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विकास की दौड़ में टूूट गए सावन झूले
ब्यूरो अमर उजाला,फर्रुखाबाद
Updated Sun, 31 Jul 2016 11:17 PM IST
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फर्रुखाबाद। एक समय था जब सावन के शुरू होते ही घर के आंगन में लगे पेड़ पर झूले पड़ जाते थे। महिलाएं गीतों के साथ झूले पर पेंग लगाती थीं। विकास की दौड़ में पेड़ गायब होते गए और बहुमंजिला इमारतों के बनने से आंगन का अस्तित्व समाप्त हो गया। ऐसे में सावन के झूले भी इतिहास बनकर हमारी परंपरा से गायब हो रहे हैं। हालांकि जन्माष्टमी पर मंदिरों में सावन की एकादशी के दिन भगवान को झूला झुलाने की परंपरा जरूर निभाई जा रही है।
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95 साल के हो चुके पूर्व विधायक महरम सिंह का कहना है कि वीर छंद आल्हा में कहा गया है कि ‘लगा महीना है सावन का, घर-घर होत मल्हार, घर-घर सखियां झूला झूलें, घर-घर होत तीज-त्योहार’, ये किसी कवि की कल्पना नहीं है। आज से दो दशक पहले तक ऐसा होता रहा है। सावन का महीना शुरू होते ही आंगन-आंगन, द्वार-द्वार पर झूले पड़ जाते थे। इन झूलों पर पेंग बढ़ाकर सखियां मल्हार गाती थीं। जिससे महिलाओं में मित्रता बढ़ती थी।
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बहुमंजिला इमारतों ने पेड़ों की बलि ले ली और धीरे-धीरे ये परंपराएं खत्म होती गईं और मित्रता की जगह महिलाओं में भी कटुता बढ़ती गई। थाना मोहम्मदाबाद के गांव कमालपुर के 98 वर्षीय रामसिंह बताते हैं कि सावन शुरू होते ही गांवों में अखाड़े खुद जाते थे। इन अखाड़ों में बच्चे से लेकर जवान तक कुश्ती लड़ना सीखते थे। रक्षाबंधन के दिन भुजरियां विसर्जित की जाती थीं तो विसर्जित करने वाले स्थान पर खेतों में इन्हीं प्रतियोगिताओं को फाइनल रूप दिया जाता था।
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विजयी प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया जाता था। शहर कोतवाली के मोहल्ला पल्ला की मिथलेश दुबे (70) का कहना है कि सावन के महीने में सबसे ज्यादा त्योहार होते हैं। इसे मस्त महीना माना गया है। जब पुरुआ हवा भीनी-भीनी फुहार के साथ चलती है तो मन मोर की तरह नाच उठता है। ऐसे में पहले घर-घर हाथों से सेवइयां बनाई जाती थीं और गांव भर की महिलाएं एक-दूसरे के घर सेवइयां बनाने जाती थीं।
यह सब प्रथाएं अब खत्म हो गई हैं। इनसे आपसी सद्भाव बढ़ता था। गढ़ी नवाब न्यामत खां पूर्व निवासी चंद्रकांता वर्मा (65) का कहना है कि 20 साल पहले तक मोहल्ले-मोहल्ले की महिलाएं इकट्ठा होकर मल्हारें गाती थीं और झूला झूलती थीं। विकास की दौड़ में अब महिलाओं को एक-दूसरे से बात करने की भी फुर्सत नहीं है। विकास की दौड़ ने सावन की परंपराओं का गला घोंट दिया है।
ग्वालटोली निवासी उमा पांडेय (60) कहती हैं कि न वह लोग रहे और न परंपराएं। धीरे-धीरे सभी परंपराएं खत्म हो गईं। पहले गांव भर के बच्चे एक-दूसरे के घर भुजरियां लेकर जाते थे। बुजुर्ग उन्हें उसके एवज में पैसे देते थे। अब यह परंपराएं भी खत्म हो गई हैं। हमारे पूर्वजों ने रक्षाबंधन को मनाने की ऐसी परंपराएं बनाई थी, जिनसे आपस में प्रेम बढ़े और एक-दूसरे से काम बंटाने में मोहल्ले के लोग सहयोगी बनें। धीरे-धीरे यह परंपराएं समाप्त हो गईं।