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UP: 31 साल तक चट्टान की तरह बयानों पर अडिग रही पीड़िता, हैवान को दिलाई सजा; 11 वर्ष की उम्र में हुई थी दरिंदगी

Wed, 28 Jan 2026 10:30 PM IST
अरुन पाराशर संवाद न्यूज एजेंसी, फिरोजाबाद
संवाद न्यूज एजेंसी, फिरोजाबाद Published by: अरुन पाराशर Updated Wed, 28 Jan 2026 10:30 PM IST
सार

11 वर्ष की बालिका से दरिंदगी के आरोपी को कोर्ट ने 31 साल बाद सजा सुनाई। इस दाैरान केस के वादी और मुख्य गवाह की माैत हो गई। पीड़िता अपने बयान पर अडिग रही। कोर्ट ने दोषी को पांच वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। साथ ही जुर्माना भी लगाया। 

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man accused of assault girl was sentenced 31 years later
कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

हैवानियत के जख्म लेकर 31 साल तक वह चट्टान की तरह अपने बयानों पर अडिग रही। सुनवाई के दौरान गवाहों की मौत तक हो गई, लेकिन उसकी हिम्मत नहीं टूटी। बुधवार को फैसले का दिन आया। 11 वर्षीय मासूम से दुष्कर्म की कोशिश के दोषी नौरतन सिंह को अदालत ने पांच वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई और कहा, समय बीतने के साथ पीड़िता तारीखें या दिन भूल सकती है, लेकिन दरिंदगी का घाव उसके मन में हमेशा बना रहता है, वह कभी नहीं भरता।
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विशेष न्यायाधीश एससी-एसटी एक्ट नवनीत कुमार गिरि की अदालत ने दोषी नौरतन सिंह पर 14 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया और आदेश दिया कि जुर्माने की आधी राशि पीड़िता को दी जाए। वारदात 6 मई 1995 की रात की है। सिरसागंज थाना क्षेत्र के एक गांव में 11 वर्षीय बच्ची को दोषी नौरतन सिंह उसके घर के आंगन से सोते समय उठाकर ले गया था। 
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रेलवे लाइन के पास उसने बच्ची के साथ दुष्कर्म की कोशिश की, लेकिन परिजन के आ जाने पर वह भाग निकला था। पुलिस ने पिता की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार किया था और उसके खिलाफ दुष्कर्म व एससी-एसटी एक्ट के तहत चार्जशीट दाखिल की थी।
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वर्षों पहले गवाहों की मौत, पर खामोश जख्मों ने दे दी गवाही
बचाव पक्ष ने तर्क दिया था कि पीड़िता को घटना की सटीक तारीख याद नहीं है, जिस पर अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए उसे खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि पीड़िता के चेहरे और शरीर पर खरोंच के निशान (डॉक्टरी रिपोर्ट के मुताबिक) और उसके अडिग बयान यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि उस रात उसके साथ संघर्ष और दरिंदगी हुई थी। 


कानूनी लड़ाई के दौरान पीड़िता के पिता (वादी) और मुख्य गवाह चाचा की मृत्यु हो गई, लेकिन पीड़िता ने 31 साल बाद भी अदालत में अपनी गवाही से आरोपी को बेनकाब कर दिया। पीड़िता ने अदालत में अपने पिता के हस्ताक्षरों को पहचानकर उस 31 साल पुरानी तहरीर को जीवित कर दिया था।




 
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