{"_id":"fa8961cd7d8812126678c4fbf7dbaf60","slug":"book-without-reading-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"बिना किताबों के ही चली 50 दिन पढ़ाई!","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बिना किताबों के ही चली 50 दिन पढ़ाई!
ब्यूरो/अमर उजाला, इटावा
Updated Wed, 20 May 2015 11:27 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
न कापी, न किताब और न ही यूनीफार्म लेकिन परिषदीय विद्यालयों में टीचरों के ‘हुनर’ से स्टूडेट्स की पढ़ाई जारी है...! नया शिक्षण सत्र शुरू हुए 50 दिन बीत चुके हैं और यह हकीकत बीएसए के निरीक्षण में भी सामने आ चुकी है।
विज्ञापन
ऐसे बिना तैयारी के परिषदीय विद्यालय कान्वेंट और सीबीएसई बोर्ड से मान्यता प्राप्त विद्यालयों का सामना कैसे कर पाएंगे। कुल मिलकर कहें तो बुनियादी सुविधाएं दिए बिना ही सत्र शुरू करने का आइडिया फ्लाप ही साबित हुआ है।
विज्ञापन
पिछले सालों तक शिक्षण सत्र का शुभारंभ जुलाई से शुरू होता है। सत्र के प्रारंभ में ही बच्चों को निशुल्क दी जाने वाली कापी-किताबों के साथ यूनीफार्म भी मिल जाती थी लेकिन इस बार सरकार ने सीबीएसई बोर्ड की तर्ज पर नए शिक्षण सत्र का शुभारंभ पहली अप्रैल से ही कर दिया।
विज्ञापन
नतीजा यह रहा कि परिषदीय विद्यालयों में अध्ययनरत छात्रों को निशुल्क यूनीफार्म तो छोड़ो किताबें तक नसीब नहीं हो पाई। दरअसल मार्च में बेसिक शिक्षा विभाग ने आदेश जारी किया था कि पासआउट स्टूडेंट्स सेे किताबें वापस लेकर प्रमोटिड कक्षाओं में आए बच्चों को दी जाएं। मगर विभाग का यह फंडा फ्लाप रहा।
दरअसल विभाग ने कक्षा एक पास कर चुके बच्चों से किताबें लेकर कक्षा एक में प्रवेश लेने वाले बच्चाें को देने का फरमान सुनाया था लेकिन 80 फीसदी से अधिक बच्चों की किताबें सुरक्षित बची ही नहीं और शेष बच्चे स्कूल आए ही नहीं। अप्रैल में स्वयं बीएसए ने एक दर्जन से अधिक परिषदीय विद्यालयों का निरीक्षण किया है।
80 फीसदी विद्यालयों में पंजीकृत स्टूडेंट्स के सापेक्ष बहुत ही कम संख्या में विद्यार्थी उपस्थित मिले। टीचरों की उपस्थित भी निराशाजनक सामने आई है। बीएसए ने कई टीचरों के खिलाफ कार्रवाई भी की है। निरीक्षण के दौरान भी कई टीचरों ने किताबें न होने की शिकायत भी की थीं।
सर्वशिक्षा अभियान के सहायक वित्त एवं लेखाधिकारी गुफरान-उर- रहमान कहते हैं कि किसी कारण से किताबाें का प्रकाशन नहीं हो पाया है। मार्च के महीने में आदेश दिया गया था कि पासआउट बच्चों से किताबें लेकर दी जाएं लेकिन बड़ी संख्या में बच्चाें की किताबें सुरक्षित नहीं पाई गई। अब तो स्कूल बंद होने वाले हैं।
संभवता जुलाई तक किताबेें आ जाएंगी। कागजों के टेंडर में रेट डिफरेंट आने के कारण प्रदेश स्तर पर टेंडर नहीं हो पाएं हैं।
आंकड़ों की जुबानी
जिले में 1240 प्राइमरी तथा 538 जूनियर हाईस्कूल है। इन विद्यालयों में 1.63 लाख बच्चे पंजीकृत हैं। इन्हें राज्य सरकार तथा सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत निशुल्क किताबें उपलब्ध कराई जाती है।
इस बार 149 करोड़ रुपये से बच्चों को किताबें उपलब्ध कराने का सर्व शिक्षा अभियान के बजट में प्रस्ताव किया गया है। नॉन बीपीएल श्रेणी के छात्रों को निशुल्क किताबें राज्य सरकार की ओर से दी जाती हैं जबकि अन्य श्रेणी के बच्चों को सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत किताबें उपलब्ध कराई जाती है।
इन्हें दी जानी थी किताबें
नॉन बीपीएल ओबीसी तथा सामान्य लड़के- 17579
सभी जातियाें की लड़कियां - 70627
अनुसूचित जाति के लड़के- 25888
बीपीएल श्रेणी के लड़के- 21938
प्राइवेट स्कूलाें में 10 फीसदी कोर्स पूरा
प्राइवेट स्कूलों की तर्ज पर इस बार सरकार ने शिक्षण सत्र अप्रैल में ही शुरू कर दिया था लेकिन परिषदीय स्कूलों के बच्चों को जहां पर किताबें तक नसीब नहीं हो पाई हैं।
सीबीएसई तथा अन्य प्राइवेट स्कूलों में सभी कक्षाओं का 10 फीसदी से अधिक कोर्स पूरा हो चुका है। सत्र के प्रारंभ तो स्कूल आने वाले बच्चों की संख्या संतोषजनक रही लेकिन 15 अप्रैल तक भी किताबें न आने के बाद उपस्थित निरंतर गिरती चली गई।