{"_id":"5c9a674abdec2214323f3c5f","slug":"131553622858-farrukhabad-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"आश्रय स्थलों में गोवंश मरने का विभाग के पास रिकार्ड नहीं","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आश्रय स्थलों में गोवंश मरने का विभाग के पास रिकार्ड नहीं
विज्ञापन
फर्रुखाबाद। किसानों व राहगीरों की परेशानी का सबब बने अन्ना मवेशियों के लिए सरकार ने करोड़ों खर्च कर स्थायी व अस्थायी आश्रय स्थलों का निर्माण कराया। भरण-पोषण के लिए एक करोड़ भेजे गए। विभागीय लापरवाही के चलते सब कुछ व्यर्थ दिख रहा है। आलम यह है कि आश्रय स्थलों में एक सौ से अधिक गोवंश काल के गाल में समा चुके हैं, इसका मुख्यालय पर रिकॉर्ड तक नहीं है।
मुख्यमंत्री ने जिले में 26 अस्थायी गोसदन बनवाने के आदेश दिए थे। धरपकड़ अभियान शुरू हुआ तो ग्राम पंचायत स्तर पर करीब 350 अस्थायी गोवंश आश्रय स्थल बनवाए गए। इनमें करीब 6000 मवेशी पकड़कर बंद किए जाने का दावा भी किया गया। देखरेख की जिम्मेदारी ग्राम प्रधान, सचिव व 8-10 ग्रामीणों की कमेटी को सौंपी गई। इसके साथ ही गोवंश के इलाज के लिए पशु चिकित्सकों को भी क्षेत्रवार जिम्मेदारी दी गई। कुछ ही दिनों में धरपकड़ का अभियान ठंडा पड़ गया और फिर अधिकारियों ने सुधि भी नहीं ली। इससे आश्रय स्थलों में बंद गोवंश दुर्दशा के शिकार होते चले गए। आश्रय स्थलों पर नजर डालें तो अब तक राजकीय गोसदन धर्मपुर कटरी में करीब 50, कमालगंज में सात, रामपुर माझगांव में 6, राजेपुर टप्पा मंडल में पांच के अलावा धन्सुआ, सातनपुर आदि आश्रय स्थलों में करीब एक सौ से अधिक गोवंश दुर्दशा के शिकार होकर मर चुके हैं।
विडंबना यह है कि पशु विभाग ने इसके बावजूद सतर्कता बरतना तो दूर, मरे गोवंश का रिकॉर्ड भी रखना मुनासिब नहीं समझा। मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. राजकिशोर सिंह ने बताया कि फिलहाल किसी भी क्षेत्रीय पशु चिकित्सक ने मृत पशुओं का ब्योरा उपलब्ध नहीं कराया है। इस संबंध में पशु चिकित्सकों को लिखा है।
विज्ञापन
विज्ञापन
मुख्यमंत्री ने जिले में 26 अस्थायी गोसदन बनवाने के आदेश दिए थे। धरपकड़ अभियान शुरू हुआ तो ग्राम पंचायत स्तर पर करीब 350 अस्थायी गोवंश आश्रय स्थल बनवाए गए। इनमें करीब 6000 मवेशी पकड़कर बंद किए जाने का दावा भी किया गया। देखरेख की जिम्मेदारी ग्राम प्रधान, सचिव व 8-10 ग्रामीणों की कमेटी को सौंपी गई। इसके साथ ही गोवंश के इलाज के लिए पशु चिकित्सकों को भी क्षेत्रवार जिम्मेदारी दी गई। कुछ ही दिनों में धरपकड़ का अभियान ठंडा पड़ गया और फिर अधिकारियों ने सुधि भी नहीं ली। इससे आश्रय स्थलों में बंद गोवंश दुर्दशा के शिकार होते चले गए। आश्रय स्थलों पर नजर डालें तो अब तक राजकीय गोसदन धर्मपुर कटरी में करीब 50, कमालगंज में सात, रामपुर माझगांव में 6, राजेपुर टप्पा मंडल में पांच के अलावा धन्सुआ, सातनपुर आदि आश्रय स्थलों में करीब एक सौ से अधिक गोवंश दुर्दशा के शिकार होकर मर चुके हैं।
विज्ञापन
विडंबना यह है कि पशु विभाग ने इसके बावजूद सतर्कता बरतना तो दूर, मरे गोवंश का रिकॉर्ड भी रखना मुनासिब नहीं समझा। मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. राजकिशोर सिंह ने बताया कि फिलहाल किसी भी क्षेत्रीय पशु चिकित्सक ने मृत पशुओं का ब्योरा उपलब्ध नहीं कराया है। इस संबंध में पशु चिकित्सकों को लिखा है।
विज्ञापन