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किसान ने खेती का ट्रेंड बदलकर भर झोली
ब्यूरो, अमर उजाला फतेहपुर
Updated Mon, 25 Jan 2016 12:28 AM IST
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मेहनत, लगन और तकनीक के साथ नई सोच ने नेवादा गांव के
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एक साधारण किसान राजकुमार मौर्य को बड़ा कारोबारी बना दिया। मशरूम की खेती
करते समय पहले तो लोगों ने उन्हें कौतूहल भरी नजरों से देखा, फिर उपज खराब
होने की संभावना जताकर हतोत्साहित किया। इसके बावजूद राजकुमार अपनी ही धुन
में लगे रहे। आखिरकार वह मुकाम हासिल ही कर लिया, जिसके बारे में वह सोचा
करते थे। अब हालात यह है कि सूखा, ओलावृष्टि से फक्कड़ हो जाने का भी
उन्हें डर नहीं। दूसरे जिलों से लोग उनसे खेती का टिप्स लेने आते हैं और
मशरूम की सप्लाई तो प्रदेश के कई जिलों में हो रही है।
बता दें कि नेवादा गांव तेलियानी विकास खंड में बिलंदा कस्बे के पास है। राजकुमार पहले पारंपरिक खेती करते थे। कम आय की वजह से मिर्च की खेती करने लगे। मिर्च उगाई, फसल अच्छी भी हुई लेकिन फायदा वह नहीं हो रहा था जितना राजकुमार मन में सोचा करते थे।
मिर्च के साथ लहसुन की खेती की और इन्हीं दो खेती के सहारे कई बीघा खेत खरीद लिए। बकौल राजकुमार एक दिन वह कानपुर सब्जी मंडी में मिर्च लेकर गए थे, वहां पन्नी में मशरूम का पैक देखा। तीन साल पहले 40 रुपये का पैकेट खरीद कर लाए बनाया और खाया। यहीं से ठान ली कि मशरूम की खेती करके रहेंगे।
राजकुमार का कहना है कि वह कक्षा पांच तक पढ़े हैं, सीखने में पढ़ाई की कमी तो आड़े आई लेकिन हिम्मत नहीं छोड़ी। जहां-जहां मशरूम की खेती होने का पता चला, वहां गए। बाराबंकी, इलाहाबाद, वाराणसी व दिल्ली के फार्म हाउसों में जाकर मशरूम उगाना और उसे तैयार करना सीखा।
मन में जिज्ञासा हो तो कुछ भी सीखा जा सकता है, सो वह भी मशरूम की खेती सीख गए। अब तो बड़ी-बड़ी डिग्री वाले उनके पास मशरूम की खेती का गुर सीखने आते हैं। राजकुमार इन दिनों चार बीघे में मशरूम की खेती कर रहें है। इसकी खेती के लिए सबसे पहले भूसे को 11-12 बार गीला करना पड़ता है।
हर 48 घंटे बाद भूसे को पलटना होता है। इसकी खेती में पुवाल की हट (झोपड़ी) बनायी जाती है । हट की लंबाई एवं चौड़ाई का अनुपात 60 बाई 22 फुट है। एक हट में 15 अलमारियों बनाई जाती है। हट के अंदर बांस की रैकनुमा अलमारियां बनानी पड़ती है। इन लकड़ी की अलमारियां में भूसे की लुगदी को डाला जाता है ।
उसी बांस में मशरूम के बीज डाले जाते है। इसकी शुरुआत ठंड के दस्तक देते ही शुरू कर दी जाती है। सीडिंग से 40 दिन बाद मशरूम पूरी तरह तैयार हो जाता है। बतौर राजकुमार एक दिन में औसतन चार क्विंटल उगा लेते हैं। कीमत 120 रुपए प्रति किलो की है।
उन्होंने बताया कि इसकी बिक्री बनारस, लखनऊ, फैजाबाद, उन्नाव आदि जनपदों में होती है। जिसके लिए पेटियों में बर्फ लगाकर भेजा जाता है। जिला उद्यान अधिकारी अनीस कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि मशरूम की खेती किसानों के लिए बहुत ही फायदेमंद है।
कम क्षेत्रफल में भी इसका उत्पादन किया जा सकता है। मशरूम में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फैट होता है। यह मीट से ज्यादा पौष्टिक होता है। इच्छुक किसान विभाग से संपर्क कर सकते हैं। नेशनल हार्डीकल्चर बोर्ड से किसानों को अनुदान भी मिल सकता है।’
बता दें कि नेवादा गांव तेलियानी विकास खंड में बिलंदा कस्बे के पास है। राजकुमार पहले पारंपरिक खेती करते थे। कम आय की वजह से मिर्च की खेती करने लगे। मिर्च उगाई, फसल अच्छी भी हुई लेकिन फायदा वह नहीं हो रहा था जितना राजकुमार मन में सोचा करते थे।
मिर्च के साथ लहसुन की खेती की और इन्हीं दो खेती के सहारे कई बीघा खेत खरीद लिए। बकौल राजकुमार एक दिन वह कानपुर सब्जी मंडी में मिर्च लेकर गए थे, वहां पन्नी में मशरूम का पैक देखा। तीन साल पहले 40 रुपये का पैकेट खरीद कर लाए बनाया और खाया। यहीं से ठान ली कि मशरूम की खेती करके रहेंगे।
राजकुमार का कहना है कि वह कक्षा पांच तक पढ़े हैं, सीखने में पढ़ाई की कमी तो आड़े आई लेकिन हिम्मत नहीं छोड़ी। जहां-जहां मशरूम की खेती होने का पता चला, वहां गए। बाराबंकी, इलाहाबाद, वाराणसी व दिल्ली के फार्म हाउसों में जाकर मशरूम उगाना और उसे तैयार करना सीखा।
मन में जिज्ञासा हो तो कुछ भी सीखा जा सकता है, सो वह भी मशरूम की खेती सीख गए। अब तो बड़ी-बड़ी डिग्री वाले उनके पास मशरूम की खेती का गुर सीखने आते हैं। राजकुमार इन दिनों चार बीघे में मशरूम की खेती कर रहें है। इसकी खेती के लिए सबसे पहले भूसे को 11-12 बार गीला करना पड़ता है।
हर 48 घंटे बाद भूसे को पलटना होता है। इसकी खेती में पुवाल की हट (झोपड़ी) बनायी जाती है । हट की लंबाई एवं चौड़ाई का अनुपात 60 बाई 22 फुट है। एक हट में 15 अलमारियों बनाई जाती है। हट के अंदर बांस की रैकनुमा अलमारियां बनानी पड़ती है। इन लकड़ी की अलमारियां में भूसे की लुगदी को डाला जाता है ।
उसी बांस में मशरूम के बीज डाले जाते है। इसकी शुरुआत ठंड के दस्तक देते ही शुरू कर दी जाती है। सीडिंग से 40 दिन बाद मशरूम पूरी तरह तैयार हो जाता है। बतौर राजकुमार एक दिन में औसतन चार क्विंटल उगा लेते हैं। कीमत 120 रुपए प्रति किलो की है।
उन्होंने बताया कि इसकी बिक्री बनारस, लखनऊ, फैजाबाद, उन्नाव आदि जनपदों में होती है। जिसके लिए पेटियों में बर्फ लगाकर भेजा जाता है। जिला उद्यान अधिकारी अनीस कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि मशरूम की खेती किसानों के लिए बहुत ही फायदेमंद है।
कम क्षेत्रफल में भी इसका उत्पादन किया जा सकता है। मशरूम में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फैट होता है। यह मीट से ज्यादा पौष्टिक होता है। इच्छुक किसान विभाग से संपर्क कर सकते हैं। नेशनल हार्डीकल्चर बोर्ड से किसानों को अनुदान भी मिल सकता है।’