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शकूरन व यूनुस देवी की पूजा करते खिलाते हैं कन्या भोज
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पिपरगांव धार्मिक समरसता के लिए जाना जाता है। यहां के लोग मस्जिद में नमाज पढ़ने के बाद मंदिर में पूजा भी करते हैं। फिर चाहे वह रमजान हो या फिर नवरात्र। रविवार को भी ऐसा ही नजारा दिखा।
गांव निवासी मोहम्मद यूनुस अंसारी (72) सुबह-सुबह हाथ में बताशे और फूल लेकर मंदिर की ओर जा रहे थे। पूछने पर बताया कि पूजा करने मंदिर जा रहे हैं। कहा कि उनके बाप-दादे इस मंदिर में पूजा करते आ रहे हैं।
पहले यहां पर केवल पीपल के पेड़ के नीचे मूर्ति रखी थी। मंदिर तो गांव वालों ने बनवा दिया है। वह गए ही थे कि पीछे से गांव की शकूरन बेगम हाथ में पूजा की प्लेट और पूड़ियां आदि रखे चली आ रही थीं। उन्होंने बताया कि उनकी सास भी मंदिर में पूजा करती थीं। बहू भी करती है।
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पूड़ियों से ही पूजा करके कन्या भोज खिलाना है। बताया कि वह चाहे किसी भी मुसीबत में हो, लेकिन नवमी के दिन कन्या भोज कराना कभी नहीं भूलती हैं। बताया कि वह अब 75 वर्ष की हो गईं हैं। उन्हें तो यह भी याद नहीं हैं कि वह कबसे कन्या भोज करवा रहीं हैं।
इनके अलावा गांव की आसमां पत्नी आमीन खां, नेहा पुत्री इस्लामुद्दीन, मेहमान मंसूरी पुत्र लाल मियां, नाबजिश पुत्री रसूल आदि सभी यहां पूजा करते हैं।
ग्रामीणों ने बताया कि गांव में करीब 47 मुस्लिम परिवार हैं। इक्का दुक्का को छोड़ कर सभी मंदिर में पूजा करते हैं। गांव में बना गमां देवी का यह मंदिर 200 साल से भी ज्यादा पुराना है। बताया गया कि गांव में पीपल के पेड़ बहुत थे।
आज भी बहुत से पीपल के पेड़ मौजूद हैं। इसी के चलते गांव नाम पीपरी गढ़ था। अब यह पिपर गांव हो गया है। पहले एक पीपल के पेड़ पर ही गमा देवी की मूर्ती रखी थी। अब यहां पर मंदिर का निर्माण करवा दिया गया है।
गांव के चिरौंजी लाल पाल नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में थे। वर्ष 1936 में तत्कालीन पीपरीगढ़ गांव में अंग्रेज कप्तान जीडब्ल्यू कोल और दरोगा जयंती प्रसाद उन्हें पकड़ने गए थे। इसी दौरान चिरौंजी लाल ने उन दोनों अधिकािरियों को गोली मार कर खुद भी जान दे दी थी।
शकूरन व यूनुस देवी की करते हैं पूजा, खिलाते हैं कन्या
रमजान में रोजा रखने के साथ ही मंदिर में भी करते हैं पूजा
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गांव निवासी मोहम्मद यूनुस अंसारी (72) सुबह-सुबह हाथ में बताशे और फूल लेकर मंदिर की ओर जा रहे थे। पूछने पर बताया कि पूजा करने मंदिर जा रहे हैं। कहा कि उनके बाप-दादे इस मंदिर में पूजा करते आ रहे हैं।
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पहले यहां पर केवल पीपल के पेड़ के नीचे मूर्ति रखी थी। मंदिर तो गांव वालों ने बनवा दिया है। वह गए ही थे कि पीछे से गांव की शकूरन बेगम हाथ में पूजा की प्लेट और पूड़ियां आदि रखे चली आ रही थीं। उन्होंने बताया कि उनकी सास भी मंदिर में पूजा करती थीं। बहू भी करती है।
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पूड़ियों से ही पूजा करके कन्या भोज खिलाना है। बताया कि वह चाहे किसी भी मुसीबत में हो, लेकिन नवमी के दिन कन्या भोज कराना कभी नहीं भूलती हैं। बताया कि वह अब 75 वर्ष की हो गईं हैं। उन्हें तो यह भी याद नहीं हैं कि वह कबसे कन्या भोज करवा रहीं हैं।
इनके अलावा गांव की आसमां पत्नी आमीन खां, नेहा पुत्री इस्लामुद्दीन, मेहमान मंसूरी पुत्र लाल मियां, नाबजिश पुत्री रसूल आदि सभी यहां पूजा करते हैं।
ग्रामीणों ने बताया कि गांव में करीब 47 मुस्लिम परिवार हैं। इक्का दुक्का को छोड़ कर सभी मंदिर में पूजा करते हैं। गांव में बना गमां देवी का यह मंदिर 200 साल से भी ज्यादा पुराना है। बताया गया कि गांव में पीपल के पेड़ बहुत थे।
आज भी बहुत से पीपल के पेड़ मौजूद हैं। इसी के चलते गांव नाम पीपरी गढ़ था। अब यह पिपर गांव हो गया है। पहले एक पीपल के पेड़ पर ही गमा देवी की मूर्ती रखी थी। अब यहां पर मंदिर का निर्माण करवा दिया गया है।
गांव के चिरौंजी लाल पाल नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में थे। वर्ष 1936 में तत्कालीन पीपरीगढ़ गांव में अंग्रेज कप्तान जीडब्ल्यू कोल और दरोगा जयंती प्रसाद उन्हें पकड़ने गए थे। इसी दौरान चिरौंजी लाल ने उन दोनों अधिकािरियों को गोली मार कर खुद भी जान दे दी थी।
शकूरन व यूनुस देवी की करते हैं पूजा, खिलाते हैं कन्या
रमजान में रोजा रखने के साथ ही मंदिर में भी करते हैं पूजा