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Etah News: मतदाताओं का मिजाज तय करेगा गढ़ का शहंशाह
Sun, 05 May 2024 11:01 PM IST
आगरा ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, एटा
संवाद न्यूज एजेंसी, एटा
Updated Sun, 05 May 2024 11:01 PM IST
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एटा। कभी पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत मुलायम सिंह यादव एटा को अपना दूसरा घर बताते थे। मोदी लहर में भाजपा ने सपा के पैर उखाड़े और इसे अपना गढ़ घोषित कर दिया। 2024 में होने जा रहे इस चुनाव में मतदाताओं का मिजाज तय करेगा कि एटा वास्तव में किसका गढ़ है। किसकी राजनीतिक विरासत आगे बढ़ेगी।आजादी के बाद हुए शुरुआती चुनावों में पूरे देश में ही कांग्रेस का दबदबा था। एटा लोकसभा सीट भी इससे अछूती नहीं थी। लगातार दो चुनावों में कांग्रेस के रोहनलाल चतुर्वेदी विजेता बने। इसके बाद हिंदू महासभा ने कांग्रेस का विजय रथ तोड़ा। लेकिन फिर अगले चुनाव में इस विजय रथ पर सवार होकर कांग्रेस ने दो चुनाव जीते। 1989 के चुनाव से इस सीट पर माहौल पूरी तरह बदल गया। अयोध्या मामला उछलने के बाद मतदाताओं की पसंद भाजपा बन गई थी। लगातार चार चुनाव लोगों ने भाजपा को ही जिताया।
इसके बाद फिर मतदाताओं की पसंद बदली। उन्हें जमीन से उठकर आए नेताजी मुलायम सिंह यादव का अंदाज भाया। उन्होंने यहां आकर चुनावी सभाएं कीं तो लोग उनके भाषण और अंदाज के कायल हो गए। 1999 और 2004 में सीट सपा ने जीती और यह क्षेत्र सपा के गढ़ में तब्दील होता गया। 2012 के विधानसभा चुनाव में जब जिले के चारों विधायक सपा से चुने गए तो इस बात की तस्दीक हो गई कि अब सपा मतदाताओं की पसंदीदा पार्टी है।
लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव में सपा ने आत्मघाती फैसला लिया। यहां निर्दल चुनाव लड़ने आए पूर्व सीएम कल्याण सिंह को समर्थन देकर अपना प्रत्याशी नहीं खड़ा किया। ऐसे में सपा पदाधिकारियों-कार्यकर्ताओं के साथ ही मतदाताओं का मनोबल भी टूटा। यही वजह रही कि उन्होंने दोबारा सपा को मौका नहीं दिया। इसके बाद के लगातार दो चुनाव सपा को मुंह की खानी पड़ी और उनके गढ़ के दावे भी ढह गए।
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इस चुनाव में टक्कर केवल भाजपा प्रत्याशी राजवीर सिंह और सपा प्रत्याशी देवेश सिंह शाक्य की ही नहीं है। बल्कि भाजपा के लिए यह चुनाव अपनी विरासत बनाए रखने का है। जबकि सपा के लिए चुनौती है कि अपनी खोई विरासत को वापस हासिल करे। चुनौतियां भरपूर हैंं लेकिन दोनों प्रत्याशी और दल सीट को महत्वपूर्ण मानकर अपनी ताकत झोंके हुए हैं। मोदी भले ही नहीं आए लेकिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, सीएम योगी आदित्यनाथ, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक भाजपा प्रत्याशी के लिए सभाएं कर चुके हैं। जबकि सपा की ओर से पूर्व सीएम अखिलेश यादव की चुनावी सभा हो चुकी है। इस कहानी को अंजाम तक पहुंचाना अब मतदाताओं के हाथ में है। संवाद
एटा लोकसभा सीट का इतिहास
1951-52 - रोहनलाल चतुर्वेदी (कांग्रेस)
1957 - रोहनलाल चतुर्वेदी (कांग्रेस)
1962 - विशन चंद्र सेठ (हिंदू महासभा)
1967 - रोहनलाल चतुर्वेदी (कांग्रेस)
1971 - रोहनलाल चतुर्वेदी (कांग्रेस)
1977 - महादीपक सिंह शाक्य (भारतीय लोक दल)
1980 - मलिक मोहम्मद मुशीर खान (कांग्रेस)
1984 - मो. महफूज अली खां (लोक दल)
1989 - महादीपक सिंह शाक्य (भाजपा)
1991 - महादीपक सिंह शाक्य (भाजपा)
1996 - महादीपक सिंह शाक्य (भाजपा)
1998 - महादीपक सिंह शाक्य (भाजपा)
1999 - देवेंद्र सिंह यादव (सपा)
2004 - देवेंद्र सिंह यादव (सपा)
2009 - कल्याण सिंह (निर्दल)
2014 - राजवीर सिंह (भाजपा)
2019 - राजवीर सिंह (भाजपा)
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इसके बाद फिर मतदाताओं की पसंद बदली। उन्हें जमीन से उठकर आए नेताजी मुलायम सिंह यादव का अंदाज भाया। उन्होंने यहां आकर चुनावी सभाएं कीं तो लोग उनके भाषण और अंदाज के कायल हो गए। 1999 और 2004 में सीट सपा ने जीती और यह क्षेत्र सपा के गढ़ में तब्दील होता गया। 2012 के विधानसभा चुनाव में जब जिले के चारों विधायक सपा से चुने गए तो इस बात की तस्दीक हो गई कि अब सपा मतदाताओं की पसंदीदा पार्टी है।
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लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव में सपा ने आत्मघाती फैसला लिया। यहां निर्दल चुनाव लड़ने आए पूर्व सीएम कल्याण सिंह को समर्थन देकर अपना प्रत्याशी नहीं खड़ा किया। ऐसे में सपा पदाधिकारियों-कार्यकर्ताओं के साथ ही मतदाताओं का मनोबल भी टूटा। यही वजह रही कि उन्होंने दोबारा सपा को मौका नहीं दिया। इसके बाद के लगातार दो चुनाव सपा को मुंह की खानी पड़ी और उनके गढ़ के दावे भी ढह गए।
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इस चुनाव में टक्कर केवल भाजपा प्रत्याशी राजवीर सिंह और सपा प्रत्याशी देवेश सिंह शाक्य की ही नहीं है। बल्कि भाजपा के लिए यह चुनाव अपनी विरासत बनाए रखने का है। जबकि सपा के लिए चुनौती है कि अपनी खोई विरासत को वापस हासिल करे। चुनौतियां भरपूर हैंं लेकिन दोनों प्रत्याशी और दल सीट को महत्वपूर्ण मानकर अपनी ताकत झोंके हुए हैं। मोदी भले ही नहीं आए लेकिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, सीएम योगी आदित्यनाथ, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक भाजपा प्रत्याशी के लिए सभाएं कर चुके हैं। जबकि सपा की ओर से पूर्व सीएम अखिलेश यादव की चुनावी सभा हो चुकी है। इस कहानी को अंजाम तक पहुंचाना अब मतदाताओं के हाथ में है। संवाद
एटा लोकसभा सीट का इतिहास
1951-52 - रोहनलाल चतुर्वेदी (कांग्रेस)
1957 - रोहनलाल चतुर्वेदी (कांग्रेस)
1962 - विशन चंद्र सेठ (हिंदू महासभा)
1967 - रोहनलाल चतुर्वेदी (कांग्रेस)
1971 - रोहनलाल चतुर्वेदी (कांग्रेस)
1977 - महादीपक सिंह शाक्य (भारतीय लोक दल)
1980 - मलिक मोहम्मद मुशीर खान (कांग्रेस)
1984 - मो. महफूज अली खां (लोक दल)
1989 - महादीपक सिंह शाक्य (भाजपा)
1991 - महादीपक सिंह शाक्य (भाजपा)
1996 - महादीपक सिंह शाक्य (भाजपा)
1998 - महादीपक सिंह शाक्य (भाजपा)
1999 - देवेंद्र सिंह यादव (सपा)
2004 - देवेंद्र सिंह यादव (सपा)
2009 - कल्याण सिंह (निर्दल)
2014 - राजवीर सिंह (भाजपा)
2019 - राजवीर सिंह (भाजपा)