{"_id":"572110e84f1c1bb938a91c61","slug":"people-will-remember-the-martyrs-forever","type":"story","status":"publish","title_hn":"शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले...","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले...
ब्यूरो अमर उजाला, फतेहपुर
Updated Thu, 28 Apr 2016 12:50 AM IST
विज्ञापन
इसी इमली के पेड़ में दी गई थी बावन क्रंतिकारियों को फांसी
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बिंदकी तहसील मुख्यालय से चार किलोमीटर दूर बावनी इमली कांड का शहीद स्थल है। यह कांड आजादी की जंग में पूरे देश में गूंजा था। यहां 28 अप्रैल 1858 को महान क्रांतिकारी जोधासिंह अटैया व उनके 51 साथियों को अंग्रेजों ने इमली के पेड़ पर एक साथ फांसी दे दी थी। इस खौफनाक मंजर से समूचे देश में अंग्रेजों की बर्बरता की दहशत फैल गई थी। इस घटना का गवाह आज भी शहीद स्थल बावनी इमली में खड़ा बूढ़ा पेड़ है।अमर शहीदों की याद में 28 अप्रैल को शहीद दिवस मनाकर कार्यक्रम आयोजित किया जाता है।
विज्ञापन
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले। वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा। बुजुर्गों से मिली जानकारी के अनुसार प्लासी युद्ध के खत्म होते- होते अंग्रेजी शासन का झंडा लहराने लगा था। लार्ड डलहौजी की राज्य हड़पो नीति का विरोध देश के राजाओं ने भी शुरू कर दिया था।
विज्ञापन
दिल्ली के हटाए गए मुगल शासक बहादुर शाह जफर, नाना साहब कानपुर और रानी लक्ष्मीबाई के बीच संवाद सूत्र के रूप में अजीमुल्ला खां साहब से बिंदकी तहसील क्षेत्र के गांव रसूलपुर निवासी महान क्रांतिकारी जोधा सिंह अटैया की मुलाकात हो चुकी थी।
विज्ञापन
अंग्रेजों के अत्याचारी शासन के खिलाफ आमजनों में जागृति लाकर क्रांतिकारी जोधा सिंह अटैया ने स्वतंत्रता के प्रथम आंदोलन 1857 में यहां से बिगुल फूंक दिया। अपने साथियों के साथ अनेक गुरिल्ले आक्र मण किए, अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला देने वाले इस महान क्रांतिकारी से अंग्रेज अफसर परेशान हो गए।
अंग्रेजों ने अंतत: जोधा सिंह अटैया और उनके 51 साथियों को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद बावन क्रांतिकारियों को एक साथ फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। जोधा सिंह अटैया व उनके साथियों को बिंदकी व खजुहा के बीच इमली के पेड़ पर फांसी के फंदे पर लटका कर मौत के घाट उतार दिया गया।
बता दें कि अंग्रेजों ने धमकी दी थी कि यदि किसी ने इन शवों को उतारकर अंतिम संस्कार किया तो उनकी हालत क्रांतिकारियों से बदतर की जाएगी। जनमानस में डर फैल गया था और 3-4 जून तक शव वैसे ही लटके रहे थे। इस कांड से भयभीत ग्रामीणों ने घर तक छोड़ दिए थे, शव सड़ने लगे थे।
गिद्ध तथा चील कौओं ने महक पाकर पेड़ को अपना ठिकाना बना लिया था। जंगली जानवर भी पहुंच गए। कुछ दिनों बाद इन शवों के महज अस्थिपंजर ही लटकते नजर आए। इधर क्रांतिकारियों में अंग्रेजों के विरुद्ध ज्वाला धधक रही थी, क्रांतिकारियों के अस्थिपंजरों के लटकने की सूचना महराज सिंह के कानों तक पहुंची।
वह तीन सौ क्रांतिकरियों के साथ जंगलों के रास्ते होते हुए बावनी इमली पहुंचे और पेड़ में झूल रहे क्रांतिकारियों के अस्थिपंजरों को उतारा और शवों को गंगाघाट शिवराजपुर में प्रवाहित कर सबका अंतिम संस्कार किया।