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फ्लैग- कठपुतली बिरादरी के पिछड़ेपन का दाग धुलने में जुटी सलमा
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फतेहपुर। किसी भी समाज की तरक्की का रास्ता तहजीब (संस्कार) और तालीम (शिक्षा) के बिना पूरा नहीं हो सकता। शायद यह बात सलमा से अच्छा कौन जान सकता है। वह एक ऐसी बिरादरी से हैं जो इक्कीसवी सदी का तमगा लिए इस समाज की मुख्यधारा से अभी भी कटी है। बिरादरी के किसी परिवार का जीवनयापन कूड़े के ढेर से हो रहा है तो किसी का भीख मांग कर या फिर मेला में जादू दिखाकर। यही वजह रही कि आठ साल पहले सलमा के जेहन में समाज को पढ़ालिखा कर मुख्यधारा से जोड़ने की बात आई। वह असहयोग की परवाह किए बिना डेढ़ सौ परिवार की बस्ती में शिक्षा व संस्कार की अलख जगा रही है।
बात हो रही है- शहर के अरबपुर मोहल्ले में करीब डेढ़ सौ परिवार कठपुतली बिरादरी के हैं सलमा खातून भी इसी मोहल्ले की हैं। वैसे तो सलमा ने अपना कॅरियर तलाशने के लिए टीचिंग लाइन पकड़ी, लेकिन चंद दिन में ही जो कुछ भी महसूस किया, उसके बाद सलमा के जीने का नजरिया बदल गया। सलमा ने बताया कि विशेष बाल
श्रमिक विद्यालय का संचालन होता था, वह पढ़ाती थीं। दो साल पहले बंद हो जाने से बिरादरी के बच्चे फिर से पुश्तैनी कार्यों में तल्लीन होने लगे थे। आंखों से यह देखा नहीं गया। लिहाजा उन्होंने अपने मन की बात नेहरू युवा संगठन टीसी से रखी। एनजीओ के प्रमुख राजेंद्र साहू ने सामाजिक सरोकार की इस मुहिम मेें पूरा सहयोग दिया।
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आज उसे खुशी है कि संस्कारशाला की बदौलत कठपुुतली बिरादरी में थोड़ी ही सही, बदलाव की बयार दिखने लगी है। बेशक, यह काम चुनौती भरा है क्योंकि अभी भी जमात से बहुत अच्छा सहयोग नहीं मिल पा रहा है लेकिन मेरा मानना है कि इच्छा शक्ति से बढ़कर कामयाबी का दूसरा कोई और फलसफा नहीं।
सलमा की संस्कारशाला में मौजूदा वक्त 50 बच्चे शिक्षारत हैं। यह वही बच्चे हैं जो कबाड़ बीनने से लेकर भीख मांगने का काम करते रहे हैं लेकिन अब इनकी जिंदगी के मायने बदलने लगे हैं। मतीन के बेटे निहाल हो या फिर हैदरअली का बेटा फैजल। यह सब, कबाड़ के ढेर पर भविष्य खोजने की बजाय संस्कारशाला में उसे संवारना अच्छा समझने लगे हैं। नसीब की बेटी तमन्ना की बात हो या फिर इरफान की बेटी खुशबू की। यह वह लड़कियां हैं जो पहले ठीक से बोलना नहीं जानती थी लेकिन अब वह फर्राटे के साथ हाजिर जवाब हो गई हैं।
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बात हो रही है- शहर के अरबपुर मोहल्ले में करीब डेढ़ सौ परिवार कठपुतली बिरादरी के हैं सलमा खातून भी इसी मोहल्ले की हैं। वैसे तो सलमा ने अपना कॅरियर तलाशने के लिए टीचिंग लाइन पकड़ी, लेकिन चंद दिन में ही जो कुछ भी महसूस किया, उसके बाद सलमा के जीने का नजरिया बदल गया। सलमा ने बताया कि विशेष बाल
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श्रमिक विद्यालय का संचालन होता था, वह पढ़ाती थीं। दो साल पहले बंद हो जाने से बिरादरी के बच्चे फिर से पुश्तैनी कार्यों में तल्लीन होने लगे थे। आंखों से यह देखा नहीं गया। लिहाजा उन्होंने अपने मन की बात नेहरू युवा संगठन टीसी से रखी। एनजीओ के प्रमुख राजेंद्र साहू ने सामाजिक सरोकार की इस मुहिम मेें पूरा सहयोग दिया।
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आज उसे खुशी है कि संस्कारशाला की बदौलत कठपुुतली बिरादरी में थोड़ी ही सही, बदलाव की बयार दिखने लगी है। बेशक, यह काम चुनौती भरा है क्योंकि अभी भी जमात से बहुत अच्छा सहयोग नहीं मिल पा रहा है लेकिन मेरा मानना है कि इच्छा शक्ति से बढ़कर कामयाबी का दूसरा कोई और फलसफा नहीं।
सलमा की संस्कारशाला में मौजूदा वक्त 50 बच्चे शिक्षारत हैं। यह वही बच्चे हैं जो कबाड़ बीनने से लेकर भीख मांगने का काम करते रहे हैं लेकिन अब इनकी जिंदगी के मायने बदलने लगे हैं। मतीन के बेटे निहाल हो या फिर हैदरअली का बेटा फैजल। यह सब, कबाड़ के ढेर पर भविष्य खोजने की बजाय संस्कारशाला में उसे संवारना अच्छा समझने लगे हैं। नसीब की बेटी तमन्ना की बात हो या फिर इरफान की बेटी खुशबू की। यह वह लड़कियां हैं जो पहले ठीक से बोलना नहीं जानती थी लेकिन अब वह फर्राटे के साथ हाजिर जवाब हो गई हैं।