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27 साल बाद रामकोट में लौटेगा आनंद व उल्लास
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अयोध्या। राममंदिर निर्माण शुरू होने से देश-विदेश के रामभक्त उत्साहित हैं तो रामजन्मभूमि परिसर से सटे रामकोट के लोगों का भी उत्साह चरम पर है। अगर ये कहा जाए कि राममंदिर निर्माण शुरू होने की सबसे ज्यादा खुशी रामकोट के लोगों को हो रही है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
27 साल से बंदिशों का दंश झेल रहे रामकोट के लोग अब बंदिशों से मुक्ति मिलने की आस में काफी उत्साहित हैं। यहां के लोगों का कहना है कि रामलला की रिहाई के साथ-साथ हम लोगों को भी रिहाई होने जा रही है।
छह दिसंबर 1992 को बाबरी ध्वंस से पहले रामकोट के मंदिरों में आस्था उमड़ती थी लेकिन सुरक्षा कारणों से अधिग्रहण ने क्षेत्र की तस्वीर बदल दी। सात जनवरी 1993 को केंद्र सरकार की ओर से लागू सरटेन एरिया एक्विजिशन एक्ट (अयोध्या एक्ट) ने रामकोट क्षेत्र के कई लोगों के तकदीर के ताले भी बंद कर दिए।
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यही नहीं एक दर्जन से अधिक मंदिरों के कपाट सहित प्रतिष्ठित देव प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना भी बंद हो गई। रामकोट क्षेत्र के लोग सुरक्षा कारणों से बैरियरों में कैद हो गए। अब राममंदिर निर्माण शुरू होने के साथ-साथ बंदिशों से लोगों को मुक्ति मिलेगी तो रामजन्मभूमि परिसर में स्थित बंद पड़ेे मंदिरों की देव प्रतिमाओं का भी उद्धार होगा।
ट्रस्ट परिसर स्थित करीब तीन दशक से बदहाल, जर्जर अवस्था में पड़े करीब एक दर्जन मंदिरों को ढहाने की तैयारी कर रही है, लेकिन इन मंदिरों में स्थापित देवप्रतिमाओं का पूजन-अर्चन की परंपरा फिर से शुरू की जाएगी।
कोहबर भवन, राम खजाना, आनंद भवन, लेटे हनुमान मंदिर, रामजन्मस्थान, रामजानकी भवन, विश्वामित्र आश्रम, रंग जी का मंदिर में राग-भोग करीब 27 वर्षों से बंद है। बताया जा रहा है कि इन मंदिरों की देवप्रतिमाओं को राममंदिर के पास परिसर में ही स्थापित कर इनकी पूजा-अर्चना का क्रम शुरू किया जाएगा।
रामकोट के वाशिंदे राममंदिर निर्माण प्रारंभ होने से अत्यंत आनंदित हैं। रामजन्मभूमि परिसर से सटे प्राचीन रंगमहल मंदिर के महंत रामशरण दास कहते हैं कि रामलला के साथ-साथ रामकोट की भी मुक्ति हो रही है। बंदिशों के चलते हमारे उत्सव, त्योहार परंपरा निवर्हन तक ही सीमित रह गए थे। आए दिन हमें समस्या का सामना करना पड़ता था, भक्तों की आस्था भी प्रभावित होती थी, लेकिन अब रामलला की कृपा से आनंद, उल्लास के दिन आने वाले हैं।
रामकचेहरी मंदिर के महंत शशिकांत दास कहते हैं कि बंदिशों ने रामकोट के मंदिरों की व्यवस्था बिगाड़ दी थी, भक्त इन मंदिरों तक पहुंच ही नहीं पाते थे। राममंदिर निर्माण होने के साथ ही क्षेत्र के सैकड़ों प्राचीन मंदिरों की भी धार्मिक आभा लौटेगी। सनकादिक आश्रम के महंत कन्हैयादास रामायणी अति उत्साहित हैं कि रामलला ने हमें भी आजादी प्रदान कर दी है। सुरक्षा प्रबंधों ने हमें जकड़ कर रख दिया था, स्वतंत्रता नाम की कोई चीज नहीं रह गई थी। अब रामकोट का गौरव लौटेगा, भक्त आएंगे तो मंदिरों की व्यवस्था भी सुधरेगी।
75 वर्षीय रामचरित्र पांडेय कहते हैं कि हम 27 साल से बैरियर में कैद हैं। हमने वह दौर भी देखा है जब रामकोट का गौरव धूमिल हो गया था, अब वह दौर भी आ गया है जब पुन: एक बार इस क्षेत्र की धार्मिक महत्ता से लोग परिचित हो सकेंगे। कनक भवन के पास करीब 25 वर्ष से दवाखाना चला रहे वैद्य आरपी पांडेय कहते हैं कि रामकोट की परिधि में कई ऐसे मंदिर हैं जिनकी धार्मिक महत्ता शास्त्रों में वर्णित हैं। लेकिन अधिग्रहण ने इन्हें उपेक्षित कर दिया तो क्षेत्र का कारोबार भी प्रभावित हुआ। अब धार्मिक गौरव के साथ-साथ क्षेत्र का कारोबार भी बढ़ सकेगा।
विश्व हिंदू परिषद की अगुवाई में बीजेपी के समर्थन में चल रहे राममंदिर आंदोलन के परिणामस्वरूप 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा गिरा दिया था। इसके एक साल बाद जनवरी 1993 में यह अध्यादेश लाया गया। तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने 7 जनवरी 1993 को इसे मंजूरी दी थी। इसके तहत विवादित परिसर की कुछ जमीन का सरकार की तरफ से अधिग्रहण किया जाना था। राष्ट्रपति से मंजूरी के बाद तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चव्हाण ने इस बिल को मंजूरी के लिए लोकसभा में रखा। पास होने के बाद इसे अयोध्या अधिनियम के नाम से जाना गया। नरसिम्हा राव सरकार ने 2.77 एकड़ विवादित भूमि के साथ इसके चारों तरफ 60.70 एकड़ भूमि अधिग्रहीत की थी।
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27 साल से बंदिशों का दंश झेल रहे रामकोट के लोग अब बंदिशों से मुक्ति मिलने की आस में काफी उत्साहित हैं। यहां के लोगों का कहना है कि रामलला की रिहाई के साथ-साथ हम लोगों को भी रिहाई होने जा रही है।
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छह दिसंबर 1992 को बाबरी ध्वंस से पहले रामकोट के मंदिरों में आस्था उमड़ती थी लेकिन सुरक्षा कारणों से अधिग्रहण ने क्षेत्र की तस्वीर बदल दी। सात जनवरी 1993 को केंद्र सरकार की ओर से लागू सरटेन एरिया एक्विजिशन एक्ट (अयोध्या एक्ट) ने रामकोट क्षेत्र के कई लोगों के तकदीर के ताले भी बंद कर दिए।
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यही नहीं एक दर्जन से अधिक मंदिरों के कपाट सहित प्रतिष्ठित देव प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना भी बंद हो गई। रामकोट क्षेत्र के लोग सुरक्षा कारणों से बैरियरों में कैद हो गए। अब राममंदिर निर्माण शुरू होने के साथ-साथ बंदिशों से लोगों को मुक्ति मिलेगी तो रामजन्मभूमि परिसर में स्थित बंद पड़ेे मंदिरों की देव प्रतिमाओं का भी उद्धार होगा।
ट्रस्ट परिसर स्थित करीब तीन दशक से बदहाल, जर्जर अवस्था में पड़े करीब एक दर्जन मंदिरों को ढहाने की तैयारी कर रही है, लेकिन इन मंदिरों में स्थापित देवप्रतिमाओं का पूजन-अर्चन की परंपरा फिर से शुरू की जाएगी।
कोहबर भवन, राम खजाना, आनंद भवन, लेटे हनुमान मंदिर, रामजन्मस्थान, रामजानकी भवन, विश्वामित्र आश्रम, रंग जी का मंदिर में राग-भोग करीब 27 वर्षों से बंद है। बताया जा रहा है कि इन मंदिरों की देवप्रतिमाओं को राममंदिर के पास परिसर में ही स्थापित कर इनकी पूजा-अर्चना का क्रम शुरू किया जाएगा।
रामकोट के वाशिंदे राममंदिर निर्माण प्रारंभ होने से अत्यंत आनंदित हैं। रामजन्मभूमि परिसर से सटे प्राचीन रंगमहल मंदिर के महंत रामशरण दास कहते हैं कि रामलला के साथ-साथ रामकोट की भी मुक्ति हो रही है। बंदिशों के चलते हमारे उत्सव, त्योहार परंपरा निवर्हन तक ही सीमित रह गए थे। आए दिन हमें समस्या का सामना करना पड़ता था, भक्तों की आस्था भी प्रभावित होती थी, लेकिन अब रामलला की कृपा से आनंद, उल्लास के दिन आने वाले हैं।
रामकचेहरी मंदिर के महंत शशिकांत दास कहते हैं कि बंदिशों ने रामकोट के मंदिरों की व्यवस्था बिगाड़ दी थी, भक्त इन मंदिरों तक पहुंच ही नहीं पाते थे। राममंदिर निर्माण होने के साथ ही क्षेत्र के सैकड़ों प्राचीन मंदिरों की भी धार्मिक आभा लौटेगी। सनकादिक आश्रम के महंत कन्हैयादास रामायणी अति उत्साहित हैं कि रामलला ने हमें भी आजादी प्रदान कर दी है। सुरक्षा प्रबंधों ने हमें जकड़ कर रख दिया था, स्वतंत्रता नाम की कोई चीज नहीं रह गई थी। अब रामकोट का गौरव लौटेगा, भक्त आएंगे तो मंदिरों की व्यवस्था भी सुधरेगी।
75 वर्षीय रामचरित्र पांडेय कहते हैं कि हम 27 साल से बैरियर में कैद हैं। हमने वह दौर भी देखा है जब रामकोट का गौरव धूमिल हो गया था, अब वह दौर भी आ गया है जब पुन: एक बार इस क्षेत्र की धार्मिक महत्ता से लोग परिचित हो सकेंगे। कनक भवन के पास करीब 25 वर्ष से दवाखाना चला रहे वैद्य आरपी पांडेय कहते हैं कि रामकोट की परिधि में कई ऐसे मंदिर हैं जिनकी धार्मिक महत्ता शास्त्रों में वर्णित हैं। लेकिन अधिग्रहण ने इन्हें उपेक्षित कर दिया तो क्षेत्र का कारोबार भी प्रभावित हुआ। अब धार्मिक गौरव के साथ-साथ क्षेत्र का कारोबार भी बढ़ सकेगा।
विश्व हिंदू परिषद की अगुवाई में बीजेपी के समर्थन में चल रहे राममंदिर आंदोलन के परिणामस्वरूप 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा गिरा दिया था। इसके एक साल बाद जनवरी 1993 में यह अध्यादेश लाया गया। तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने 7 जनवरी 1993 को इसे मंजूरी दी थी। इसके तहत विवादित परिसर की कुछ जमीन का सरकार की तरफ से अधिग्रहण किया जाना था। राष्ट्रपति से मंजूरी के बाद तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चव्हाण ने इस बिल को मंजूरी के लिए लोकसभा में रखा। पास होने के बाद इसे अयोध्या अधिनियम के नाम से जाना गया। नरसिम्हा राव सरकार ने 2.77 एकड़ विवादित भूमि के साथ इसके चारों तरफ 60.70 एकड़ भूमि अधिग्रहीत की थी।