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कालीबांह मंदिर में सभी की पूरी होती मुरादें
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इटावा। शहर में माता सती की बाह गिरने पर करीब 550 साल पहले कालीबांह मंदिर बना था। मंदिर में मां की पूजा के लिए आने वाले भक्तों की सभी मुरादें पूरी होती हैं।
मान्यता है कि महाभारत काल का अमर पात्र अश्वत्थामा इस मंदिर में आकर सबसे पहले पूजा करता है। नवरात्र के दिनों में यहां पर भक्तों का जमावड़ा लगता है, साथ ही मनोकामना पूरी होने पर मां के दर्शनों के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं।
मंदिर इटावा मुख्यालय से मात्र पांच किलोमीटर दूर ग्वालियर रोड पर यमुना नदी के किनारे है। मंदिर के पास ही भैराव बाबा का भी मंदिर है। वैष्णों देवी की तरह इटावा में कालीबांह मंदिर में तीन देवियों की पूजा-अर्चना करने के बाद भक्त भैराव बाबा के दर्शन करने जाते।
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इसके बाद उनकी मनोकमनाएं पूर्ण होती है। कहा जाता है कि कालीबांह मंदिर में रात में सफाई करने बाद जब सुबह गर्भगृह खोला जाता है, तो उस समय मंदिर के भीतर ताजे फूल मिलते हैं, जो इस बात को साबित करता है कोई अदृश्य रूप में आकर मंदिर में पूजा करता है।
इटावा में स्थित बीहड़ में कुछ सालों पहले डकैतों का दहशत थी, लेकिन इन डकैतों में एक खास बात यह थी कि वह माता काली के भक्त थे। मंदिर में स्थित देवी माता को बीहड़ वाली माता के नाम से पुकारते थे।
मंदिर के महंत सचिन गिरी ने बताया कि पूर्वजों के समय मंदिर में कुछ डकैत भी माता रानी की पूजा-अर्चना करने आते थे। इनमें एक खास बात यह थी कि इन्होंने कभी मंदिर आने वाले भक्तों व मंदिर को नुकसान नहीं पहुंचाया।
देवी की पूजा करने के बाद यह लौट जाते थे। निर्माता निर्देशक कृष्णा मिश्रा की फिल्म बीहड़ में कुछ हिस्सा इस मंदिर में फिल्माया गया है। बीहड़ नामक यह फिल्म 1978 से 2005 के मध्य चंबल घाटी में सक्रिय रहे डाकुओं की जिंदगी पर बनी है।
डकैतों ने भी मंदिर में नाम के चढ़ाए थे घंटे
इटावा में एक समय डकैत मलखान सिंह का काफी आतंक था, लेकिन वह भी बीहड़ वाली माता का भक्त था। मलखान के साथ ही निर्भय गुर्जर, पपोला व सीमा परिहार समेत अन्य डकैत मंदिर में दर्शन के लिए आते थे।
इन चारों ने अपने-अपने नाम से मंदिर में घंटे भी चढ़ाएं थे। करीब दस साल पहले डकैत पपोला मंदिर में पूजा कर रहा था, तभी उनके साथियों ने एक कार को मंदिर की आती देख फायरिंग कर दी, तो कार सवार लौट गए थे।
कार सवारों ने टिक्सी मंदिर के पास खड़े पुलिस वालों को जानकारी दी थी। पुलिस वालों के पहुंचने से पहले ही डकैत पपोला मंदिर से भाग गया था। तब उसने गोली चलाने वाले नाराजगी जताई थी।
शिवपाल, रामगोपाल व संटू ने कराया जीर्णोद्धार
महंत सचिन ने बताया कि मंदिर में यह उनकी छठवीं पीढ़ी है। करीब दस साल पहले प्रसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव, सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव व पूर्व चेयरमैन संटू गुप्ता ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था।
पहले यहां का रास्ता कच्चा था। मंदिर का आंगन समेत कालीबांह के गेट तक अब सड़क बन चुकी है, इससे भक्तों को आने-जाने में परेशानी का सामना नहीं करता पड़ता है। साथ ही बाबा भैराव के मंदिर पर जाने वाला रास्ता भी कच्चा था, जिसमें ईंटों की सीढ़ी बन चुकी है।
ये है मंदिर का इतिहास
मंदिर के महंत सचिन गिरी ने बताया कि मंदिर में महाकाली, महालक्ष्मी व सरस्वती की मूर्तियां है। पूर्वजों को सपने में माता सती ने दर्शन देकर जमीन से मूर्ति निकलवाई थी, जो आपस में जुड़ी हुई थी।
ग्वालों की मदद से मूर्तियों को यमुना नदी में प्रभावित कर दिया था। इसके बाद माता ने दोबारा सपने में आकर मंदिर बनाने की बात कही था। पूर्वजों ने ग्वालों की मदद से यमुना नदी में मूर्ति खोजी तो वह नहीं मिली।
मूर्ति जिस जगह से खोदकर निकाली गई थी, वह यमुना नदी से उसी जगह पर अपने आप पहुंच गई। इसके बाद मंदिर बनाया गया था।
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मान्यता है कि महाभारत काल का अमर पात्र अश्वत्थामा इस मंदिर में आकर सबसे पहले पूजा करता है। नवरात्र के दिनों में यहां पर भक्तों का जमावड़ा लगता है, साथ ही मनोकामना पूरी होने पर मां के दर्शनों के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं।
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मंदिर इटावा मुख्यालय से मात्र पांच किलोमीटर दूर ग्वालियर रोड पर यमुना नदी के किनारे है। मंदिर के पास ही भैराव बाबा का भी मंदिर है। वैष्णों देवी की तरह इटावा में कालीबांह मंदिर में तीन देवियों की पूजा-अर्चना करने के बाद भक्त भैराव बाबा के दर्शन करने जाते।
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इसके बाद उनकी मनोकमनाएं पूर्ण होती है। कहा जाता है कि कालीबांह मंदिर में रात में सफाई करने बाद जब सुबह गर्भगृह खोला जाता है, तो उस समय मंदिर के भीतर ताजे फूल मिलते हैं, जो इस बात को साबित करता है कोई अदृश्य रूप में आकर मंदिर में पूजा करता है।
इटावा में स्थित बीहड़ में कुछ सालों पहले डकैतों का दहशत थी, लेकिन इन डकैतों में एक खास बात यह थी कि वह माता काली के भक्त थे। मंदिर में स्थित देवी माता को बीहड़ वाली माता के नाम से पुकारते थे।
मंदिर के महंत सचिन गिरी ने बताया कि पूर्वजों के समय मंदिर में कुछ डकैत भी माता रानी की पूजा-अर्चना करने आते थे। इनमें एक खास बात यह थी कि इन्होंने कभी मंदिर आने वाले भक्तों व मंदिर को नुकसान नहीं पहुंचाया।
देवी की पूजा करने के बाद यह लौट जाते थे। निर्माता निर्देशक कृष्णा मिश्रा की फिल्म बीहड़ में कुछ हिस्सा इस मंदिर में फिल्माया गया है। बीहड़ नामक यह फिल्म 1978 से 2005 के मध्य चंबल घाटी में सक्रिय रहे डाकुओं की जिंदगी पर बनी है।
डकैतों ने भी मंदिर में नाम के चढ़ाए थे घंटे
इटावा में एक समय डकैत मलखान सिंह का काफी आतंक था, लेकिन वह भी बीहड़ वाली माता का भक्त था। मलखान के साथ ही निर्भय गुर्जर, पपोला व सीमा परिहार समेत अन्य डकैत मंदिर में दर्शन के लिए आते थे।
इन चारों ने अपने-अपने नाम से मंदिर में घंटे भी चढ़ाएं थे। करीब दस साल पहले डकैत पपोला मंदिर में पूजा कर रहा था, तभी उनके साथियों ने एक कार को मंदिर की आती देख फायरिंग कर दी, तो कार सवार लौट गए थे।
कार सवारों ने टिक्सी मंदिर के पास खड़े पुलिस वालों को जानकारी दी थी। पुलिस वालों के पहुंचने से पहले ही डकैत पपोला मंदिर से भाग गया था। तब उसने गोली चलाने वाले नाराजगी जताई थी।
शिवपाल, रामगोपाल व संटू ने कराया जीर्णोद्धार
महंत सचिन ने बताया कि मंदिर में यह उनकी छठवीं पीढ़ी है। करीब दस साल पहले प्रसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव, सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव व पूर्व चेयरमैन संटू गुप्ता ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था।
पहले यहां का रास्ता कच्चा था। मंदिर का आंगन समेत कालीबांह के गेट तक अब सड़क बन चुकी है, इससे भक्तों को आने-जाने में परेशानी का सामना नहीं करता पड़ता है। साथ ही बाबा भैराव के मंदिर पर जाने वाला रास्ता भी कच्चा था, जिसमें ईंटों की सीढ़ी बन चुकी है।
ये है मंदिर का इतिहास
मंदिर के महंत सचिन गिरी ने बताया कि मंदिर में महाकाली, महालक्ष्मी व सरस्वती की मूर्तियां है। पूर्वजों को सपने में माता सती ने दर्शन देकर जमीन से मूर्ति निकलवाई थी, जो आपस में जुड़ी हुई थी।
ग्वालों की मदद से मूर्तियों को यमुना नदी में प्रभावित कर दिया था। इसके बाद माता ने दोबारा सपने में आकर मंदिर बनाने की बात कही था। पूर्वजों ने ग्वालों की मदद से यमुना नदी में मूर्ति खोजी तो वह नहीं मिली।
मूर्ति जिस जगह से खोदकर निकाली गई थी, वह यमुना नदी से उसी जगह पर अपने आप पहुंच गई। इसके बाद मंदिर बनाया गया था।