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Etawah News: एनओसी का फेर... बारिश में आठ गांवों के रास्ते बने दलदल
Mon, 28 Sep 2026 12:48 AM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, इटावा
संवाद न्यूज एजेंसी, इटावा
Updated Mon, 28 Sep 2026 12:48 AM IST
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फोटो 7: तेलियन खोड़न गांव में धक्का देकर दूधिया की बाइक निकालते ग्रामीण। संवाद
चकरनगर। तहसील क्षेत्र के बीहड़ में बसे आठ गांवों के ग्रामीण आज भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहे हैं। कायंछी, नगला महानंद, बिरोनावाग, कोटरा, गुरभेली, तेलियन खोड़न, नौरगा खोड़न और गोहरा गांवों के संपर्क मार्गों का निर्माण चंबल सेंचुरी और सामाजिक वानिकी विभाग की एनओसी के फेर में वर्षों से अटका है। दो दिन से हो रही बारिश ने ग्रामीणों की परेशानी और बढ़ा दी है। कच्चे रास्ते दलदल में तब्दील हो गए हैं। इससे आठ गांव की करीब 10 हजार की आबादी का गांवों से बाहर निकलना मुश्किल हो गया है।
शनिवार को ललुपुरा निवासी छुन्ना परिहार दूधिया की बाइक रास्ते में फंस गई। काफी कोशिश के बाद भी नहीं निकली। इसके बाद तेलियन खोड़न निवासी दिलीप राठौर ने बाइक पर चढ़कर निकालने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली। दूधिया छुन्ना और विपिन बघेल ने करीब एक किमी तक धक्का देकर बाइक को दलदल से बाहर निकाला। इसी गांव की रीमा देवी के बच्चे की तबीयत खराब हुई तो पति फूल सिंह के साथ इलाज के लिए करीब तीन किमी पैदल ले जाना पड़ा।
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क होती तो मरीज को समय पर अस्पताल पहुंचाया जा सकता था, लेकिन कच्चे रास्तों में बारिश का पानी भरने के बाद गांव तक एंबुलेंस पहुंचना भी मुश्किल हो जाता है। रास्ते में कीचड़ और दलदल होने से जरूरी सामान लाना-ले जाना तक मुश्किल हो जाता है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और बीमार लोगों को अस्पताल पहुंचाने में घंटों लग जाते हैं। कई परिवार गांव छोड़कर दूसरे स्थानों पर जाने को मजबूर हो रहे हैं।
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प्रसव के समय बढ़ जाती है चिंता
तेलियन खोड़न निवासी फूलन देवी का दर्द गांव की बदहाली बयां करता है। वह बताती हैं कि गांव में सड़क न होने से बीमार होने पर मरीज को चारपाई पर लिटाकर ही बाहर ले जाना पड़ता है। बुजुर्गों के बीमार होने पर दवा लेने तक में परेशानी होती है। बहुओं को प्रसव पीड़ा होने पर पड़ोसी गांव सिंडौस में रखना पड़ता है। आर्थिक रूप से सक्षम परिवार इलाज के लिए भिंड तक जाते हैं। उन्होंने कहा कि गांव में बच्चों की शादियां भी नहीं हो पा रही हैं।
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चुनाव के समय करते बड़े वादे, फिर भूल जाते
कायंछी निवासी अमित भदौरिया कहते हैं कि गांव से बाहर निकलना ही सबसे बड़ी चुनौती है। सड़क और विकास की बातें केवल भाषणों तक सीमित रह जाती हैं। चुनाव के समय सड़क निर्माण की फाइलें दौड़ती हैं, लेकिन चुनाव बाद फिर मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क के इंतजार में कई पीढ़ियां गुजर गईं, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका।
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कायंछी गांव की सड़क के लिए विभाग की ओर से एनओसी की फाइल भेजी जा चुकी है। अगले माह तक अनुमति मिलने की उम्मीद है। अन्य गांव की सड़कों के लिए दो फाइल आई हैं। सर्वे के बाद प्रक्रिया शुरू होगी।
-कोटेश त्यागी, चंबल सेंचुरी रेंजर।
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कायंछी की सड़क के लिए अभी तक चंबल सेंचुरी से अनुमति नहीं मिली है। शासन से स्वीकृति मिलते ही निर्माण कार्य शुरू कराया जाएगा। अन्य गांवों की सड़कों के लिए भी एनओसी मिलने के बाद निर्माण कार्य करवाया जाएगा।
-संजीव कुमार, एक्सईएन पीडब्ल्यूडी।
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शनिवार को ललुपुरा निवासी छुन्ना परिहार दूधिया की बाइक रास्ते में फंस गई। काफी कोशिश के बाद भी नहीं निकली। इसके बाद तेलियन खोड़न निवासी दिलीप राठौर ने बाइक पर चढ़कर निकालने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली। दूधिया छुन्ना और विपिन बघेल ने करीब एक किमी तक धक्का देकर बाइक को दलदल से बाहर निकाला। इसी गांव की रीमा देवी के बच्चे की तबीयत खराब हुई तो पति फूल सिंह के साथ इलाज के लिए करीब तीन किमी पैदल ले जाना पड़ा।
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ग्रामीणों का कहना है कि सड़क होती तो मरीज को समय पर अस्पताल पहुंचाया जा सकता था, लेकिन कच्चे रास्तों में बारिश का पानी भरने के बाद गांव तक एंबुलेंस पहुंचना भी मुश्किल हो जाता है। रास्ते में कीचड़ और दलदल होने से जरूरी सामान लाना-ले जाना तक मुश्किल हो जाता है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और बीमार लोगों को अस्पताल पहुंचाने में घंटों लग जाते हैं। कई परिवार गांव छोड़कर दूसरे स्थानों पर जाने को मजबूर हो रहे हैं।
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प्रसव के समय बढ़ जाती है चिंता
तेलियन खोड़न निवासी फूलन देवी का दर्द गांव की बदहाली बयां करता है। वह बताती हैं कि गांव में सड़क न होने से बीमार होने पर मरीज को चारपाई पर लिटाकर ही बाहर ले जाना पड़ता है। बुजुर्गों के बीमार होने पर दवा लेने तक में परेशानी होती है। बहुओं को प्रसव पीड़ा होने पर पड़ोसी गांव सिंडौस में रखना पड़ता है। आर्थिक रूप से सक्षम परिवार इलाज के लिए भिंड तक जाते हैं। उन्होंने कहा कि गांव में बच्चों की शादियां भी नहीं हो पा रही हैं।
चुनाव के समय करते बड़े वादे, फिर भूल जाते
कायंछी निवासी अमित भदौरिया कहते हैं कि गांव से बाहर निकलना ही सबसे बड़ी चुनौती है। सड़क और विकास की बातें केवल भाषणों तक सीमित रह जाती हैं। चुनाव के समय सड़क निर्माण की फाइलें दौड़ती हैं, लेकिन चुनाव बाद फिर मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क के इंतजार में कई पीढ़ियां गुजर गईं, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका।
कायंछी गांव की सड़क के लिए विभाग की ओर से एनओसी की फाइल भेजी जा चुकी है। अगले माह तक अनुमति मिलने की उम्मीद है। अन्य गांव की सड़कों के लिए दो फाइल आई हैं। सर्वे के बाद प्रक्रिया शुरू होगी।
-कोटेश त्यागी, चंबल सेंचुरी रेंजर।
कायंछी की सड़क के लिए अभी तक चंबल सेंचुरी से अनुमति नहीं मिली है। शासन से स्वीकृति मिलते ही निर्माण कार्य शुरू कराया जाएगा। अन्य गांवों की सड़कों के लिए भी एनओसी मिलने के बाद निर्माण कार्य करवाया जाएगा।
-संजीव कुमार, एक्सईएन पीडब्ल्यूडी।

फोटो 7: तेलियन खोड़न गांव में धक्का देकर दूधिया की बाइक निकालते ग्रामीण। संवाद

फोटो 7: तेलियन खोड़न गांव में धक्का देकर दूधिया की बाइक निकालते ग्रामीण। संवाद