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Fatehpur News: जरा याद करो कुर्बानी..आंदोलनों में स्वतंत्रता सेनानियों की कहानी

Thu, 15 Aug 2024 03:02 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Thu, 15 Aug 2024 03:02 AM IST
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Just remember the sacrifices...the story of freedom fighters in the movements
फतेहपुर। दोआबा की पावन धरती के सपूतों ने स्वतंत्रता संग्राम में हर आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सेदारी निभाई। क्रूर बरदानी हुकूमत के खिलाफ जेल हो या बलिदान वह किसी से पीछे नहीं हटे। 1857 से 1942 तक के चले सभी आंदोलनों के शामिल रहे बड़ी संख्या में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गुमनामी में खोए हैं। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के स्वर्णिम इतिहास के बारे में इतिहासकार डाॅ. रंजन कुमार बताते हैं कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में खागा के दरियाव सिंह, सुजान सिंह, हिकम्मतुल्लाह खान (तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर) के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह भड़का था। आठ जून 1857 को सुजान सिंह ने क्रांतिकारियों संग खागा को ब्रिटिश कंपनी शासन से मुक्त कराया था। प्रमुख आंदोलनकारी ठाकुर बहादुर सिंह, बख्तावर सिंह, रघुनाथ सिंह, तुरंग सिंह, निर्मल सिंह, देवीदीन सिंह, रणजीत सिंह, मियांबक्श, मोहम्मद यासीन, गंगादीन, बैजू, सुखना, ईश्वरी सिंह, हिम्मत सिंह रहे। खागा के बाद सुजान सिंह मुख्यालय शहर की ओर बढ़े। 10 जून 1857 को यहां भी कंपनी को खदेड़ा। यहां कार्यरत अंग्रेज अधिकारी जान बचाकर यमुना नदी पारकर बांदा के रास्ते इलाहाबाद की ओर भागे थे। जज टकर क्रांतिकारियों के हाथों मारा गया था। मेजर रेनॉल्ट अंग्रेजी सेना के लाव लश्कर के साथ जुलाई के पहले हफ्ते में खागा पहुंचा और क्रांतिकारियों को पराजित किया। खागा पतन के बाद जनरल हेवलॉक ने 12 जुलाई को शहर कब्जे में ले लिया। 15 जुलाई 1857 को हेवलॉक की सेना ने जिले की सीमा के अंतिम हिस्से औंग पर कब्जा स्थापित किया और उसी दिन पांडु नदी पार कर कानपुर में प्रवेश किया था। बदला लेने की भावना से ग्रसित अंग्रेजी हुकूमत ने कई क्रांतिकारियों के साथ ही मासूमों की हत्या की थी। आंदोलन में 850 आंदोलनकारी गिरफ्तार हुए।
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असहयोग आंदोलन: 1920 में बाजार हुए बंद
नौ जून 1920 को गांधी के नेतृत्व में अहिंसक असहयोग आंदोलन छेड़ा गया था। दो अगस्त 1920 को शहर के हजारीलाल के फाटक चौक स्वतंत्रता सेनानी अधिवक्ता बाबू बंश गोपाल, झंडा गीत रचयिता श्यामलाल पार्षद के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन शुरू हुआ। इस दिन सभी बाजार बंद रहे। आंदोलन में वैचारिक आधार देने में हसवा के आरिफ हसन हस्वी का योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने दिल्ली में हुर्रियत नाम का एक अखबार निकाला। आरिफ हसन हस्वी दिल्ली से निकलने वालीं तत्कालीन पत्रिकाएं मौलवी, हमदम के संपादक थे। आंदोलनकारियों ने दो साल कारावास भुगता था। बाबू बंशगोपाल व राम प्रसाद मिश्रा की गिरफ्तारी हुई थी। श्यामलाल पार्षद को एक माह कारावास हुआ था। महावीर प्रसाद शुक्ला, स्वामी शिवानंद, उमाशंकर श्रीवास्तव वकील को धारा 144 की नोटिस देकर आंदोलन से दूर रहने की पाबंदी की गई। शहर स्थित वैश्य प्रेस को 1000 रुपये की जमानत मांगी कि वह आंदोलन से संबंधित सामग्री नहीं छपेगा। राशि न देने पर प्रेस बंद हो गया। असहयोग आंदोलन में लगभग 100 गिरफ्तारियां हुईं।
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नमक सत्याग्रह 1930 में छोड़ीं नौकरियां
नमक सत्याग्र्रह को सविनय अवज्ञा आंदोलन के नाम से भी जाना गया। आंदोलन में भारी संख्या में छात्रों ने स्कूल का त्याग किया। शाखा गांव के इंद्रपाल सिंह, खजुहा के राम प्रसाद श्रीवास्तव, गाजीपुर के छत्रपाल सिंह, गोपालगंज के रामविलास समेत कई ने सरकारी पदों से त्यागपत्र दिया। तत्कालीन जिला कांग्रेस कमेटी के प्रधानमंत्री वंश गोपाल ने कानपुर के सत्याग्रहों से नमक खरीदकर जनपद के वकीलों के बीच बेचा। 29 अप्रैल 1930 को बाबू बंशगोपाल वकील ने अपने कुछ साथियों के साथ हजारीलाल के फाटक में नमक कानून को तोड़ा। इस पर बाबू बंश गोपाल, महादेव, विश्वनाथ प्रसाद गुप्त, गजाधर व देवकीनंदन की गिरफ्तारी हुई और छह माह के कठोर कारावास का दंड दिया गया। इनके बाद युगल किशोर द्विवेदी (असनी), स्वामी विद्यानंद, विनायक प्रसाद (डेलेमऊ), रामनाथ विद्या (घनघौल), गयाराम अग्रवाल (खागा), शिवराज बली सिंह (लेहेंगी), पन्नालाल गुप्त (बिंदकी), गया प्रसाद मिश्र (मेवली खागा) सुशीला देवी पत्नी रामनाथ वैद्य (घनघौल), रामनाथ चौबे (महेशपुर किशनपुर), बद्री प्रसाद दुबे (बड़ागांव), जागेश्वर (हथगाम), जयराम सिंह (कुशारा), देवकीनंदन (फुलवामऊ), जग्गू भांट (सांखा) आदि ने जनपद में नमक आंदोलन में सक्रिय भूमिका अदा की। आंदोलन अवधि में लगभग 600 गिरफ्तारियां हुई थीं।
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भारत छोड़ो आंदोलन 1942 में तंत्र को पहुंचाई क्षति
इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले करीब 350 सत्याग्रही गिरफ्तार हुए थे। गांधी के आठ अगस्त 1942 को करो या मरो के बुलंद नारे पर प्रमुख कांग्रेसी नेता बाबू बंश गोपाल, युगल किशोर द्विवेदी, गुरु प्रसाद पांडेय, अधिवक्ता शंभूनाथ, शिवराजबली सिंह, शिवदयाल उपाध्याय, दयाशंकर मिश्र, तेज बहादुर सिंह की गिरफ्तारी हुई। 10 अगस्त 1942 को गंगा प्रसाद (पैगंबरपुर), गुलाब सिंह (करचलपुर), भरोसे (कुंवरपुर भरवा), यदुनंदन (सरकंडी), रामगोपाल (ढिढोरी), सूरजदीन दुबे (गिरनई), स्वामी महावीर विषहर, वासुदेव दीक्षित (हथगाम) सहित तमाम लोग गिरफ्तार हुए। इन पर भारी संख्या में सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया, टेलीफोन के तार काटे, डाकघर लूट, रेलवे का संचार तंत्र ठप किया था।
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