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Etawah News: पाला सब्जियों के लिए खतरनाक, खेतों में रखें नमी
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बकेवर। पिछले पखवाड़े से पड़ रहा घना कोहरा और अत्यधिक ठंड सब्जियों की फसलों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही है। टमाटर, शिमला मिर्च, बैगन जैसी नकदी फसलों को पाले से काफी नुकसान हो सकता है। महेवा क्षेत्र के लगभग 20 गांवों में किसान बड़े पैमाने पर सब्जियों की खेती करते हैं जो उनकी आजीविका का मुख्य स्रोत है। मौसम की प्रतिकूलता ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है।
ब्लॉक की कृषि रक्षा इकाई के प्रभारी डॉ. अक्षय कुमार ने किसानों को अपनी सब्जियों की फसलों की विशेष देखभाल करने की सलाह दी है। उन्होंने बताया कि इन दिनों मटर, टमाटर, आलू, शिमला मिर्च और गोभी जैसी फसलें तैयार हैं लेकिन कोहरे और पाले के कारण इन्हें बचाना आवश्यक है। इसके लिए खेतों में नमी बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण है। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे अपने खेतों में हल्की सिंचाई अवश्य करें।
डॉ. अक्षय के अनुसार, ब्लॉक क्षेत्र में लगभग 500 हेक्टेयर भूमि पर सब्जियों की फसलें लगी हुई हैं। यदि सिंचाई नहीं की गई तो फसलों में झुलसा रोग लगने का खतरा बढ़ जाएगा। इस रोग के लगने पर फसल की पत्तियां किनारों से सिकुड़ने लगती हैं और उनका रंग भूरा हो जाता है। पिछेती फसलें इस रोग के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होती हैं। बदली और बूंदाबांदी वाले मौसम में झुलसा रोग का प्रकोप तेजी से फैलता है, जिससे फसल को भारी क्षति पहुंचती है।
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झुलसा रोग के लक्षण पत्तियों के सिरों से झुलसना, काले धब्बे पड़ना और सतह पर रुई जैसी फफूंदी का दिखना है। इस रोग से बचाव के लिए किसानों को डाई थैन एम 45 नामक दवाई का छिड़काव करने की सलाह दी गई है। तीन ग्राम दवाई को 10 लीटर पानी में घोलकर पहला छिड़काव करें और इसके 15 दिन बाद दोबारा इसी प्रकार छिड़काव करें। इससे फसल को झुलसा रोग से बचाया जा सकेगा और अच्छी उपज प्राप्त की जा सकेगी।
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ब्लॉक की कृषि रक्षा इकाई के प्रभारी डॉ. अक्षय कुमार ने किसानों को अपनी सब्जियों की फसलों की विशेष देखभाल करने की सलाह दी है। उन्होंने बताया कि इन दिनों मटर, टमाटर, आलू, शिमला मिर्च और गोभी जैसी फसलें तैयार हैं लेकिन कोहरे और पाले के कारण इन्हें बचाना आवश्यक है। इसके लिए खेतों में नमी बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण है। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे अपने खेतों में हल्की सिंचाई अवश्य करें।
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डॉ. अक्षय के अनुसार, ब्लॉक क्षेत्र में लगभग 500 हेक्टेयर भूमि पर सब्जियों की फसलें लगी हुई हैं। यदि सिंचाई नहीं की गई तो फसलों में झुलसा रोग लगने का खतरा बढ़ जाएगा। इस रोग के लगने पर फसल की पत्तियां किनारों से सिकुड़ने लगती हैं और उनका रंग भूरा हो जाता है। पिछेती फसलें इस रोग के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होती हैं। बदली और बूंदाबांदी वाले मौसम में झुलसा रोग का प्रकोप तेजी से फैलता है, जिससे फसल को भारी क्षति पहुंचती है।
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झुलसा रोग के लक्षण पत्तियों के सिरों से झुलसना, काले धब्बे पड़ना और सतह पर रुई जैसी फफूंदी का दिखना है। इस रोग से बचाव के लिए किसानों को डाई थैन एम 45 नामक दवाई का छिड़काव करने की सलाह दी गई है। तीन ग्राम दवाई को 10 लीटर पानी में घोलकर पहला छिड़काव करें और इसके 15 दिन बाद दोबारा इसी प्रकार छिड़काव करें। इससे फसल को झुलसा रोग से बचाया जा सकेगा और अच्छी उपज प्राप्त की जा सकेगी।