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Fatehpur News: नहीं रहे प्रख्यात सहित्यकार डॉ. ओमप्रकाश अवस्थी
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फतेहपुर। जिले के प्रख्यात साहित्यकार, लेखक, संपादक और समाजवादी विचारक डॉ. ओमप्रकाश अवस्थी का निधन हो गया। वह 89 वर्ष के थे। साहित्यकार ने शहर के कटरा अब्दुलगी स्थित निज आवास में सोमवार दोपहर अंतिम सांस ली। साहित्यकार ने रेलवे के मालबाबू से लेकर महात्मा गांधी डिग्री काॅलेज के प्राचार्य तक का सफर तय किया।
बिंदकी तहसील के मौहार में 26 जुलाई 1937 में जन्मे साहित्यकार डॉ. ओमप्रकाश अवस्थी गांव से आकर शहर के कटरा अब्दुलगनी में अपना आवास बनाया। उनका जाना जिले के इतिहास, पुरातत्व और साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। उन्होंने साहित्य साधना की। यहीं से जिले की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों को खोजकर अपने शब्दों में पिरोया।
लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे साहित्यकार के निधन की खबर फैलते ही साहित्य, शिक्षा और सामाजिक जगत में शोक की लहर दौड़ गईं। इनके जाने से इतिहास का एक चलता-फिरता अध्याय बंद हो गया है।
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माल बाबू की नौकरी छोड़ की पीएचडी
अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद डॉ. ओपी अवस्थी ने रेलवे में माल बाबू की नौकरी की। शुरुआती दिनों में वह कानपुर में तैनात रहे लेकिन उनका मन नौकरी में नहीं लगा। क्योंकि उनका मन हिंदी साहित्य और वैचारिक अध्ययन में रमा हुआ था। शिक्षा के प्रति गहरे लगाव ने उन्हें हरियाणा की ओर खींच लिया, जहां उन्होंने हिंदी साहित्य से पीएचडी की उपाधि हासिल की। उत्तर प्रदेश सरकार का अज्ञेय कवि सम्मान, विश्व हिंदी सम्मेलन का सहर्षताब्दी हिंदी सेवी सम्मान और मालती साहित्य सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। उन्होंने अपने जीवन में लगभग अस्सी शोध एवं आलोचनात्मक लेख लिखे।
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बिंदकी तहसील के मौहार में 26 जुलाई 1937 में जन्मे साहित्यकार डॉ. ओमप्रकाश अवस्थी गांव से आकर शहर के कटरा अब्दुलगनी में अपना आवास बनाया। उनका जाना जिले के इतिहास, पुरातत्व और साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। उन्होंने साहित्य साधना की। यहीं से जिले की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों को खोजकर अपने शब्दों में पिरोया।
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लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे साहित्यकार के निधन की खबर फैलते ही साहित्य, शिक्षा और सामाजिक जगत में शोक की लहर दौड़ गईं। इनके जाने से इतिहास का एक चलता-फिरता अध्याय बंद हो गया है।
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माल बाबू की नौकरी छोड़ की पीएचडी
अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद डॉ. ओपी अवस्थी ने रेलवे में माल बाबू की नौकरी की। शुरुआती दिनों में वह कानपुर में तैनात रहे लेकिन उनका मन नौकरी में नहीं लगा। क्योंकि उनका मन हिंदी साहित्य और वैचारिक अध्ययन में रमा हुआ था। शिक्षा के प्रति गहरे लगाव ने उन्हें हरियाणा की ओर खींच लिया, जहां उन्होंने हिंदी साहित्य से पीएचडी की उपाधि हासिल की। उत्तर प्रदेश सरकार का अज्ञेय कवि सम्मान, विश्व हिंदी सम्मेलन का सहर्षताब्दी हिंदी सेवी सम्मान और मालती साहित्य सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। उन्होंने अपने जीवन में लगभग अस्सी शोध एवं आलोचनात्मक लेख लिखे।