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निरस्त पट्टों को लखनऊ के इशारे पर दे दी गई खनन की परमीशन
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मौरंग खदानों के संचालन में हुए खेल की जांच में जुटी सीबीआई ने पांचवें दिन शुक्रवार को खनन विभाग और कलक्ट्रेट में फाइलें खंगाली।
करीब सात घंटे तक सीबीआई इन दोनों विभागों में जमी रही। 2012 से 2017 के बीच खदानों के संचालन की जांच में सामने आया कि अफसरों ने निरस्त पट्टों को भी लखनऊ के इशारे पर संचालन की परमीशन दे दी। जिले के दो पट्टों के मामले में यह बात सामने भी आई है। इसमें जिले से लेकर लखनऊ में बैठे तत्कालीन अफसर और मंत्री तक की भूमिका का पता चला है। 2012 से 2017 के बीच खनन विभाग से जारी एमएम-11 (रवन्ना) के आंकड़े भी सीबीआई ने जुटाए हैं। जिसमें बड़ी गड़बड़ी होने की बात सामने आ रही है।
2012 से 2017 के बीच जिले की कोर्रा कनक खदान का संचालन शिव सिंह और गुरुवल खदान का संचालन सुखराज को मिला था। नवंबर 2006 से नवंबर 2009 के बीच तीन साल के लिए शिव सिंह को कोर्रा कनक में खनन क्षेत्र का पट्टा मिला था। मार्च 2009 को उसने पट्टे के नवीनीकरण के लिए आवेदन किया।
लेकिन बकायेदारी के चलते उसका आवेदन कैंसिल कर दिया गया। इसके बाद शिव सिंह ने अफसरों से मिलीभगत कर एक मई 2012 को सभी बकाये का भुगतान कर दिया और फिर 16 मई 2012 को खनन विभाग ने उसे नो ड्यूज का सर्टिफिकेट दे दिया।
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फतेहपुर के तत्कालीन डीएम ने भी इस फाइल को मंजूरी के लिए शासन को भेज दी। जिसे बाद में लखनऊ में बैठे तत्कालीन अफसरों और मंत्री ने अपनी स्वीकृति दे दी। इसके बाद जनवरी 2014 से 2017 तक यानि तीन साल के लिए शिव सिंह को फिर पट्टा मिल गया। 2012 में शासन से ई-टेंडरिंग के जारी आदेश को इस मामले में नजरअंदाज किया गया।
इसी तरह, पट्टाधारक सुखराज को गुरुवल में खनन का पट्टा मिला लेकिन इसकी भी अवैध तरीके से लीज बढ़ा दी गई। सुखराज के पट्टे को नवंबर 2013 में निरस्त किया गया। लेकिन जब सुखराज ने अफसरों के सात मिलीभगत कर फाइल आगे बढ़ाई तो तत्कालीन डीएम ने अक्तूबर 2014 में इसे स्वीकृति दे दी।
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करीब सात घंटे तक सीबीआई इन दोनों विभागों में जमी रही। 2012 से 2017 के बीच खदानों के संचालन की जांच में सामने आया कि अफसरों ने निरस्त पट्टों को भी लखनऊ के इशारे पर संचालन की परमीशन दे दी। जिले के दो पट्टों के मामले में यह बात सामने भी आई है। इसमें जिले से लेकर लखनऊ में बैठे तत्कालीन अफसर और मंत्री तक की भूमिका का पता चला है। 2012 से 2017 के बीच खनन विभाग से जारी एमएम-11 (रवन्ना) के आंकड़े भी सीबीआई ने जुटाए हैं। जिसमें बड़ी गड़बड़ी होने की बात सामने आ रही है।
2012 से 2017 के बीच जिले की कोर्रा कनक खदान का संचालन शिव सिंह और गुरुवल खदान का संचालन सुखराज को मिला था। नवंबर 2006 से नवंबर 2009 के बीच तीन साल के लिए शिव सिंह को कोर्रा कनक में खनन क्षेत्र का पट्टा मिला था। मार्च 2009 को उसने पट्टे के नवीनीकरण के लिए आवेदन किया।
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लेकिन बकायेदारी के चलते उसका आवेदन कैंसिल कर दिया गया। इसके बाद शिव सिंह ने अफसरों से मिलीभगत कर एक मई 2012 को सभी बकाये का भुगतान कर दिया और फिर 16 मई 2012 को खनन विभाग ने उसे नो ड्यूज का सर्टिफिकेट दे दिया।
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फतेहपुर के तत्कालीन डीएम ने भी इस फाइल को मंजूरी के लिए शासन को भेज दी। जिसे बाद में लखनऊ में बैठे तत्कालीन अफसरों और मंत्री ने अपनी स्वीकृति दे दी। इसके बाद जनवरी 2014 से 2017 तक यानि तीन साल के लिए शिव सिंह को फिर पट्टा मिल गया। 2012 में शासन से ई-टेंडरिंग के जारी आदेश को इस मामले में नजरअंदाज किया गया।
इसी तरह, पट्टाधारक सुखराज को गुरुवल में खनन का पट्टा मिला लेकिन इसकी भी अवैध तरीके से लीज बढ़ा दी गई। सुखराज के पट्टे को नवंबर 2013 में निरस्त किया गया। लेकिन जब सुखराज ने अफसरों के सात मिलीभगत कर फाइल आगे बढ़ाई तो तत्कालीन डीएम ने अक्तूबर 2014 में इसे स्वीकृति दे दी।