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अब तकनीक नहीं सिर्फ कैमरे का कमाल
अमर उजाला ब्यूरो एटा
Updated Thu, 18 Aug 2016 11:01 PM IST
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अब तकनीक नहीं सिर्फ कैमरे का कमाल
- फोटो : अमर उजाला
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सत्तर के दशक में सहालग और बोर्ड परीक्षा फार्म भरने के समय शहर में स्टूडियो में दिन रात रील डेवलप कर फोटो बनते थे, लेकिन अब डिजिटल तकनीक से दस मिनट में फोटो तैयार हो रहे हैं। शहर के पुराने फोटोग्राफर कहते है कि सत्तर के दशक में फोटोग्राफी में लाभ कमाते थे, लेकिन अब सिर्फ कमीशन बचा है। रही कसर सेल्फी ने पूरी कर दी है।
आज विश्व फोटोग्राफी डे है, लेकिन तकनीक के दौर में फोटोग्राफी में हाथ की कारीगरी के बाजार पर डिजिटल कैमरे का जादू छा गया है। पटियाली गेट निवासी भोला शंकर वार्ष्णेय पिछले 52 साल से फोटोग्राफी के पेशे से जुड़े हैं। वार्ष्णेय कहते हैं कि अब फोटोग्राफी में तकनीक (हाथ की कारीगरी) खत्म हो चुकी है। पहले लोग परिवार और दोस्तों के साथ स्टूडियो में फोटो खिंचाने आते थे और किसी के परिवार को फोटो खींचने जाने पर फोटोग्राफर को लोग ध्यान से देखते थे, इज्जत सम्मान मिलता था। शंकर वार्ष्णेय ने कहा सत्तर के दशक में दस हजार के कैमरे में 620, 120, 35 एमएम की रील से फोटो खींचकर उसे डेवलप करने में तीन दिन लगते थे, लेकिन फोटो देखने लायक होते थे। लेकिन आज दस लाख रुपये कीमत के कैमरे से बने फोटो का कलर एक साल में उड़ रहा है। सहेजना कठिन है, लेकिन उस वक्त के फोटो आज भी शोभा बढ़ा रहे हैं। अब बाजार में फोटोग्राफर नहीं हैं, सिर्फ कैमरामैन बचे हैं।
ब्लैक एंड व्हाइट को हाथ से बनाते थे रंगीन
भोले शंकर वार्ष्णेय कहते हैं कि रील डवलप कर फोटो बनाते वक्त हाथ की कारीगरी का महत्व था। लोग ब्लैक एंड व्हाइट फोटो कलर कराने आते थे। कलर की कीमत 600 रुपये होती थी। फोटो में हाथ से कलर भरने की देशी तकनीक कारगर थी। फोटो पर छाया डाल कर ब्राइटनेस कम, ज्यादा करने की तकनीक कम लोग जानते थे। लेकिन अब डिजिटल कैमरे ने सब कुछ आसान कर दिया है।
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पोर्टफोलियो तक सिमटा व्यवसाय
संचार क्रांति के दौर में फोटोग्राफी का व्यवसाय महज पोर्टफोलियो फोटोग्राफी तक सिमट गया है। फोटोग्राफी के प्रोफेसर ओमप्रकाश कहते हैं कि अब स्टूडियो में लड़के-लड़कियां महज पोर्टफोलियो खिंचाने आते हैं। कमाई तो बस शादी विवाहों की रह गई है। यकीनन, बदलते दौर में वह दिन दूर नहीं जब फोटोग्राफी की दुकानें सीमित रह जाएंगीं, क्योंकि बदलती तकनीक ने लोगों की दिनचर्या को प्रभावित किया है।
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आज विश्व फोटोग्राफी डे है, लेकिन तकनीक के दौर में फोटोग्राफी में हाथ की कारीगरी के बाजार पर डिजिटल कैमरे का जादू छा गया है। पटियाली गेट निवासी भोला शंकर वार्ष्णेय पिछले 52 साल से फोटोग्राफी के पेशे से जुड़े हैं। वार्ष्णेय कहते हैं कि अब फोटोग्राफी में तकनीक (हाथ की कारीगरी) खत्म हो चुकी है। पहले लोग परिवार और दोस्तों के साथ स्टूडियो में फोटो खिंचाने आते थे और किसी के परिवार को फोटो खींचने जाने पर फोटोग्राफर को लोग ध्यान से देखते थे, इज्जत सम्मान मिलता था। शंकर वार्ष्णेय ने कहा सत्तर के दशक में दस हजार के कैमरे में 620, 120, 35 एमएम की रील से फोटो खींचकर उसे डेवलप करने में तीन दिन लगते थे, लेकिन फोटो देखने लायक होते थे। लेकिन आज दस लाख रुपये कीमत के कैमरे से बने फोटो का कलर एक साल में उड़ रहा है। सहेजना कठिन है, लेकिन उस वक्त के फोटो आज भी शोभा बढ़ा रहे हैं। अब बाजार में फोटोग्राफर नहीं हैं, सिर्फ कैमरामैन बचे हैं।
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ब्लैक एंड व्हाइट को हाथ से बनाते थे रंगीन
भोले शंकर वार्ष्णेय कहते हैं कि रील डवलप कर फोटो बनाते वक्त हाथ की कारीगरी का महत्व था। लोग ब्लैक एंड व्हाइट फोटो कलर कराने आते थे। कलर की कीमत 600 रुपये होती थी। फोटो में हाथ से कलर भरने की देशी तकनीक कारगर थी। फोटो पर छाया डाल कर ब्राइटनेस कम, ज्यादा करने की तकनीक कम लोग जानते थे। लेकिन अब डिजिटल कैमरे ने सब कुछ आसान कर दिया है।
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पोर्टफोलियो तक सिमटा व्यवसाय
संचार क्रांति के दौर में फोटोग्राफी का व्यवसाय महज पोर्टफोलियो फोटोग्राफी तक सिमट गया है। फोटोग्राफी के प्रोफेसर ओमप्रकाश कहते हैं कि अब स्टूडियो में लड़के-लड़कियां महज पोर्टफोलियो खिंचाने आते हैं। कमाई तो बस शादी विवाहों की रह गई है। यकीनन, बदलते दौर में वह दिन दूर नहीं जब फोटोग्राफी की दुकानें सीमित रह जाएंगीं, क्योंकि बदलती तकनीक ने लोगों की दिनचर्या को प्रभावित किया है।