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चंबल नदी के प्राकृतवास में शुरू हुई कछुओं के 750 चूजों की उछलकूद
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चकरनगर (संवाद)। चंबल नदी में कछुओं की संतति बढ़ाने के प्रयासों को बड़ी सफलता मिली है। सेंक्चुअरी के कर्मचारियों ने शनिवार को कछुओं के 750 बच्चे नदी में छोड़े। संरक्षित रहने के साथ कछुए चंबल को प्रदूषण मुक्त करने में मददगार भी साबित होते हैं।
चंबल सेंक्चुअरी के वन दरोगा विशुन पाल सिंह चौहान ने बताया कि चंबल नदी में ढौर प्रजाति के कछुओं की संख्या लाखों में है। रेत में स्थान चिह्नित कर कछुओं के अंडों को 60 दिन तक संरक्षित करना पड़ता है। मई के दूसरे सप्ताह में अंडों से बच्चे निकलने लगते हैं। इस बार जीपीएस से नदी में खोजकर ढौर प्रजाति के 750 अंडे कुंदौल, सहसों, मिटहटी, ढकरा में संरक्षित किए गए थे।
मौसम अनुकूल रहने से 10 मई से अंडों से बच्चे निकलने लगे थे। 15 मई शाम को सभी 750 अंडों से बच्चे निकल आए। सभी बच्चों को नदी के प्राकृतिक वास में छोड़ दिया गया है। पिछले वर्षों की तुलना में शत-प्रतिशत बच्चों की संतति में सफलता मिली है। अभी सहसों, ढकरा ,पाली, नदा, मिटहटी आदि स्थानों पर 688 अंडे संरक्षित किए जा रहे हैं।
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चंबल सेंक्चुअरी के वन दरोगा विशुन पाल सिंह चौहान ने बताया कि चंबल नदी में ढौर प्रजाति के कछुओं की संख्या लाखों में है। रेत में स्थान चिह्नित कर कछुओं के अंडों को 60 दिन तक संरक्षित करना पड़ता है। मई के दूसरे सप्ताह में अंडों से बच्चे निकलने लगते हैं। इस बार जीपीएस से नदी में खोजकर ढौर प्रजाति के 750 अंडे कुंदौल, सहसों, मिटहटी, ढकरा में संरक्षित किए गए थे।
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मौसम अनुकूल रहने से 10 मई से अंडों से बच्चे निकलने लगे थे। 15 मई शाम को सभी 750 अंडों से बच्चे निकल आए। सभी बच्चों को नदी के प्राकृतिक वास में छोड़ दिया गया है। पिछले वर्षों की तुलना में शत-प्रतिशत बच्चों की संतति में सफलता मिली है। अभी सहसों, ढकरा ,पाली, नदा, मिटहटी आदि स्थानों पर 688 अंडे संरक्षित किए जा रहे हैं।
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