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सादगी ने रामलाल को बना दिया गांव का प्रधान
ब्यूरो अमर उजाला, एटा
Updated Wed, 16 Dec 2015 11:20 PM IST
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गंजडुंडवारा विकास क्षेत्र के ग्राम म्यासुर निवासी 80 वर्षीय रामलाल अपनी सादगी के बल पर गांव के प्रधान बन गए। अब प्रधान चुन जाने के बाद उनकी बूढ़ी आंखों में गांव के विकास का सपना हिलोरे ले रहा है। इसके लिए उन्होंने खाका भी खींच लिया है।
रामलाल नागर ने सेना में तोपखाने में गनर कुक के पद से 1967 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी। इसके बाद वे गांव में आकर ही बस गए। पत्नी की मौत हो गई। बच्चे नौकरी की खातिर बाहर चले गए। लेकिन गांव से लगाव होने के कारण वह अपने बच्चों के पास रहने नहीं गए। 30 साल से वह गांव में अकेले रह कर जीवन गुुजारने लगे। अपनी सादगी और मृदु व्यवहार के बल पर वह सबके चहेते बन गए।
उन्होंने ग्रामीणों की समस्याओं के समाधान को ही अपना लक्ष्य बना लिया। जब कोई परेशान होता तो वह गांव के प्रधान के पास न जाकर उनके पास चला आता। वे उसकी समस्या को हल कराने में हमेशा तत्पर रहते। अपनी साइकिल उठाकर वे पीड़ित की मदद कराने को निकल पड़ते। उनके पास चुनाव लड़ने को धन भी नहीं था, लेकिन ग्रामीणों के सहयोग से वह प्रधानी के उम्मीदवार बन गए। सीट सामान्य थी लेकिन अनुसूचित जाति से वह एक मात्र प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े। चुनाव में 13 अन्य प्रत्याशियों को पछाड़ कर वे गांव के प्रधान चुन लिए गए। उनका कहना है कि वे गांव को एक आदर्श गांव के रूप में विकसित करना चाहते हैं। गांव में वह एक शांति समिति बनाएंगे। इसका कार्य गांव में आपसी भाईचारा कायम रखना होगा। गांव में सभी की सहमति से विकास कार्यों को कराएंगे।
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रामलाल नागर ने सेना में तोपखाने में गनर कुक के पद से 1967 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी। इसके बाद वे गांव में आकर ही बस गए। पत्नी की मौत हो गई। बच्चे नौकरी की खातिर बाहर चले गए। लेकिन गांव से लगाव होने के कारण वह अपने बच्चों के पास रहने नहीं गए। 30 साल से वह गांव में अकेले रह कर जीवन गुुजारने लगे। अपनी सादगी और मृदु व्यवहार के बल पर वह सबके चहेते बन गए।
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उन्होंने ग्रामीणों की समस्याओं के समाधान को ही अपना लक्ष्य बना लिया। जब कोई परेशान होता तो वह गांव के प्रधान के पास न जाकर उनके पास चला आता। वे उसकी समस्या को हल कराने में हमेशा तत्पर रहते। अपनी साइकिल उठाकर वे पीड़ित की मदद कराने को निकल पड़ते। उनके पास चुनाव लड़ने को धन भी नहीं था, लेकिन ग्रामीणों के सहयोग से वह प्रधानी के उम्मीदवार बन गए। सीट सामान्य थी लेकिन अनुसूचित जाति से वह एक मात्र प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े। चुनाव में 13 अन्य प्रत्याशियों को पछाड़ कर वे गांव के प्रधान चुन लिए गए। उनका कहना है कि वे गांव को एक आदर्श गांव के रूप में विकसित करना चाहते हैं। गांव में वह एक शांति समिति बनाएंगे। इसका कार्य गांव में आपसी भाईचारा कायम रखना होगा। गांव में सभी की सहमति से विकास कार्यों को कराएंगे।
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