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नहाय खाय के साथ आज से शुरू होगा आस्था का महापर्व छठ
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अयोध्या। लोक आस्था का महापर्व छठ शुक्रवार को नहाय-खाय के साथ शुरू होगा। 29 अक्तूबर को खरना, 30 अक्तूबर को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य और 31 को उगते सूर्य को अर्घ्य के साथ चार दिनों के पर्व का समापन होगा। राम की नगरी इस पर्व को उत्साह, उमंग और उल्लास के साथ मनाने की तैयारी में है।
जिले में गुरुवार को छठ पूजा के लिए बाजारों में रौनक रही। महिलाओं ने कोसी, पीतल का सूप, बांस का सूप, दउरा, डगरा, गन्ना, नारियल सहित पूजा के हर छोटे-छोटे सामान की खरीदारी की। कपड़े की दुकानों पर साड़ियों की खरीदारी भी खूब हुई। शृंगार की दुकानों पर भी महिलाओं की भीड़ रही।
वहीं सरयू घाटों सहित गोसाईगंज के तमसा तट पर छठ पर्व के लिए तैयारियां भी लगभग पूरी हो गईं हैं। पर्व का पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी नहाय खाय के रूप में मनाया जाता है। भोजन के रूप में कद्दू, दाल और चावल ग्रहण किया जाता है। यह दाल चने की होती है। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजन करने के बाद ही भोजन ग्रहण करते हैं।
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इसके अगले दिन खरना मनाया जाता है। इस दिन व्रती महिलाएं गुड़ की खीर का प्रसाद बनाती हैं। कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रती महिलाएं दिन भर उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करती हैं। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस से बनी चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है।
तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। इसे ठेेकुआ या टिकरी भी कहते हैं। शाम को पूरी तैयारी कर बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रती महिलाएं अस्ताचलगामी सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य देती हैं। चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी को सुबह उदीयमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
अर्घ्य का मुहूर्त
30 अक्तूबर- सायंकाल 5:34 मिनट पर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा।
31 अक्तूबर- सुबह 6:27 मिनट पर उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा।
आचार्य शिवेंद्र त्रिपाठी के अनुसार वैसे तो हर पूजा व्रत में बहुत सी पूजन सामग्रियों का विधान है, लेकिन ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। सामग्री की व्यवस्था अपने सामर्थ्य के अनुसार की जा सकती है। कुछ न रहने पर व्रत मात्र से ही छठ के पूर्ण फल की प्राप्ति होती है। पूजन बस विधि-विधान से सही और उचित होना चाहिए।
आचार्य शिवेंद्र बताते हैं कि सूर्य षष्ठी व्रत पूजन में गन्ना, नारियल, आम का पल्लव, पान, सुपारी, फल, लौंग, इलायची, रूई, चौमुखी दिया, सूप, दउरा, रोली, साठी चावल, अगरबत्ती, कपूर, चूड़ा, सरसों तेल, नींबू बड़ा व छोटा, आटे का ठेकुआ, मूली, कद्दू, हल्दी, अदरक, सुधनी, पंचमेवा, देसी घी व सभी प्रकार के फलों का इस्तेमाल होता है।
वासेदुवघाट अयोध्या निवासिनी शांति देवी करीब 45 वर्षों से छठ का व्रत कर रही हैं। कहा कि सूर्य नारायण ने सब कुछ दिया है। छठी माता से मन से आज तक जो भी मन्नतें मांगी वह पूरी हो गईं। कहा कि छठ व्रत में साफ-सफाई का बहुत ख्याल रखा जाता है। जब तक शक्ति रहेगी छठ व्रत करती रहूंगी।
पूराबाजार निवासी सरिता सिंह 20 वर्षों से छठ का व्रत कर रही हैं। कहा कि दीपावली के पहले से ही इसको लेकर तैयारियां शुरू हो जाती हैं। पूजा करने से मन को शांति तो मिलती ही है और छठी मइया की कृपा से ही परिवार सभी कष्टों से दूर है। नहाय-खाय से ही घर पर रौनक हो जाती है।
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जिले में गुरुवार को छठ पूजा के लिए बाजारों में रौनक रही। महिलाओं ने कोसी, पीतल का सूप, बांस का सूप, दउरा, डगरा, गन्ना, नारियल सहित पूजा के हर छोटे-छोटे सामान की खरीदारी की। कपड़े की दुकानों पर साड़ियों की खरीदारी भी खूब हुई। शृंगार की दुकानों पर भी महिलाओं की भीड़ रही।
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वहीं सरयू घाटों सहित गोसाईगंज के तमसा तट पर छठ पर्व के लिए तैयारियां भी लगभग पूरी हो गईं हैं। पर्व का पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी नहाय खाय के रूप में मनाया जाता है। भोजन के रूप में कद्दू, दाल और चावल ग्रहण किया जाता है। यह दाल चने की होती है। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजन करने के बाद ही भोजन ग्रहण करते हैं।
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इसके अगले दिन खरना मनाया जाता है। इस दिन व्रती महिलाएं गुड़ की खीर का प्रसाद बनाती हैं। कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रती महिलाएं दिन भर उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करती हैं। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस से बनी चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है।
तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। इसे ठेेकुआ या टिकरी भी कहते हैं। शाम को पूरी तैयारी कर बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रती महिलाएं अस्ताचलगामी सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य देती हैं। चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी को सुबह उदीयमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
अर्घ्य का मुहूर्त
30 अक्तूबर- सायंकाल 5:34 मिनट पर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा।
31 अक्तूबर- सुबह 6:27 मिनट पर उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा।
आचार्य शिवेंद्र त्रिपाठी के अनुसार वैसे तो हर पूजा व्रत में बहुत सी पूजन सामग्रियों का विधान है, लेकिन ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। सामग्री की व्यवस्था अपने सामर्थ्य के अनुसार की जा सकती है। कुछ न रहने पर व्रत मात्र से ही छठ के पूर्ण फल की प्राप्ति होती है। पूजन बस विधि-विधान से सही और उचित होना चाहिए।
आचार्य शिवेंद्र बताते हैं कि सूर्य षष्ठी व्रत पूजन में गन्ना, नारियल, आम का पल्लव, पान, सुपारी, फल, लौंग, इलायची, रूई, चौमुखी दिया, सूप, दउरा, रोली, साठी चावल, अगरबत्ती, कपूर, चूड़ा, सरसों तेल, नींबू बड़ा व छोटा, आटे का ठेकुआ, मूली, कद्दू, हल्दी, अदरक, सुधनी, पंचमेवा, देसी घी व सभी प्रकार के फलों का इस्तेमाल होता है।
वासेदुवघाट अयोध्या निवासिनी शांति देवी करीब 45 वर्षों से छठ का व्रत कर रही हैं। कहा कि सूर्य नारायण ने सब कुछ दिया है। छठी माता से मन से आज तक जो भी मन्नतें मांगी वह पूरी हो गईं। कहा कि छठ व्रत में साफ-सफाई का बहुत ख्याल रखा जाता है। जब तक शक्ति रहेगी छठ व्रत करती रहूंगी।
पूराबाजार निवासी सरिता सिंह 20 वर्षों से छठ का व्रत कर रही हैं। कहा कि दीपावली के पहले से ही इसको लेकर तैयारियां शुरू हो जाती हैं। पूजा करने से मन को शांति तो मिलती ही है और छठी मइया की कृपा से ही परिवार सभी कष्टों से दूर है। नहाय-खाय से ही घर पर रौनक हो जाती है।