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एंबुलेंस के इंतजार में इमरजेंसी गेट पर ढाई घंटे पड़ी रही वृद्धा
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इमरजेंसी गेट पर ढाई घंटे पड़ी रही वृद्धा
फर्रुखाबाद। डा. राममनोहर लोहिया पुरुष अस्पताल की इमरजेंसी से रेफर होने के बाद ढाई घंटे तक एक वृद्धा एंबुलेंस के इंतजार में गेट के पास पड़ी रही। उसे स्ट्रेचर भी नसीब नहीं हुआ। कड़ाके की ठंड में पत्थर की फर्श पर कराहती रही। रात सवा दस बजे के बाद एंबुलेंस आई, तब कहीं कानपुर के लिए रवाना हुई।
नवाबगंज थाने के गांव वीरपुर निवासी सुखराम जाटव की पत्नी मारगश्री (60) के सीने में कोई नस दब गई है। इससे हो रहे दर्द से वह काफी दिनों से परेशान थीं। हालत बिगड़ने पर शनिवार दोपहर सवा दो बजे पति सुखराम ने लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया। डॉ. गौरव मिश्रा ने जांच की, तो पता चला इस बीमारी का यहां कोई इलाज नहीं है।
उन्होंने कुछ दवाइयां, इंजेक्शन देने के बाद कानपुर के सरकारी अस्पताल रेफर करने की बात कही। गरीबी से परेशान सुखराम ने बड़ी बेटी सरोज को बुला लिया। डॉक्टर ने शाम करीब साढ़े सात बजे वृद्धा को रेफर कर दिया। सरकारी एंबुलेंस के नंबर पर बात करके बुकिंग भी करवा दी।
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एंबुलेंस की खातिर मारगश्री को लेकर परिजन गेट पर आ गए और जमीन पर लिटा लिया। कई बार फोन करने के बावजूद रात 10 बजे तक कोई एंबुलेंस नहीं आई। सुखराम ने बताया कि कभी कहा गया कि चालक खाना खा रहा है, तो कभी फोन रिसीव नहीं हुआ। रात करीब सवा दस बजे के बाद एंबुलेंस पहुंची। तब कहीं ढाई घंटे बाद वृद्धा को कानपुर ले जाया जा सका। इससे पहले ठंडी फर्श पर वह कराहती रही।
निजी अस्पताल में इलाज कराने की सलाह
इमरजेंसी में एक युवक अपने पिता की जगह काम करता हैै। वह काफी देर तक परिजनों को निजी अस्पताल तक निजी एंबुलेंस से फ्री में छुड़वाने की बात कहता रहा। मगर गरीब के पास दो वक्त की रोटी के भी पैसे नहीं थे।
गांव से पहुंचे तीन युवकों ने की मदद
वीरपुर के युवक अनीस, चांद मियां और इसरार अपने वाहन से रात यहां पहुंचे। उन्होंने बीमार के परिजनों को आर्थिक मदद की। अनीस ने बताया कि सुखराम बेहद सीधा इंसान है। एक ही बेटा है, वह भी दिमाग से कुछ कम हैै। रात में उन्होंने परिजनों को होटल से लाकर खाना खिला दिया। वह कानपुर भी जाकर जरूरत के हिसाब से मदद करेंगे।
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फर्रुखाबाद। डा. राममनोहर लोहिया पुरुष अस्पताल की इमरजेंसी से रेफर होने के बाद ढाई घंटे तक एक वृद्धा एंबुलेंस के इंतजार में गेट के पास पड़ी रही। उसे स्ट्रेचर भी नसीब नहीं हुआ। कड़ाके की ठंड में पत्थर की फर्श पर कराहती रही। रात सवा दस बजे के बाद एंबुलेंस आई, तब कहीं कानपुर के लिए रवाना हुई।
नवाबगंज थाने के गांव वीरपुर निवासी सुखराम जाटव की पत्नी मारगश्री (60) के सीने में कोई नस दब गई है। इससे हो रहे दर्द से वह काफी दिनों से परेशान थीं। हालत बिगड़ने पर शनिवार दोपहर सवा दो बजे पति सुखराम ने लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया। डॉ. गौरव मिश्रा ने जांच की, तो पता चला इस बीमारी का यहां कोई इलाज नहीं है।
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उन्होंने कुछ दवाइयां, इंजेक्शन देने के बाद कानपुर के सरकारी अस्पताल रेफर करने की बात कही। गरीबी से परेशान सुखराम ने बड़ी बेटी सरोज को बुला लिया। डॉक्टर ने शाम करीब साढ़े सात बजे वृद्धा को रेफर कर दिया। सरकारी एंबुलेंस के नंबर पर बात करके बुकिंग भी करवा दी।
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एंबुलेंस की खातिर मारगश्री को लेकर परिजन गेट पर आ गए और जमीन पर लिटा लिया। कई बार फोन करने के बावजूद रात 10 बजे तक कोई एंबुलेंस नहीं आई। सुखराम ने बताया कि कभी कहा गया कि चालक खाना खा रहा है, तो कभी फोन रिसीव नहीं हुआ। रात करीब सवा दस बजे के बाद एंबुलेंस पहुंची। तब कहीं ढाई घंटे बाद वृद्धा को कानपुर ले जाया जा सका। इससे पहले ठंडी फर्श पर वह कराहती रही।
निजी अस्पताल में इलाज कराने की सलाह
इमरजेंसी में एक युवक अपने पिता की जगह काम करता हैै। वह काफी देर तक परिजनों को निजी अस्पताल तक निजी एंबुलेंस से फ्री में छुड़वाने की बात कहता रहा। मगर गरीब के पास दो वक्त की रोटी के भी पैसे नहीं थे।
गांव से पहुंचे तीन युवकों ने की मदद
वीरपुर के युवक अनीस, चांद मियां और इसरार अपने वाहन से रात यहां पहुंचे। उन्होंने बीमार के परिजनों को आर्थिक मदद की। अनीस ने बताया कि सुखराम बेहद सीधा इंसान है। एक ही बेटा है, वह भी दिमाग से कुछ कम हैै। रात में उन्होंने परिजनों को होटल से लाकर खाना खिला दिया। वह कानपुर भी जाकर जरूरत के हिसाब से मदद करेंगे।