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Fatehpur News: गुंबद तो मुगलकालीन, दावा किसका सही बताएगी जांच

Wed, 20 Aug 2025 01:51 AM IST
कानपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहपुर Updated Wed, 20 Aug 2025 01:51 AM IST
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The dome is of Mughal period, investigation will prove whose claim is correct
फोटो-34-इतिहासकार सतीश द्विवेदी। स्रोत: सोशल मीडिया
फतेहपुर। धार्मिक स्थल (मंदिर व मकबरा) के विवाद के बीच आर्किटेक्ट और इतिहासकार के भी अलग-अलग मत हैं। दोनों के मुताबिक, उक्त स्थल को मुगलकालीन बताया जा रहा है। दोनों के ही अपने-अपने मंदिर और मकबरे के दावे सामने आते हैं।
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हालांकि उनका यह भी कहना है कि उनके दावों का कोई प्रमाण नहीं है। ये सारे दावे ज्ञान और अनुभव के आधार पर है, लिहाजा इन्हें हकीकत कतई न माना जाए। असल में मंदिर है या मकबरा इसकी पुष्टि पुरातत्व विभाग की कोई विशेष टीम ही कर सकती है। इसके बाद उक्त स्थल की प्रामाणिकता साबित हो सकती है। प्रस्तुत है दोनों से बातचीत पर आधारित रिपोर्ट-
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हिंदू कारीगरों के हाथों बनी लग रही इमारत : इतिहासकार
इतिहासकार सतीश द्विवेदी का कहना है कि वह मंदिर और मकबरा को साबित नहीं कर सकते हैं। इतिहास के अनुसार उस पर राय ही दे सकते हैं। बताया कि मकबरे में गुबंद, मीनार व मेहराब होते हैं जबकि मंदिरों में स्तंभ, लिंटर और शिखर होते हैं। विवादित स्थल की इमारत काफी पुरानी है। ऐसा प्रतीत होता है कि मुगलों के पास अपने समुदाय की सभ्यता के अनुसार इमारत (मस्जिद व मकबरा आदि) बनाने वाले कारीगर नहीं थे। इस कारण वह मंदिरों का निर्माण करने वाले कारीगरों का ही इस्तेमाल करते थे, जो कि लाख प्रयास के बाद भी कहीं न कहीं इमारतों पर हिंदू निशान बना ही जाते थे, जो कि आबूनगर के मकबरे के साथ भी हुआ होगा। इस कारण मकबरे की गुंबद पर अधमुखी कमल भी स्थापित है।
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लटक रही जंजीर, बेल के भी निशान : वास्तुविद
आर्किटेक्ट (वास्तुकार) शैलेंद्र अवस्थी ने बताया कि मंदिर दो तरीके से बनते हैं। यह स्थान बारादरी मंदिर का स्वरूप है। बारादरी के मंदिर में ठाकुर द्वारा जरूर होता है। यह मुगलकाल का बना ही है। स्ट्रेक्चर के हिसाब से मंदिर है। बारादरी मंदिर में विभिन्न देवी-देवता होते हैं। सामूहिक रूप से सारे देवताओं की परिक्रिमा की जा सके। मुतवल्ली अनीस को 2009 के आसपास झाड़फूक करते देखा जाता था। वास्तुकला के हिसाब से विवादित स्थल पर कलश रूप तीन चार जगह दर्शाया गया हैं। मंदिर के चारों ओर डेढ़ दशक पहले मंदिरों के बाहर की डिजाइन बेल रूप थी, जो समय के साथ काफी हल्की हो गई है। इसके अलावा आज भी वहां लटकी जंजीर मंदिर के दावे को पुख्ता करती है, नहीं हटाई जा सकी। जंजीर का लोहा कितना पुराना है, यह भी जांच का विषय है।


एक ही गुंबद पर केसरिया और हरा रंग
धार्मिक स्थल में जो गुंबद बना है कि उसके ऊपर के हिस्से में आज भी केसरिया रंग दिखाई देता है जबकि नीचे का हिस्सा हरे रंग में है। ये दोनों अलग-अलग रंग भी दोनों ओर के पक्षकारों के लिए उनके दावे के मजबूत साक्ष्य हैं। देखने वाली बात यह है कि इन दोनों में सबसे पहले कौन था हरा या फिर केसरिया।

फोटो-34-इतिहासकार सतीश द्विवेदी। स्रोत: सोशल मीडिया

फोटो-34-इतिहासकार सतीश द्विवेदी। स्रोत: सोशल मीडिया

फोटो-34-इतिहासकार सतीश द्विवेदी। स्रोत: सोशल मीडिया

फोटो-34-इतिहासकार सतीश द्विवेदी। स्रोत: सोशल मीडिया

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