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फसल तबाह हुई लेकिन नहीं टूटा हौसला

Sun, 19 Apr 2015 11:10 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला फर्रुखाबाद
ब्यूरो, अमर उजाला फर्रुखाबाद Updated Sun, 19 Apr 2015 11:10 PM IST
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Crop was devastated but did not break the spirit
कुदरत ने इस बार ऐसा कहर बरपाया कि छोटे किसान मजदूर बन गए। ये जहां भी
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बैठते हैं, फसल की ही चर्चा करते हैं। रविवार को संवाददाता ने किसानों के बीच पहुंच उनका हालचाल पूछा तो उनका दर्द उभर आया। बातों ही बातों में यह भी पता चला कि भले ही इनका सब कुछ बर्बाद हो गया हो, पर हौसला नहीं टूटा है। इन्हें अपनी मेहनत पर भरोसा है। अब ये मजदूरी कर परिवार पाल रहे हैं पर कहते हैं कि कुदरत कब तक हमें सताएगी, हम निराश नहीं होंगे, एक दिन हालात बदलकर ही रहेंगे।

रविवार की दोपहर कड़क धूप थी। पारा 35 डिग्री सेल्सियस के आसपास था। पपियापुर ग्राम पंचायत के मजरा टिकुरियन नगला में सूरज के खेत में खड़े जामुन के पेड़ के नीचे बैठे कुछ किसान बातों में मशगूल थे। पास में ट्यूबवेल चल रहा था। पेड़ के नीचे ठंडक का एहसास हो रहा था। संवाददाता की रामजुहार से इनकी बतकही कुछ देर के लिए थम गई। फसलों की तबाही का सवाल उठते ही भीतर का दर्द चेहरे पर उभर आता है। पपियापुर के माधौराम चौकीदार हैं। कहते हैं, ‘कुदरत ने

कहूं को नाहीं छोड़ो। मजूरी कन्न पर रही।’ माधौराम ने गांव के दिलसुख का पांच बीघा खेत बटाई पर लेकर गेहूं बोया था। तीन क्विंटल गेहूं पैदा हुआ। इन्हें डेढ़ क्विंटल गेहूं मिला। परिवार में पत्नी शीला के अलावा दो बेटे और एक बेटी है। माधौराम अब 200 रु पये रोज पर घुइयां की निराई कर रहे हैं। पपियापुर के प्रेमचंद्र छह बीघा के काश्तकार हैं। ये कहते हैं, ‘फसल चली गई तौ का जिंदगी लै गई। हमसे पूंछौ, बेटी खिलौनी के लए लड़का ढूंढ रहे हते। जब लड़का मिलो तौ इत्तो गेहूं भी

नाहीं मिलो कि साल भर खाए लेंय। अबै खेतन में मजूरी कर रहे, बाद में शहर में काम ढुंढहैं। वे दिन नाहीं रहै तो जेऊ नहीं रहहैं। अच्छे दिन भी अयें।’ यहां माधौराम के भतीजे भी हैं। ये मैनपुरी जिले के भैंसरोली गांव में रहते हैं। आफत वहां भी टूटी। इन्होंने 15 बीघा गेहूं बोया था। 15 क्विंटल ही गेहूं मिला। अब यहां मजदूरी कर रहे हैं। इसी बीच गांव के रामलड़ैते आ पहुंचते हैं। ये बड़े काश्तकार हैं। इनसे टिकुरियन नगला के राजवीर पूछते हैं, ‘चच्चा कटरी भीमपुर में का रहो।’ रामलड़ैते ने

कटरी में 6 बीघा गेहूं बोया था। रामलड़ैते कहते हैं, ‘आज देखन गए थे। जमन लगो है। दीमक भी नुकसान कर रहो।’ यह सुनकर पपियापुर के ब्रजभान कहते हैं कि  ‘जा तौ हमारेऊ  खेत मैं है। जौ कछू बचो है, वाए दीमक, सूंड़ी सब खाए जाए रही।’ सूरज पास में पड़ी बालियों को हाथों से रगड़ कर पतले, भद्दे रंग और दागदार दाने दिखाकर कहते हैं ‘लेओ, देख लेओ, जौ निकरो है। अपनी छोड़ौ, भूसा में मट्टी जाए रही। बाऊ को जानवर नाहीं खएं, सब तरा से मुसीबत है।’

इसी बीच अर्जुन नगला के प्रदीप बोल पड़ते हैं ‘काहे रोय गाए रहे। चलो, निराउन चलैं। कोई नाहीं सुनन वालो। न सरकार, न लेखपाल। कागज रंग रहे। मुआवजा मिलो नाहीं धेला।’ जवाब देते हैं माधौराम, ‘बात सही है। मुआवजा तो नाहीं ही मिलो। अब कोऊ करजा भी देन वालो नाहीं। देन वालेउ जानत हैं कि इन्हें करजा दई दओ तो जे मजूरा दिएं कहां से।’ हरिनंदन

कहते, ‘कऊ से उम्मीद न करौ। अपने हाथन पायन पर भरोसा करौ। खुदई ही मेहनत से बरकत होये।’ ये दोपहर को खाने के लिए रोटी भी नहीं लाए थे। प्रेमचंद्र कहते हैं, ‘क छू कटौती तौ कन्न परे। अब सबेरे संझा ही पेट पूजा है।’ इसके बाद सभी निराई के लिए खेतों में चले जाते हैं। इनके जाने के बाद भी लगता है कि ये दर्द का एक हिस्सा जामुन के पेड़ के नीचे भी छोड़ गए हैं, जो जामुन के पत्तों के साथ थरथराता रहता है।
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