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Firozabad News: याचिका खारिज, मत्स्य विभाग के रिटायर्ड सहायक निदेशक को मुकदमे का सामना करना होगा
Sat, 22 Nov 2025 12:20 AM IST
आगरा ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, फिरोजाबाद
संवाद न्यूज एजेंसी, फिरोजाबाद
Updated Sat, 22 Nov 2025 12:20 AM IST
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सांकेतिक
- फोटो : सांकेतिक
- नकली मत्स्य बीज के मामले में दर्ज मुकदमे में मक्खनपुर पुलिस ने निकाल दिया था नाम, सीजेएम कोर्ट ने गवाही के आधार पर किया था तलब
- सत्र न्यायाधीश कोर्ट ने कहा, पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के आधार पर निचली अदालत का आदेश औचित्यपूर्ण, आरोपी को मुकदमे का सामना करना होगा
संवाद न्यूज एजेंसी
फिरोजाबाद। सत्र न्यायाधीश डा. बब्बू सारंग की कोर्ट ने मत्स्य विभाग के एक सेवानिवृत्त सहायक निदेशक की निगरानी याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायालय ने निचली अदालत के उस आदेश को सही ठहराया है, जिसमें अधिकारी को धोखाधड़ी और कूटरचित दस्तावेज तैयार करने के मामले में मुकदमा ट्रायल के लिए तलब किया गया था।
यह मामला थाना मक्खनपुर से जुड़ा है। आरोपी किशन शर्मा निवासी बुर्ज भवन, देवखेड़ा, फिरोजाबाद, जो मत्स्य विभाग में सहायक निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हैं, उन्होंने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 27 अगस्त 2025 को पारित आदेश को चुनौती दी थी। सीजेएम कोर्ट ने किशन शर्मा और एक अन्य को जालसाजी, और फर्जी दस्तावेज का असली के रूप में प्रयोग के आरोपों के तहत मुकदमे के लिए तलब किया था। सत्र न्यायाधीश डॉ. बब्बू सारंग ने 19 नवंबर को अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि निचली अदालत के आदेश में कोई अवैधानिकता नहीं है और निगरानी याचिका निरस्त कर दी ।
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यह है पूरा मामला
शारदा देवी ने आरोप लगाया था कि मत्स्य विभाग के अधिकारियों ने उनके साथ धोखाधड़ी की है। अधिकारियों ने मिलीभगत कर उन्हें असली मत्स्य बीज के स्थान पर नकली और चाइनीज बीज दिया, जिससे उनकी फसल बर्बाद हुई और उन्हें आर्थिक नुकसान हुआ। पुलिस ने अपनी विवेचना में किशन शर्मा और एक अन्य कर्मचारी राजपाल का नाम निकाल दिया था और अन्य आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया था। वादी और गवाहों के बयानों के आधार पर कोर्ट ने माना कि किशन शर्मा के खिलाफ भी प्रथम दृष्टया मामला बनता है। किशन शर्मा ने अपने बचाव में तर्क दिया कि वह एक लोक सेवक थे और 31 दिसंबर 2024 को रिटायर हुए हैं, इसलिए उन पर मुकदमा चलाने के लिए सरकार से अनुमति लेना आवश्यक था, जिसे अनदेखा किया गया। साथ ही वादी को सरकारी अनुदान प्राप्त हो चुका है, इसलिए धोखाधड़ी का कोई औचित्य नहीं है और उनका कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं था। सत्र न्यायाधीश ने बचाव पक्ष की दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के आधार पर निचली अदालत का आदेश पूर्णतया औचित्यपूर्ण है। आरोपी को मुकदमे का सामना करना होगा।
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- सत्र न्यायाधीश कोर्ट ने कहा, पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के आधार पर निचली अदालत का आदेश औचित्यपूर्ण, आरोपी को मुकदमे का सामना करना होगा
संवाद न्यूज एजेंसी
फिरोजाबाद। सत्र न्यायाधीश डा. बब्बू सारंग की कोर्ट ने मत्स्य विभाग के एक सेवानिवृत्त सहायक निदेशक की निगरानी याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायालय ने निचली अदालत के उस आदेश को सही ठहराया है, जिसमें अधिकारी को धोखाधड़ी और कूटरचित दस्तावेज तैयार करने के मामले में मुकदमा ट्रायल के लिए तलब किया गया था।
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यह मामला थाना मक्खनपुर से जुड़ा है। आरोपी किशन शर्मा निवासी बुर्ज भवन, देवखेड़ा, फिरोजाबाद, जो मत्स्य विभाग में सहायक निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हैं, उन्होंने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 27 अगस्त 2025 को पारित आदेश को चुनौती दी थी। सीजेएम कोर्ट ने किशन शर्मा और एक अन्य को जालसाजी, और फर्जी दस्तावेज का असली के रूप में प्रयोग के आरोपों के तहत मुकदमे के लिए तलब किया था। सत्र न्यायाधीश डॉ. बब्बू सारंग ने 19 नवंबर को अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि निचली अदालत के आदेश में कोई अवैधानिकता नहीं है और निगरानी याचिका निरस्त कर दी ।
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यह है पूरा मामला
शारदा देवी ने आरोप लगाया था कि मत्स्य विभाग के अधिकारियों ने उनके साथ धोखाधड़ी की है। अधिकारियों ने मिलीभगत कर उन्हें असली मत्स्य बीज के स्थान पर नकली और चाइनीज बीज दिया, जिससे उनकी फसल बर्बाद हुई और उन्हें आर्थिक नुकसान हुआ। पुलिस ने अपनी विवेचना में किशन शर्मा और एक अन्य कर्मचारी राजपाल का नाम निकाल दिया था और अन्य आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया था। वादी और गवाहों के बयानों के आधार पर कोर्ट ने माना कि किशन शर्मा के खिलाफ भी प्रथम दृष्टया मामला बनता है। किशन शर्मा ने अपने बचाव में तर्क दिया कि वह एक लोक सेवक थे और 31 दिसंबर 2024 को रिटायर हुए हैं, इसलिए उन पर मुकदमा चलाने के लिए सरकार से अनुमति लेना आवश्यक था, जिसे अनदेखा किया गया। साथ ही वादी को सरकारी अनुदान प्राप्त हो चुका है, इसलिए धोखाधड़ी का कोई औचित्य नहीं है और उनका कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं था। सत्र न्यायाधीश ने बचाव पक्ष की दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के आधार पर निचली अदालत का आदेश पूर्णतया औचित्यपूर्ण है। आरोपी को मुकदमे का सामना करना होगा।