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Etawah News: शहीद मनोज शर्मा ने बटालिक सेक्टर में संभाला था मोर्चा
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इटावा/उदी। कारगिल विजय दिवस पर देश 1999 के युद्ध के वीर सैनिकों को नमन कर रहा है। इनमें इटावा के शहीद लांस नायक मनोज शर्मा भी शामिल थे। उन्होंने ऑपरेशन विजय में मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया।
मनोज शर्मा ब्लॉक बढ़पुरा की ग्राम पंचायत पछायगांव के वीर सपूत थे। उनका नाम आज भी क्षेत्र के लिए गर्व और प्रेरणा बना हुआ है। वे भारतीय सेना की 17वीं कुमाऊं रेजिमेंट में तैनात थे। उन्होंने बटालिक सेक्टर में दुश्मनों के खिलाफ मोर्चा संभाला। 28 जून 1999 को मात्र 23 वर्ष की आयु में शहीद हो गए। उनका बलिदान कारगिल विजय के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। मनोज शर्मा का जन्म एक सैनिक परिवार में हुआ था। उनके पिता जगदीश प्रसाद शर्मा भी भारतीय सेना में सेवाएं दे चुके थे।
मनोज शर्मा को देशभक्ति और अनुशासन की सीख परिवार से मिली थी। उनके पिता का अब निधन हो चुका है। उनके भाई भी भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हैं। वर्तमान में पूरा परिवार मध्य प्रदेश के भिंड में रहता है। परिवार की तीन पीढ़ियों का सेना से जुड़ाव क्षेत्र के लिए गर्व का विषय है।
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1999 में शहीद का पार्थिव शरीर पछायगांव पहुंचा था। हजारों लोगों ने अंतिम दर्शन किए और सैन्य सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार हुआ। उनकी स्मृति में गांव में एक शहीद स्मारक बनाया गया है, जो उनके साहस और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है। प्रत्येक वर्ष 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस पर अधिकारी और ग्रामीण स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित करते हैं। शहीद मनोज शर्मा का जीवन युवाओं को देश सेवा के लिए प्रेरित करता है।
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फोटो 14 : ऑनरेरी कैप्टन सुनील कुमार। स्रोत स्वयं
बोफोर्स तोप से कैप्टन सुनील ने तोलोलिंग पर की थी सटीक गोलाबारी
इटावा। भरथना तहसील निवासी ऑनरेरी कैप्टन (सेवानिवृत्त) सुनील कुमार ने कारगिल युद्ध में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने भारतीय सेना की पांच पैरा (स्पेशल फोर्स) से जुड़े रहते हुए 108 मीडियम रेजिमेंट (एलआरडब्ल्यू) में तकनीकी सहयोग की जिम्मेदारी निभाई।
सुनील कुमार की तैनाती वर्ष 1998 में 108 मीडियम रेजिमेंट में हुई थी। कारगिल युद्ध के दौरान यह रेजिमेंट द्रास-मश्कोह सेक्टर में तैनात थी। मई 1999 के अंत में रेजिमेंट ने पाकिस्तानी घुसपैठियों के बंकरों पर सटीक गोलाबारी शुरू की। जून 1999 में रेजिमेंट की बोफोर्स तोपों ने तोलोलिंग कॉम्प्लेक्स पर डायरेक्ट फायर किया। इससे भारतीय सेना के अभियान को निर्णायक बढ़त मिली। सुनील कुमार ने युद्ध के दौरान तकनीकी सहयोग प्रदान किया। इससे तोपखाने की कार्रवाई निर्बाध रूप से संचालित हो सकी। उनकी रेजिमेंट की भूमिका द्रास, मश्कोह और आसपास के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण रही।
कारगिल युद्ध में भारतीय सेना ने द्रास, बटालिक और कारगिल सेक्टर में अभियान चलाए। दुश्मन के कब्जे वाले सभी महत्वपूर्ण ठिकानों को पुनः नियंत्रण में लिया गया। इस विजय ने भारतीय सैनिकों के साहस, अनुशासन और समर्पण की मिसाल पेश की। कारगिल विजय दिवस पर भारतीय पूर्व सैनिक लीग के जिलाध्यक्ष रघुराज सिंह और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. हरीशंकर पटेल ने सुनील कुमार को सम्मानित किया। अनेक पूर्व सैनिकों ने उनके साहस और युद्धकालीन योगदान की सराहना की।
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मनोज शर्मा ब्लॉक बढ़पुरा की ग्राम पंचायत पछायगांव के वीर सपूत थे। उनका नाम आज भी क्षेत्र के लिए गर्व और प्रेरणा बना हुआ है। वे भारतीय सेना की 17वीं कुमाऊं रेजिमेंट में तैनात थे। उन्होंने बटालिक सेक्टर में दुश्मनों के खिलाफ मोर्चा संभाला। 28 जून 1999 को मात्र 23 वर्ष की आयु में शहीद हो गए। उनका बलिदान कारगिल विजय के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। मनोज शर्मा का जन्म एक सैनिक परिवार में हुआ था। उनके पिता जगदीश प्रसाद शर्मा भी भारतीय सेना में सेवाएं दे चुके थे।
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मनोज शर्मा को देशभक्ति और अनुशासन की सीख परिवार से मिली थी। उनके पिता का अब निधन हो चुका है। उनके भाई भी भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हैं। वर्तमान में पूरा परिवार मध्य प्रदेश के भिंड में रहता है। परिवार की तीन पीढ़ियों का सेना से जुड़ाव क्षेत्र के लिए गर्व का विषय है।
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1999 में शहीद का पार्थिव शरीर पछायगांव पहुंचा था। हजारों लोगों ने अंतिम दर्शन किए और सैन्य सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार हुआ। उनकी स्मृति में गांव में एक शहीद स्मारक बनाया गया है, जो उनके साहस और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है। प्रत्येक वर्ष 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस पर अधिकारी और ग्रामीण स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित करते हैं। शहीद मनोज शर्मा का जीवन युवाओं को देश सेवा के लिए प्रेरित करता है।
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फोटो 14 : ऑनरेरी कैप्टन सुनील कुमार। स्रोत स्वयं
बोफोर्स तोप से कैप्टन सुनील ने तोलोलिंग पर की थी सटीक गोलाबारी
इटावा। भरथना तहसील निवासी ऑनरेरी कैप्टन (सेवानिवृत्त) सुनील कुमार ने कारगिल युद्ध में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने भारतीय सेना की पांच पैरा (स्पेशल फोर्स) से जुड़े रहते हुए 108 मीडियम रेजिमेंट (एलआरडब्ल्यू) में तकनीकी सहयोग की जिम्मेदारी निभाई।
सुनील कुमार की तैनाती वर्ष 1998 में 108 मीडियम रेजिमेंट में हुई थी। कारगिल युद्ध के दौरान यह रेजिमेंट द्रास-मश्कोह सेक्टर में तैनात थी। मई 1999 के अंत में रेजिमेंट ने पाकिस्तानी घुसपैठियों के बंकरों पर सटीक गोलाबारी शुरू की। जून 1999 में रेजिमेंट की बोफोर्स तोपों ने तोलोलिंग कॉम्प्लेक्स पर डायरेक्ट फायर किया। इससे भारतीय सेना के अभियान को निर्णायक बढ़त मिली। सुनील कुमार ने युद्ध के दौरान तकनीकी सहयोग प्रदान किया। इससे तोपखाने की कार्रवाई निर्बाध रूप से संचालित हो सकी। उनकी रेजिमेंट की भूमिका द्रास, मश्कोह और आसपास के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण रही।
कारगिल युद्ध में भारतीय सेना ने द्रास, बटालिक और कारगिल सेक्टर में अभियान चलाए। दुश्मन के कब्जे वाले सभी महत्वपूर्ण ठिकानों को पुनः नियंत्रण में लिया गया। इस विजय ने भारतीय सैनिकों के साहस, अनुशासन और समर्पण की मिसाल पेश की। कारगिल विजय दिवस पर भारतीय पूर्व सैनिक लीग के जिलाध्यक्ष रघुराज सिंह और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. हरीशंकर पटेल ने सुनील कुमार को सम्मानित किया। अनेक पूर्व सैनिकों ने उनके साहस और युद्धकालीन योगदान की सराहना की।