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बदलते मौसम के साथ बढ़ा संक्रमण
Fatehpur
Updated Fri, 28 Nov 2014 05:30 AM IST
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फतेहपुर। सर्दी बढ़ने के साथ ही नाक, कान व गला संबंधी विभिन्न रोगों का शिकंजा भी कसने लगा है । इन बीमारियों से ग्रसित मरीजों की 20 फीसदी संख्या सरकारी व गैर सरकारी अस्पतालों में पहुंच रही है। भर्ती वार्डों में ऐसे मरीजों की संख्या 15 फीसदी के आसपास है। मौसम का असर लोगों पर पड़ रहा है। जरा सी लापरवाही बीमार बना रही है। हर घर का कोई न कोई सदस्य बीमार है। इनमें नाक, कान व गला के रोगियों की संख्या भी सप्ताह भर से लगातार बढ़ती जा रही है। सदर अस्पताल में रोजाना करीब 800 की ओपीडी होती है। इसमें से एक सैकड़ा से ज्यादा रोगी हरेक दिन ओपीडी में ईएनटी के चैंबर पर नजर आ रहे हैं। इनमें से किसी का कान बह रहा है। किसी की नाक से खून आ रहा है तो किसी का गला खराब रहा है। गुरुवार को ओपीडी के चैंबर नंबर दो में ऐसे डेढ़ सौ मरीज देखे गए। इनमें से ज्यादातर मरीज मौसम की ठंडक से जकड़े नजर आए। तमाम मरीज और उनके साथ आए तीमारदार चैंबर के बाहर जमा भीड़ और डॉक्टर की व्यस्तता देख कर बिना दिखाएं वापस लौट गए। आईपीडी की बात करें तो इसमें भी हरेक दिन नाक, कान व गला के रोगियों की संख्या दर्जन भर का आंकड़े से ऊपर होती है। सदर अस्पताल के ईएनटी सर्जन डॉ. राजीव चौधरी कहते हैं कि मौसम बदलने से सबसे ज्यादा प्रभाव नाक, कान और गला में पड़ता है। ऐसे में जरा सी भी तकलीफ महसूस होने पर विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लिया जाए। खासकर ऐसे रोगी जो लंबे समय से बीमार हैं, उन्हें ज्यादा होशियार रहने की जरूरत है। क्योंकि रोग काफी पुराना होने पर सर्जरी तक करानी पड़ सकती है। इसके अलावा डाक्टरों ने एहतियात बरतने की सलाह दी है। मसलन कान में पानी व तेल न पहुंचने दिया जाए। इन दोनों के पहुंचने से कान का रोग गहराने लगता है। ऐसे में बहने वाले कान को सूखा रखा जाए तो बेहतर होगा। चूंकि सर्दी जुकाम व एलर्जी से भी कान का रोग पनपता है। ऐसे में इनसे बचना चाहिए। इसी तरह मौसम बदलने से गले में खराश हो जाती है। खासकर ज्यादा मोटे लोगों को यह समस्या होती है। ऐसे लोग अपने वजन को कम करने के साथ तली भुनी चीजों से परहेज करें। रात का भोजन करने के करीब आधा घंटे बाद बिस्तर पर जाएं। एलर्जी की वजह से नाक प्रभावित होती है। छींक आती है। खासकर बच्चों की नाक से खून आने लगता है। नाक में मांस भी बढ़ने लगता है। नाक से खून बहने की बीमारी बड़ों में भी होती है। बच्चे बार-बार नाक में उंगली न डाले। खून आने पर हाथ से नाक को दबा कर रखें।
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