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दस्तक न सुनने से पैदा हुआ पेयजल संकट
ब्यूरो/ अमर उजाला, फतेहपुर।
Updated Sat, 06 Feb 2016 12:08 AM IST
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शहर में पेयजल संकट की आशंका 10 साल पहले ही पैदा हो गई थी। केंद्र से आई टीम की रिपोर्ट पर शहर में रेनवाटर हार्वेस्टिंग परियोजना लागू करने को हरी झंडी मिली थी, लेकिन नगर पालिका के अंशराशि जमा न करने के कारण परियोजना का क्रियान्वयन नहीं हो पाया। इस परियोजना के तहत जलस्तर की रिचार्जिंग की व्यवस्था कर घटते जलस्तर को रोकने का प्रावधान किया गया था।
वर्ष 2005 मेें केंद्र से आई टीम ने शहर के स्रोतों का परीक्षण किया था। इसके बाद अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को दी थी। रिपोर्ट के आधार पर केंद्र ने शहर में रेनवाटर हार्वेस्टिंग परियोजना लागू करने के निर्देश दिए थे। परियोजना में आने वाले खर्च का 80 फीसदी केंद्र तथा 10-10 फीसदी अंशराशि राज्य सरकार और निकाय को करना था। कई बोर्ड आए और चले गए, लेकिन इस परियोजना के क्रियान्वयन की तरफ किसी ने मुड़कर नहीं देखा।
परियोजना के पहले चरण में शहर के 16 सरकारी बड़े दफ्तर चिह्नित किए गए थे। इन भवनों में कलेक्ट्रेट, विकास भवन, दीवानी न्यायालय, जिला जेल, डायट, जिला महिला अस्पताल, जिला पुरुष अस्पताल, सीएमओ कार्यालय, जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान, बीएसए दफ्तर, डीआईओएस दफ्तर आदि शामिल हैं।
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इन सभी भवनों की छतों पर बरसाती पानी एकत्र करके पाइप के रास्ते समीप कराई गई बोरिंग के अंदर छोड़ना था। इस व्यवस्था के तहत घटते जलस्तर की रिचार्जिंग की व्यवस्था का जानी थी। केंद्र ने यह भी निर्देश जारी किए थे, नए निजी और सरकारी भवनों के नक्शे तभी पास किए जाएं, जब संबंधित विभाग या फिर व्यक्ति रेनवाटर हार्वेस्टिंग परियोजना के क्रियान्वयन का शपथ पत्र दाखिल करे।
केंद्र की यह परियोजना कुछ दिन तो चर्चा में रही, लेकिन इसके बाद नगर पालिका परिषद ने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। वर्तमान समय में परियोजना नगर पालिका परिषद के अभिलेखों से पूरी तरह से गायब हो चुकी है। परिणाम स्वरूप शहर का जलस्तर इतना नीचे जा चुका है, कि जलकल के नलकूप दगा देने लगे हैं। यही हाल रहा, तो भीषण गर्मी के मौसम में कम से कम 50 प्रतिशत नलकूप बंद हो जाएंगे। ऐसी दशा में शहर में पीने के पानी के लिए हाहाकार मच जाएगा।
इनसेट:
काश परियोजना लागू हो गई होती
फतेहपुर। जलकल विभाग के अवर अभियंता गौरीशंकर पटेल का कहना है कि काश दस साल पहले शहर में रेनवाटर हार्वेस्टिंग परियोजना पर क्रियान्वयन हो गया होता, तो नलकूप बंद होने की स्थिति पैदा नहीं होती। परियोजना के तहत भू जलस्तर की रिचार्जिंग होती रहती और जलस्तर अपने स्थान पर बना रहता।
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वर्ष 2005 मेें केंद्र से आई टीम ने शहर के स्रोतों का परीक्षण किया था। इसके बाद अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को दी थी। रिपोर्ट के आधार पर केंद्र ने शहर में रेनवाटर हार्वेस्टिंग परियोजना लागू करने के निर्देश दिए थे। परियोजना में आने वाले खर्च का 80 फीसदी केंद्र तथा 10-10 फीसदी अंशराशि राज्य सरकार और निकाय को करना था। कई बोर्ड आए और चले गए, लेकिन इस परियोजना के क्रियान्वयन की तरफ किसी ने मुड़कर नहीं देखा।
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परियोजना के पहले चरण में शहर के 16 सरकारी बड़े दफ्तर चिह्नित किए गए थे। इन भवनों में कलेक्ट्रेट, विकास भवन, दीवानी न्यायालय, जिला जेल, डायट, जिला महिला अस्पताल, जिला पुरुष अस्पताल, सीएमओ कार्यालय, जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान, बीएसए दफ्तर, डीआईओएस दफ्तर आदि शामिल हैं।
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इन सभी भवनों की छतों पर बरसाती पानी एकत्र करके पाइप के रास्ते समीप कराई गई बोरिंग के अंदर छोड़ना था। इस व्यवस्था के तहत घटते जलस्तर की रिचार्जिंग की व्यवस्था का जानी थी। केंद्र ने यह भी निर्देश जारी किए थे, नए निजी और सरकारी भवनों के नक्शे तभी पास किए जाएं, जब संबंधित विभाग या फिर व्यक्ति रेनवाटर हार्वेस्टिंग परियोजना के क्रियान्वयन का शपथ पत्र दाखिल करे।
केंद्र की यह परियोजना कुछ दिन तो चर्चा में रही, लेकिन इसके बाद नगर पालिका परिषद ने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। वर्तमान समय में परियोजना नगर पालिका परिषद के अभिलेखों से पूरी तरह से गायब हो चुकी है। परिणाम स्वरूप शहर का जलस्तर इतना नीचे जा चुका है, कि जलकल के नलकूप दगा देने लगे हैं। यही हाल रहा, तो भीषण गर्मी के मौसम में कम से कम 50 प्रतिशत नलकूप बंद हो जाएंगे। ऐसी दशा में शहर में पीने के पानी के लिए हाहाकार मच जाएगा।
इनसेट:
काश परियोजना लागू हो गई होती
फतेहपुर। जलकल विभाग के अवर अभियंता गौरीशंकर पटेल का कहना है कि काश दस साल पहले शहर में रेनवाटर हार्वेस्टिंग परियोजना पर क्रियान्वयन हो गया होता, तो नलकूप बंद होने की स्थिति पैदा नहीं होती। परियोजना के तहत भू जलस्तर की रिचार्जिंग होती रहती और जलस्तर अपने स्थान पर बना रहता।
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