिए लकड़ी का एक छोटा स्टैंड बनाया जाता है। एक दिन में तमाम घर के काम करके भी औरते 10 से 12 तक आसनी बना लेती हैं। इन्हें बाहरी व्यापारी 4 से 5 रुपया नग के हिसाब से खरीद ले जाते है। अपनी अच्छी साइज, मुलायम मूज और अच्छी रस्सी के प्रयोग के चलते हाल के कुछ वर्षों में जौहरगंज के आसनी की बाजार में बेहद मांग बनी हुई है। गया, वाराणसी के साथ ही अयोध्या के बाजार में यहां की आसनी की जबरदस्त मांग है।
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क्षेत्र के जौहरगंज, खोजनपुर, पटना, शादी-भादी आदि गांवों में तमाम परिवारों में आसनी बनाकर महिलाएं परिवार के खर्चे में सहभागिता के साथ ही स्वावलम्बन बन रही है। बिल्कुल ग्राम्य संसाधनों पर आधारित इस उद्योग के उत्पाद वाराणसी, फैजाबाद, प्रयाग, गया में में उपलब्ध है। सिमित पूंजी से शुरू इस काम के जरिए तमाम परिवार ढाई सौ से तीन सौ रूपए रोज की आमदनी कर रहे है। खास तौर से ग्रामीण क्षेत्र बंजर, ऊंचाई की जगह नदियों के दियारे (किनारे), खेतों के मेड़ों पर उगने वाले कुश और सरपत की महीन काश से सुतली के सहारे बनाया जाता है। इसके लिए लकड़ी का एक छोटा स्टैंड बनाया जाता है। एक दिन में तमाम घर के काम करके भी औरते 10 से 12 तक आसनी बना लेती हैं। इन्हें बाहरी व्यापारी 4 से 5 रुपया नग के हिसाब से खरीद ले जाते है। अपनी अच्छी साइज, मुलायम मूज और अच्छी रस्सी के प्रयोग के चलते हाल के कुछ वर्षों में जौहरगंज के आसनी की बाजार में बेहद मांग बनी हुई है। गया, वाराणसी के साथ ही अयोध्या के बाजार में यहां की आसनी की जबरदस्त मांग है।
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