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पचनद क्षेत्र में विलुप्त होने की कगार पर जमुना पारी बकरी
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जमुनापारी बकरी के साथ पशुपालक।
- फोटो : ETAWHA
इटावा। पचनद क्षेत्र में किसानों की आमदनी का प्रमुख स्रोत विश्व प्रसिद्ध जमुनापारी बकरी विलुप्त होने की कगार पर हैं। वर्ष 1984 में पहली बार पशुपालन विभाग ने गणना कराई तब बकरियों की संख्या 82 हजार थी। अब यह संख्या छह हजार रह गई है।
यमुना, चम्बल, क्वारी, सिन्धु एवं पहुज नदियों के बीच किसानों के मुख्य आय का साधन कृषि के साथ-साथ पशुपालन रहा है। इसमें जमुनापारी बकरी एवं भदावरी भैंस किसान सबसे ज्यादा पालते थे। इन पांच नदियों के जंगलों में जौरीफिलौरा (विलायती बबूल) बड़े पैमाने पर उग आए हैं। जमुना पारी बकरी के भोजन वाले वृक्ष देशी बबूल, रेऊज, छेकुर, कैरी, जंगल जलेबी, बेरी, जंगली करौधा जैसे पेड़ विलुप्त हो गए हैं। इस कारण जमुनापारी बकरियों का जंगलों से चारा ही समाप्त हो गया। धीरे-धीरे पशुपालकों ने इस प्रजाति को पालना ही बंद कर दिया। जमुनापारी बकरियों की निरंतर कम संख्या होती देख प्रदेश सरकार ने इसके निर्यात पर रोक लगा दी। जमुनापारी बकरियाें का मुख्य रूप से रूस एवं नेपाल में निर्यात किया जाता था। दक्षिण भारत में भी बड़ी संख्या मे जमुना पारी बकरियां सरकारी खरीद के माध्यम से भेजी जाती थीं। निर्यात पर रोक लग जाने से बकरी पालन में किसानों ने रुचि नहीं ली।
जमुनापारी बकरी अन्य प्रजातियों की तुलना में दोगुनी वजन की होती हैं। साथ-साथ एक से दो लीटर तक दूध प्रतिदिन देती हैं। बकरी का दूध डेंगू और क्षय रोग में औषधि का काम करता है। प्रदेश के सेवानिवृत्त निदेशक स्वास्थ्य एवं परिवार डॉ.रामबाबू ने जमुना पारी बकरी के दूध को तेजी से प्लेटलेट्स बढ़ाने वाला एवं कई रोगों में उपयोगी बताया है।
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यमुना, चम्बल, क्वारी, सिन्धु एवं पहुज नदियों के बीच किसानों के मुख्य आय का साधन कृषि के साथ-साथ पशुपालन रहा है। इसमें जमुनापारी बकरी एवं भदावरी भैंस किसान सबसे ज्यादा पालते थे। इन पांच नदियों के जंगलों में जौरीफिलौरा (विलायती बबूल) बड़े पैमाने पर उग आए हैं। जमुना पारी बकरी के भोजन वाले वृक्ष देशी बबूल, रेऊज, छेकुर, कैरी, जंगल जलेबी, बेरी, जंगली करौधा जैसे पेड़ विलुप्त हो गए हैं। इस कारण जमुनापारी बकरियों का जंगलों से चारा ही समाप्त हो गया। धीरे-धीरे पशुपालकों ने इस प्रजाति को पालना ही बंद कर दिया। जमुनापारी बकरियों की निरंतर कम संख्या होती देख प्रदेश सरकार ने इसके निर्यात पर रोक लगा दी। जमुनापारी बकरियाें का मुख्य रूप से रूस एवं नेपाल में निर्यात किया जाता था। दक्षिण भारत में भी बड़ी संख्या मे जमुना पारी बकरियां सरकारी खरीद के माध्यम से भेजी जाती थीं। निर्यात पर रोक लग जाने से बकरी पालन में किसानों ने रुचि नहीं ली।
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जमुनापारी बकरी अन्य प्रजातियों की तुलना में दोगुनी वजन की होती हैं। साथ-साथ एक से दो लीटर तक दूध प्रतिदिन देती हैं। बकरी का दूध डेंगू और क्षय रोग में औषधि का काम करता है। प्रदेश के सेवानिवृत्त निदेशक स्वास्थ्य एवं परिवार डॉ.रामबाबू ने जमुना पारी बकरी के दूध को तेजी से प्लेटलेट्स बढ़ाने वाला एवं कई रोगों में उपयोगी बताया है।
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