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वीर की शहादत पर हर आंख नम, वीरता पर गर्व

अमर उजाला ब्यूरो फीरोजाबाद Updated Sun, 26 Jun 2016 10:56 PM IST
वीर की शहादत पर हर आंख नम, वीरता पर गर्व
वीर की शहादत पर हर आंख नम, वीरता पर गर्व - फोटो : अमर उजाला
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नगला केवल (फीरोजाबाद)। श्रीनगर के बाहरी क्षेत्र पांपोर में शनिवार की शाम को आतंकी हमले में शहीद हुए सीआरपीएफ के जवान वीर सिंह के गांव नगला केवल में शनिवार रात से ही शोक की लहर थी। रविवार को भी गांव के किसी भी घर चूल्हे नहीं जले। हर आंख नम थी और सभी देश के लिए प्राणों की आहुति देने वाले वीर जवान के शव के आने का इंतजार कर रहे थे। गांव में वीर सिंह को खोने का गम था तो उसकी शहादत पर गर्व भी था। ग्रामीणों को इस बात का फख्र था कि  वीर सिंह ने अपना सर्वोच्च बलिदान दे शहादत की गौरव गाथा में उनके गांव का नाम भी लिख दिया।
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शिकोहाबाद तहसील से सात किलो मीटर दूर कंथरी ग्राम पंचायत के मजरा नगला केवल में शहीद जवान वीर सिंह के पिता परिवार के साथ रहते हैं। मैनपुरी रोड पर बाईपास से सटे इस गांव का माहौल सामान्य दिनों की तुलना में रविवार को कुछ अलग ही था। गांव में प्रवेश करते ही पेड़ के नीचे ग्रामीणों की भीड़ लगी थी। एक तरफ छांव में गांव की महिलाएं बैठी थीं। इनके बीच बैठी वीर सिंह (48) की पत्नी प्रीतादेवी (47) बार-बार सुध-बुध खो रही थीं। आंखों में आंसू लिए गांव की महिलाएं उन्हें ढांढस बंधा रही थीं। मां का हाथ थामे बैठी वीर सिंह की सबसे बड़ी बेटी रजनी भी शहीद पिता की तस्वीर देख कर फकक-फकक कर रो रही थी। बड़ा बेटा रमनदीप अपनी दादी (वीर सिंह की मां) विमलादेवी के पास गुमसुम बैठा था। मां विमला देवी के मुख से बार-बार एक ही शब्द निकल रहा था मेरे घर का खिलौना चला गया...। गांव की महिलाएं उन्हें ढांढस बंधा रही थी। जैसे-जैसे दिन चढ़ रहा था गांव में आने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। गांव के सन्नाटे को महिलाओं का करुण क्रंदन चीर रहा था। लगभग दो हजार की आबादी वाले इस गांव में किसी घर में चूल्हे नहीं जले। गांव में अलग-अलग पेड़ के नीचे बैठे लोग शहीद वीर सिंह के पार्थिव शरीर के आने का इंतजार कर रहे थे।

रिक्शा चलाकर ‘वीर’ को पढ़ाया था पिता ने
रामसनेही बोले, मेरा तो सब कुछ चला गया
बेटों को इंजीनियर और आईएएस बनाना चाहते थे वीर सिंह
अमर उजाला ब्यूरो
फीरोजाबाद/ शिकोहाबाद। वीर सिंह के पिता रामसनेही एक छप्पर के नीचे गुमसुम बैठे थे। बेटे की शहादत का जिक्र आते ही उनकी आंखें भर आईं। बूढ़ी आंखों से अश्रुधारा फूट पड़ी। गला रूंध गया, बस इतना ही बोल पाए, क्या कहूं मेरा तो सब कुछ चला गया। एक वीर ही था जो घर की रोजीरोटी का सहारा था। मैं तो भूमिहीन हूं। कच्चा मकान है और खेती के लिए एक इंच जमीन नहीं। रिक्शा चला कर बेटे को पढ़ाया और फौज (सीआरपीएफ) में भेजा। छोटा बेटा रंजीत बेलदारी करता है। रूंधे गले से रामसनेही बोले पतो नाए आगे को जीवन कैसे कटेगो..सब कछू तो चलो गयो...।
जिस तरह पिता ने तमाम कष्ट झेले और बेटे को पढ़ाया, उसी तरह से वीर सिंह भी अपने बच्चों को उच्च शिक्षित बनाना चाहते थे। उनका खुद का बचपन गरीबी में गुजरा था। हाईस्कूल पास करते ही वर्ष 1991 में सीआरपीएफ में हवलदार के पद पर भर्ती हो गए थे। बच्चों की पढ़ाई का सपना पूरा करने के लिए उन्होंने गांव से निकल कर शिकोहाबाद में किराए पर एक मकान पत्नी को दिला दिया था। यहां वीर की पत्नी प्रीतादेवी अपने तीनों बच्चों के साथ रह रही थीं। बड़ी बेटी रजनी (20) जेएस कालेज शिकोहाबाद में एमएससी फाइनल ईयर में हैं। बड़ा बेटा रमनदीप (18) बीटेक की तैयारी कर रहा है। यूपीटीयू में उसका नंबर आ गया है लेकिन अभी काउंसलिंग नहीं हुई है। छोटा बेटा संदीप (17) ने इस वर्ष इंटर की परीक्षा पास की है। दोनों भाई शिकोहाबाद के ज्ञानदीप इंटर कालेज में पढ़ते हैं। रमनदीप और संदीप बताते हैं कि पिताजी जब भी घर आते थे तब सिर्फ पढ़ने की बात करते थे। जब भी फोन आता था तब पढ़ाई के बारे में ही पूछते थे। वीर सिंह से छोटी चार बहनें हैं सभी की शादी हो चुकी है। गत 22 मई को ही वह छुट्टी काटकर गए थे, रमनदीप ने बताया कि उससे कहा था कि बेटा खूब मन लगाकर पढ़ो, तुम्हें इंजीनियर बनना है। छोटे बेटे संदीप को आईएएस बनने के लिए प्रेरित कर गए थे।

दोपहर डेढ़ बजे हुई थी छोटे बेटे से बात
नगला केवल (ब्यूरो)। वीर सिंह के छोटे पुत्र संदीप ने बताया कि  शनिवार को ही दोपहर डेढ़ बजे ही उनका फोन आया था। तब वह तहसील में जाति प्रमाण पत्र बनवाने गया था। पिता ने पढ़ाई के बारे में पूछा और कहा कि फिजूल पैसे खर्च मत करना, पढ़ाई पर ध्यान देना। वह बताता है कि पिता जब भी घर आते थे तब कहते थे आईएएस या पीसीएस अफसर बनो। सेना में जाने की इच्छा तो बड़े अफसर बन कर जाओ। उनका सपना हमें अफसर बनाने का था..। इतना कहते-कहते संदीप की आंखें भर आईं

मैं फौज में जाऊंगा पिता की मौत का बदला लूंगा
वीर सिंह का बड़ा बेटा रमनदीप की आंखें रोते-रोते पथरा गई थीं। बीटेक की तैयारी कर रहे रमनदीप ने कहा कि वह इंजीनियर बनना चाहता था लेकिन अब उसकी इच्छा फौज में जाने की है। वह अपनी पिता की मौत का बदला लेना चाहता है। आतंकवादी और पाकिस्तान के खिलाफ उसका खून खौल रहा है।

रक्षाबंधन पर आने की कह गए थे
वीर सिंह 17 अप्रैल को छुट्टी लेकर गांव आए थे। वह 22 मई को ड्यूटी के लिए गांव से गए थे। उन्हें  सीआरपीएफ की नौकरी में 25 वर्ष पूरे हो गए थे। बीएसएफ में तैनात वीर सिंह के चचेरे भाई पूरन सिंह ने बताया कि वीर की सीआरपीएफ में सर्विस वर्ष 1991 में लगी थी।

प्रशासन की बेरुखी पर ग्रामीणों में गुस्सा
शिकोहाबाद (ब्यूरो)। नगला केवल के ग्रामीणों में प्रशासन की बेरुखी और सरकार की उदासीनता से जबरदस्त गुस्सा है। नगला केवल में रविवार को सुबह से ही गहमागहमी थी। शनिवार की शाम साढ़े सात बजे कश्मीर से सूचना आने के बाद शहीद के परिवार के साथ ही गांव में माहौल गमगीन हो गया था। रविवार सुबह नौ बजे तक किसी भी प्रशासनिक अधिकारी के गांव में न आने से लोग गुस्से में थे। इसके बाद तहसीलदार गांव में पहुंचे और शहीद की समाधि और अंत्येष्टि के लिए जगह आदि देखी। गांव वालों ने तंज भी कसा कि देखो अब आ रहे हैं....। बाद में ग्रामीणों के आक्रोश की जानकारी होने पर एसडीएम भी पहुंच गए। गांव वालों का कहना था कि गांव के लाल वीर सिंह ने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर दिया लेकिन जिले के प्रमुख अधिकारियों ने गांव आकर परिवार को ढांढस बंधाना भी जरूरी नहीं समझा।


क्या ऐसे ही जवान मरते रहेंगे...
आतंकी हमलों की बढ़ती घटनाओं से आहत एक ग्रामीण प्रदीप ने कहा कि क्या ऐसे ही जवान मरते रहेंगे और देश की सरकार चंद रुपये बांट कर जख्मों पर मरहम लगाती रहेगी। ऐसा कब तक चलेगा। आतंक के खिलाफ अब तो सरकार को कोई ठोस कार्रवाई करनी ही चाहिए।

मूल रूप से बाह आगरा के रहने वाले हैं
शिकोहाबाद (ब्यूरो)। वीर सिंह के पिता रामसनेहीलाल नागर (नट) परिवार के पालन पोषण के लिए अभी भी रिक्शा चला रहे हैं। वे मूल रूप से आगरा के बाह के गांव नरहौली का पुरा के रहने वाले थे। वर्षों पहले शिकोहाबाद के नगला केवल आकर रहने लगे।


वाकई वीर थे वीर सिह...
509 आर्मी बेस वर्कशाप आगरा में तैनात संजीव कुमार भी वीर सिंह के शहीद होने की खबर सुन कर गांव नगला केवल आ गए। संजीव कुमार के शिकोहाबाद स्थित आवास पर ही वीर सिंह के बच्चे किराए पर रहते हैं। संजीव कुमार ने बताया कि वीर सिंह अपने नाम के अनुरूप ही वीर थे। इससे पहले पांपोर में जब आतंकी हमला हुआ था तब उन्होंने साथियों के साथ किस तरह मोर्चा लिया यह वह बताते थे। शिकोहाबाद आने पर टीवी पर सेना जुड़ी फिल्म देखने पर वह अपने बच्चों को बताते थे कि किस तरह वह भी देश की सीमा पर दुश्मनों से लड़ते हैं।

सोने जा रहे थे तब ही मिली शहादत की खबर
शिकोहाबाद (ब्यूरो)। वीर सिंह के पुत्र संदीप ने बताया कि शनिवार की रात मां, भाई और बहन के साथ शिकोहाबाद में ही थे। रात आठ बजे करीब खाना आदि खाकर सभी लोग सोने की तैयारी कर रहे थे। तभी मोबाइल फोन की घंटी बजी। फोन मां ने अटेंड किया तो बताया कि सीआरपीएफ मुख्यालय से फोन है। फोन कंपनी कमांडर था। उन्होंने मां को तो कुछ नहीं बताया और कहा घर में कोई पुरुष हो तो बात कराएं। मां ने फोन मुझे (संदीप) को थमा दिया। कंपनी कमांडर ने कहा मेरा परिचय पूछा फिर चाचा या बाबा से बात कराने को कहा। जब उन्हें बताया कि सभी गांव में है तब मुझे ही बताया कि बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि वीर सिंह शहीद हो गए हैं। उधर से कुछ और कहा जाता इतना सुनते ही संदीप ने फोन काट दिया और दहाड़े मार कर रोने लगा। मां कुछ समझ नहीं पाई। बड़ी मुश्किल से मां को पूरी जानकारी दी। उसके बाद गांव में फोन करके बाबा और चाचा तक खबर भेजी। रात को ही हम शिकोहाबाद से गांव आ गए।

भईया छोड़ कर चले गए...
वीर सिंह के छोटे भाई रंजीत के आंसू थमने के नाम नहीं ले रहे थे। गांव में इधर-उधर कोने में खड़े होकर वह सुबक-सुबक कर रो रहा था। उसके मुख से बस यही शब्द निकल रहे थे भइया छोड़ कर चले गए...।
प्रोफाइल
नाम - वीर सिंह, उम्र 48 वर्ष
शिक्षा - हाई स्कूल
तैनाती - सीआरपीएफ बटालियन 161, हवलदार (हैडकांस्टेबल)
पिता - रामस्नेही  नागर, मां - विमला देवी
पत्नी - प्रीतादेवी, बच्चे - तीन (दो पुत्र एक बेटी)
भाई एक, बहन चार
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