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वन विभाग करेगा गिद्धों की निगरानी
ब्यूरो, अमर उजाला फर्रुखाबाद
Updated Tue, 16 Dec 2014 11:47 PM IST
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फ र्रुखाबाद। जिले के नवाबगंज इलाके में गिद्धों की अचानक हुई आमद से वन
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विभाग भी चौंका है। महकमे ने इनके ठहराव के लिए योजना बनाना शुरू कर दिया
है। इन गिद्धों की विभाग निगरानी भी करेगा।
नवाबगंज इलाके के सैंथरा लखनपुर, ज्योना व ज्यूनी में सोमवार को बड़ी संख्या में गिद्धों ने आमद की है। इसकी वजह वन विभाग भी तलाश रहा है। विभाग ने इनक ी निगरानी की तैयारी शुरू कर दी है। इनका ठहराव जिले में ही बनाए रखने के लिए विभाग संजीदा हो गया। जिले में गिद्धों की संख्या का कोई लेखाजोखा वन विभाग के पास नहीं। 10 साल में गिद्धों की संख्या में बड़ी गिरावट आई है।
जिला वन अधिकारी डीके श्रीवास्तव का कहना है कि जिले का मौसम अनुकूल मिलना इनके आने की वजह हो सकती है। वह इसे बेहतर घटना मान रहे हैं। इनका कहना है कि इनकी निगरानी कराने के साथ ही इन्हें संरक्षित करने के लिए भी विभाग लोगाें को जागरूक करेगा।
डाइक्लोफिनेक दवा के प्रयोग से गिद्ध हुए गायब
गिद्धों की मुख्य रूप से तीन प्रजातियों में 99 प्रतिशत की कमी देखी गई है। इनकी मौत की वजह डाइक्लोफिनेक दवा बनी है। इसे जिला वन अधिकारी भी मानते हैं।
यह दवा मवेशियाें को दी जाती है। इनके मरने पर यह मांस गिद्ध खाते थे। इससे इनके गुर्दे गाउट नामक बीमारी से ग्रस्त होने से जान जाती रही। डाइक्लोफिनेक के साथ ही कीटोप्रोफोफेन, एसीलोफनाक दवा भी गिद्धों की दुश्मन बनी ।
अब प्रतिबंधित है डाइक्लोफिनेक
गिद्धों ं की गिरती संख्या को देखते हुए ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया ने डाइक्लोफिनेक की ब्रिकी प्रतिबंधित कर दी है। इसके वेटनरी उपयोग हेतु दिए गए लाइसेंस को निरस्त करने के आदेश भी जारी हो चुके हैं। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डा. पुष्प कुमार ने बताया कि
डाइक्लोफिनेक के वेटनरी उपयोग पर प्रतिबंध के बावजूद जिन लोगों द्वारा अवैध रूप से ह्यूमन डाइक्लोफिनेक का उपयोग जानवरों के उपचार हेतु किया जा रहा है, उनके विरुद्घ सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने बताया कि मैलेक्सीकैम नाम औषधि, जो गिद्धों के लिए सुरक्षित है उसे सरकारी अस्पतालों द्वारा वितरण कराया जाना सुनिश्चित किया जाएगा।
नवाबगंज इलाके के सैंथरा लखनपुर, ज्योना व ज्यूनी में सोमवार को बड़ी संख्या में गिद्धों ने आमद की है। इसकी वजह वन विभाग भी तलाश रहा है। विभाग ने इनक ी निगरानी की तैयारी शुरू कर दी है। इनका ठहराव जिले में ही बनाए रखने के लिए विभाग संजीदा हो गया। जिले में गिद्धों की संख्या का कोई लेखाजोखा वन विभाग के पास नहीं। 10 साल में गिद्धों की संख्या में बड़ी गिरावट आई है।
जिला वन अधिकारी डीके श्रीवास्तव का कहना है कि जिले का मौसम अनुकूल मिलना इनके आने की वजह हो सकती है। वह इसे बेहतर घटना मान रहे हैं। इनका कहना है कि इनकी निगरानी कराने के साथ ही इन्हें संरक्षित करने के लिए भी विभाग लोगाें को जागरूक करेगा।
डाइक्लोफिनेक दवा के प्रयोग से गिद्ध हुए गायब
गिद्धों की मुख्य रूप से तीन प्रजातियों में 99 प्रतिशत की कमी देखी गई है। इनकी मौत की वजह डाइक्लोफिनेक दवा बनी है। इसे जिला वन अधिकारी भी मानते हैं।
यह दवा मवेशियाें को दी जाती है। इनके मरने पर यह मांस गिद्ध खाते थे। इससे इनके गुर्दे गाउट नामक बीमारी से ग्रस्त होने से जान जाती रही। डाइक्लोफिनेक के साथ ही कीटोप्रोफोफेन, एसीलोफनाक दवा भी गिद्धों की दुश्मन बनी ।
अब प्रतिबंधित है डाइक्लोफिनेक
गिद्धों ं की गिरती संख्या को देखते हुए ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया ने डाइक्लोफिनेक की ब्रिकी प्रतिबंधित कर दी है। इसके वेटनरी उपयोग हेतु दिए गए लाइसेंस को निरस्त करने के आदेश भी जारी हो चुके हैं। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डा. पुष्प कुमार ने बताया कि
डाइक्लोफिनेक के वेटनरी उपयोग पर प्रतिबंध के बावजूद जिन लोगों द्वारा अवैध रूप से ह्यूमन डाइक्लोफिनेक का उपयोग जानवरों के उपचार हेतु किया जा रहा है, उनके विरुद्घ सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने बताया कि मैलेक्सीकैम नाम औषधि, जो गिद्धों के लिए सुरक्षित है उसे सरकारी अस्पतालों द्वारा वितरण कराया जाना सुनिश्चित किया जाएगा।