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सूरत ने फीका किया जरदोजी का काम
ब्यूरो/अमर उजाला,फर्रुखाबाद
Updated Mon, 04 Jan 2016 11:36 PM IST
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फर्रुखाबाद। सूरत से बनकर आ रही रेडीमेड इंब्रायडरी ने फर्रुखाबाद की शान कहे जाने वाले जरी-जरदोजी कारोबार को फीका कर दिया है। रेडीमेड इंब्रायडरी के चलते जरी-जरदोजी कारोबार पर तीन साल में करीब 40 फीसदी का असर पड़ा है। अधिकतर कारीगरों ने मंदी के चलते काम से किनारा कर लिया है। वहीं, जरी-जरदोजी के कच्चे माल के विक्रेताओं ने भी रेडीमेड डिजाइनदार इंब्रायडरी बेचनी शुरू कर दी है।
फर्रुखाबाद में करीब छह दशक पहले जरी-जरदोजी का कारोबार शुरू हुआ था। फर्रुखाबाद से तैयार किए हुए लहंगे, साड़ी, सलवार-सूट, दुपट्टा आदि कपड़े दिल्ली, गाजियाबाद, मुंबई, हैदराबाद, अहमदाबाद और कोलकाता आदि के अलावा विदेशों में भी सप्लाई होते हैं। फिल्मी सितारों को भी फर्रुखाबादी लहंगा-दुपट्टा और सलवार-सूट खूब भाते हैं। करीब चार-पांच साल पहले फर्रुखाबाद का जरी-जरदोजी कारोबार करोड़ों रुपये का था।
जिले भर में दो सौ से ज्यादा छोटे-बड़े कारखाने थे। महिला-पुरुष समेत हजारों कारीगरों की रोजी-रोटी भी जरी-जरदोजी के काम से चलती थी। लहंगा-दुपट्टा, सलवार-सूट आदि का सारा काम हाथ से होता था। फिर हाथ के काम की जगह मशीनों ने ले ली है।
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अब सूरत से आने वाली रेडीमेड इंब्रायडरी डिजाइन से लहंगा-दुपट्टा, सलवार-सूट और साड़ी आदि तैयार हो रही हैं। इसका असर जरी-जरदोजी कारोबार पर करीब 40 फीसदी पड़ा है। अधिकतर कारखाने या तो बंद हो गए हैं या फिर बंदी के कगार पर पहुंच गए हैं। जरी-जरदोजी का काम काफी कम होने से कारीगर भी दूसरा काम करने लगे हैं। जरी-जरदोजी के कच्चे माल के दुकानदारों ने भी समय के साथ बदलते हुए रेडीमेड डिजाइन की इंब्रायडरी रखनी शुरू कर दी हैं। सूरत की रेडीमेड इंब्रायडरी डिजाइनें बाजार में आने से जरी-जरदोजी के कारोबार को ग्रहण लगने लगा है।
रेडीमेड इंब्रायडरी पर ऐसे होता काम
लहंगा-दुपट्टा, सलवार-सूट और साड़ी आदि के कपड़े पर रेडीमेड इंब्रायडरी की सिलाई करना होता है। इसके बाद कोरा, दबका और जरकन आदि का थोड़ा सा काम कारीगरों से करवाया जाता है। रेडीमेड इंब्रायडरी के काम में टीकी, मोती, खाका की डिजाइन और कसबे का काम कम हो जाता है।
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फर्रुखाबाद में करीब छह दशक पहले जरी-जरदोजी का कारोबार शुरू हुआ था। फर्रुखाबाद से तैयार किए हुए लहंगे, साड़ी, सलवार-सूट, दुपट्टा आदि कपड़े दिल्ली, गाजियाबाद, मुंबई, हैदराबाद, अहमदाबाद और कोलकाता आदि के अलावा विदेशों में भी सप्लाई होते हैं। फिल्मी सितारों को भी फर्रुखाबादी लहंगा-दुपट्टा और सलवार-सूट खूब भाते हैं। करीब चार-पांच साल पहले फर्रुखाबाद का जरी-जरदोजी कारोबार करोड़ों रुपये का था।
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जिले भर में दो सौ से ज्यादा छोटे-बड़े कारखाने थे। महिला-पुरुष समेत हजारों कारीगरों की रोजी-रोटी भी जरी-जरदोजी के काम से चलती थी। लहंगा-दुपट्टा, सलवार-सूट आदि का सारा काम हाथ से होता था। फिर हाथ के काम की जगह मशीनों ने ले ली है।
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अब सूरत से आने वाली रेडीमेड इंब्रायडरी डिजाइन से लहंगा-दुपट्टा, सलवार-सूट और साड़ी आदि तैयार हो रही हैं। इसका असर जरी-जरदोजी कारोबार पर करीब 40 फीसदी पड़ा है। अधिकतर कारखाने या तो बंद हो गए हैं या फिर बंदी के कगार पर पहुंच गए हैं। जरी-जरदोजी का काम काफी कम होने से कारीगर भी दूसरा काम करने लगे हैं। जरी-जरदोजी के कच्चे माल के दुकानदारों ने भी समय के साथ बदलते हुए रेडीमेड डिजाइन की इंब्रायडरी रखनी शुरू कर दी हैं। सूरत की रेडीमेड इंब्रायडरी डिजाइनें बाजार में आने से जरी-जरदोजी के कारोबार को ग्रहण लगने लगा है।
रेडीमेड इंब्रायडरी पर ऐसे होता काम
लहंगा-दुपट्टा, सलवार-सूट और साड़ी आदि के कपड़े पर रेडीमेड इंब्रायडरी की सिलाई करना होता है। इसके बाद कोरा, दबका और जरकन आदि का थोड़ा सा काम कारीगरों से करवाया जाता है। रेडीमेड इंब्रायडरी के काम में टीकी, मोती, खाका की डिजाइन और कसबे का काम कम हो जाता है।